राजस्थान के एक गाँव से निकलती उम्मीद की कहानी

टीना वासू, बज्जू, बीकानेर, राजस्थान
राजस्थान की तपती धूप, रेतीली आँधियाँ और संघर्षों की धूल से ढकी ज़िंदगियाँ. यह तस्वीर अक्सर हमें बीकानेर ज़िले के गाँवों में देखने को मिलती है। इन्हीं गाँवों में से एक है लाखासर, जहाँ हर रोज़ मिट्टी के कणों के बीच पसीना बहाकर लोग अपना गुज़ारा चलाते हैं। यही गाँव है उस लड़की का भी, जिसने अपने हौसले और सपनों के दम पर परिस्थितियों को मात दी और यह साबित किया कि अगर संकल्प मज़बूत हो, तो रास्ते खुद-ब-खुद निकल आते हैं। उस लड़की का नाम है जेठी।
बचपन की धूल-धक्कड़ में पला सपना
जेठी का बचपन किसी साधारण खेल-कूद में नहीं बीता। उसका पहला परिचय किताबों से नहीं, बल्कि सफ़ेद मिट्टी की खदान से हुआ। सुबह होते ही पिता और माँ टोकरे-फावड़े लेकर खदान की ओर निकल जाते। बच्चों का बचपन अक्सर माँ-बाप की गोद में सिमटकर बीतता है, लेकिन जेठी और उसके भाई-बहनों का बचपन खदान की कठोर ज़मीन पर बीत रहा था। चार बच्चों वाले परिवार में गुज़ारे की समस्या हमेशा सिर पर मंडराती रहती। बड़ी बहन ने स्कूल छोड़ दिया, ताकि माता-पिता का हाथ बँटा सके। धीरे-धीरे जेठी को भी खदान के काम में शामिल होना पड़ा। छोटी-सी उम्र, नाज़ुक हाथ, और सामने खदान का बोझिल काम – यह किसी भी बच्चे के लिए भयावह हो सकता है। दिन भर की थकान उसके शरीर को तोड़ देती, लेकिन आँखों में एक चमक हमेशा बनी रहती। उसकी आँखों में यह सवाल बार-बार उभरता “क्या मेरी ज़िंदगी भी हमेशा यूँ ही मिट्टी में बीतेगी, या मेरे लिए कोई और राह है?”
माँ की उम्मीदें और बेबसी
जेठी की माँ भले ही कठोर मेहनतकश महिला थीं, लेकिन दिल के किसी कोने में वे चाहती थीं कि उनकी बेटी की ज़िंदगी उनसे अलग हो। वे जानती थीं कि शिक्षा ही वह चाबी है, जिससे भविष्य के दरवाज़े खुल सकते हैं। लेकिन गाँव का स्कूल बहुत दूर था। आर्थिक हालत इतनी कमज़ोर थी कि रोज़ का भोजन जुटाना भी कठिन था। ऐसे में स्कूल भेजना एक असंभव सा सपना था। माँ अक्सर सोचतीं “काश मेरी बेटी पढ़-लिख जाती”। पर हर बार मजबूरी का बोझ इस ख्वाहिश को दबा देता।
उम्मीद की एक किरण
इसी दौरान एक दिन गाँव में बज्जू से एक गैर सरकारी संस्था के कुछ कार्यकर्ता आए। उन्होंने गाँव वालों को बताया कि वे लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष पहल कर रहे हैं। बीकानेर ज़िले के गाँवों की बेटियों के लिए उन्होंने बज्जू कैंपस में एक गर्ल्स हॉस्टल बनाया है, जहाँ रहकर लड़कियाँ नज़दीकी सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर सकती हैं।
यह ख़बर सुनकर जेठी की माँ के दिल में दबा सपना फिर से जाग उठा। उन्होंने साहस करके संस्था के लोगों से बात की और अपनी बेटी को पढ़ाने की इच्छा प्रकट की। संस्था के कार्यकर्ताओं ने भी उनके संकल्प को देखा और तुरंत जेठी को हॉस्टल में रखने का वादा किया।
नई दुनिया की शुरुआत
हॉस्टल पहुँचते ही जेठी की ज़िंदगी में बदलाव की पहली हवा चली। अब वह खदान की धूल-धक्कड़ से निकलकर किताबों की खुशबू वाली दुनिया में पहुँच गई थी। शुरुआत में परिवार और गाँव से दूर रहना कठिन था। रातों को वह माँ को याद करके रोती। पर धीरे-धीरे हॉस्टल की दीवारें उसके लिए नया घर बन गईं।
कक्षा का माहौल, अध्यापिकाओं का स्नेह और सहेलियों का साथ। सबने मिलकर उसकी हिम्मत बढ़ाई। जब पहली बार उसने अपनी किताब खोली, तो उसे लगा जैसे उसने दुनिया का सबसे कीमती ख़ज़ाना पा लिया हो।

संघर्ष और मेहनत
लेकिन पढ़ाई आसान नहीं थी। खदान में काम करते हुए पढ़ाई का कोई अनुभव नहीं था। शुरू में अक्षरों को समझना, जोड़-घटाना सीखना, सब मुश्किल लगता। कई बार वह निराश भी होती, पर हर बार उसकी माँ की कही बातें याद आतीं “बेटी, तू पढ़-लिख जाएगी तो हमारी ज़िंदगी बदल जाएगी।” यही वाक्य उसके लिए ईंधन का काम करते।
धीरे-धीरे उसने मेहनत और लगन से पढ़ाई में अपना स्थान बनाया। अध्यापक भी उसकी लगन देखकर हैरान होते।
एक लड़की से पूरे समाज की उम्मीद।
जेठी की कहानी सिर्फ़ उसकी व्यक्तिगत जीत नहीं है। यह उस पूरे समाज की कहानी है जहाँ आज भी लड़कियों की पढ़ाई अक्सर गरीबी, दूरी और परंपरा की भेंट चढ़ जाती है। लाखों जेठीयाँ हैं, जिनके सपने हालात की वजह से दबकर रह जाते हैं।
कुछ ग़ैर सरकारी संगठन इन बेटियों को मंच देकर न सिर्फ़ उनकी ज़िंदगी बदल रहे हैं, बल्कि पूरे गाँव की सोच भी बदल रहे हैं। आज लाखासर में लोग कहते हैं कि “अगर जेठी पढ़ सकती है, तो हमारी बेटियाँ क्यों नहीं?”
भविष्य की राह।
आज भी जेठी की यात्रा आसान नहीं है। पढ़ाई के साथ-साथ उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है कभी आर्थिक कठिनाई, कभी समाज के ताने। लेकिन अब वह जानती है कि उसे पीछे नहीं हटना है। उसके भीतर यह विश्वास बैठ चुका है कि शिक्षा से ही ज़िंदगी बदल सकती है।
उसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश है कि वह पढ़-लिखकर अपने गाँव लौटे और अपने जैसी लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करे। वह चाहती है कि कोई भी लड़की गरीबी की वजह से अपने सपनों से वंचित न रहे।
मिट्टी से सपनों तक।
जेठी की कहानी हमें यह सिखाती है कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती। चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर हिम्मत और अवसर मिल जाए तो कोई भी बच्चा अपनी तक़दीर बदल सकता है। जेठी भी अपनी मेहनत से यह साबित कर रही है कि सचमुच मिट्टी से भी सपनों को आकार दिया जा सकता है।