रेगिस्तान की हरियाली का भ्रम, विलायती बबूल की कहानी

पुष्कर राज, पर्यावरणीय प्रतिरक्षक, बीकानेर

बीकानेर की धरती पर जब कभी हवाएँ तेज़ चलती हैं, तो रेत के उड़ते बवंडर के बीच कहीं दूर झाड़ियों का हरा-भरा झुरमुट दिख जाता है — मानो रेगिस्तान ने अपने घावों पर हरियाली का मरहम लगा लिया हो।
लेकिन यह हरियाली धोखा है।
यह हरियाली विलायती बबूल की है — एक विदेशी पेड़ जो दिखने में भले पर्यावरण का साथी लगे, पर वास्तव में यह रेगिस्तान की रगों में जहर घोल रहा है।

कैसे आया यह “अतिथि” पेड़

विलायती बबूल, जिसे अंग्रेज़ी में Prosopis juliflora कहा जाता है, मूल रूप से मेक्सिको और दक्षिण अमेरिका का निवासी है।
19वीं सदी में जब भारत अकाल, सूखे और ईंधन संकट से जूझ रहा था, तब अंग्रेज़ों ने इसे एक “उद्धारक” के रूप में भारत लाने का फैसला किया। उनका तर्क था कि यह पेड़ बंजर ज़मीनों पर भी उग सकता है, मिट्टी के कटाव को रोक सकता है और लोगों को ईंधन की लकड़ी दे सकता है।

राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में इस पेड़ का स्वागत ऐसे किया गया मानो कोई “हरा मसीहा” आ गया हो।
कहा जाता है कि बीकानेर रियासत ने आज़ादी से पहले इज़राइल से इसके बीज मंगवाए थे और हेलीकॉप्टर से पूरे मरुस्थल में इनका छिड़काव कराया था।
बाद में, 1984 के सूखे में जोधपुर रियासत ने भी यही रास्ता अपनाया — ताकि लोगों को रोजगार और ईंधन दोनों मिल सकें।

उस समय किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह पेड़, जो मरुस्थल में हरियाली का भ्रम दे रहा है, आने वाले दशकों में जैव विविधता के लिए एक खामोश खतरा बन जाएगा।

कैसे फैलता है विलायती बबूल?

विलायती बबूल एक आक्रामक पौधा है। इसकी जड़ें इतनी गहरी जाती हैं कि यह भूजल का बड़ा हिस्सा खींच लेता है। यह आसपास के पौधों की नमी छीन लेता है और उनकी बढ़त को रोक देता है।
धीरे-धीरे यह पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लेता है — और जब तक लोग समझते हैं, तब तक यह हजारों हेक्टेयर जमीन को निगल चुका होता है।

इसकी कुछ खास “खतरनाक” खूबियाँ हैं:

  • यह बहुत कम पानी में भी पनप जाता है।
  • इसकी जड़ें कई मीटर नीचे तक जाती हैं।
  • इसे काटना या उखाड़ना बेहद मुश्किल है।
  • और सबसे खतरनाक – यह देशी पौधों और चारागाहों को नष्ट कर देता है।

पारिस्थितिकी पर असर

राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेश में विलायती बबूल का फैलाव पर्यावरणीय असंतुलन का कारण बन गया है।
देशी घासें और पेड़ जो सदियों से इस पारिस्थितिकी का हिस्सा थे — जैसे केर, रोहिड़ा, खेजड़ी, और लूणिया — अब इस विदेशी पेड़ की छाया में दम तोड़ रहे हैं।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पेड़ अब तक 500 से अधिक देशी पौधों की प्रजातियों को खत्म कर चुका है।
चारागाह सिकुड़ रहे हैं, पशुपालन प्रभावित हो रहा है, और भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

इसके अलावा, यह झाड़ीदार पेड़ सड़कों के किनारे इतनी घनी दीवारें बना देता है कि मोड़ों पर सामने से आती गाड़ियाँ दिखाई नहीं देतीं। कई जगहों पर यह सड़क दुर्घटनाओं का भी कारण बन रहा है।

गाँवों में बदलते जीवन के रंग

गाँवों के बुज़ुर्ग बताते हैं कि जब यह पेड़ पहली बार लगाया गया था, तो लोगों ने इसे वरदान समझा था। सूखे दिनों में इसकी लकड़ी ने चूल्हे जलाए, और टिब्बों के बीच कुछ हरियाली देखकर मन को राहत मिली।
लेकिन अब वही पेड़ किसानों की फसलों में घुसपैठ कर रहा है, खेतों की नमी सोख रहा है, और चरागाहों को उजाड़ रहा है।

“पहले जहाँ गाय-भैंसें खुलकर चरती थीं, वहाँ अब कांटों का जंगल है,” बीकानेर के एक किसान ने कहा।
“यह पेड़ तो जैसे धरती की सारी ताकत चूस लेता है।”

सरकारी और सामुदायिक प्रयास

राज्य सरकार और स्थानीय समुदाय अब मिलकर इस विदेशी घुसपैठिए को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
कई जिलों में मनरेगा के तहत विलायती बबूल उन्मूलन अभियान चलाए जा रहे हैं।
सरकार ने वन विभागों को इसके उन्मूलन के लिए वित्तीय सहायता दी है, ताकि इस पौधे को हटाकर देशी प्रजातियों — जैसे खेजड़ी, बबूल देशी, बेर और नीम — का पुनर्वास किया जा सके।

कुछ जगहों पर तो यह भी हुआ है कि स्थानीय समुदायों ने खुद आगे बढ़कर इसके खिलाफ अभियान चलाया है —
वे पेड़ काट रहे हैं, नए पौधे लगा रहे हैं और लोगों को समझा रहे हैं कि हरियाली का मतलब हर पेड़ नहीं होता।

हरियाली का असली अर्थ।

विलायती बबूल हमें यह सिखाता है कि हर “हरा पेड़” प्रकृति का मित्र नहीं होता।
कभी-कभी यह हरियाली विनाश का रूप भी ले सकती है — जैसे किसी रोग की सतह पर चमकता हुआ ज़ख्म।

आज ज़रूरत है कि हम अपने पर्यावरण की जड़ों को पहचानें।
हमें यह तय करना होगा कि विकास की कीमत पर अगर हम अपनी धरती की सांसें छीन लें, तो वह हरियाली किस काम की?

राजस्थान का मरुस्थल केवल रेत का विस्तार नहीं है — यह एक जीवित पारिस्थितिकी है, जहाँ हर पौधा, हर झाड़ी और हर चरागाह का अपना स्थान और महत्व है।
अगर हम इसे समझ लें, तो शायद आने वाली पीढ़ियों को फिर कभी “हरियाली के नाम पर जहर” न उगाना पड़े।