भेड़ पालक कायम दीन: परंपरा से मुनाफे तक का सफर

खमाणराम, चीमाणा, बीकानेर, राजस्थान
राजस्थान के फलोदी जिले के एक छोटे से गांव नारायणपुरा में रहने वाले कायम दीन वर्षों से भेड़ पालन का पुश्तैनी काम करते आ रहे थे। पहले यह व्यवसाय उनके परिवार के लिए केवल गुजारे का जरिया था। भेड़ों को न तो सही पोषण मिल पाता था, न समय पर इलाज, और ऊन बेचने में भी उन्हें बिचौलियों के कारण कई नुकसान उठाने पड़ते थे।
भारत में भेड़ पालन एक महत्वपूर्ण ग्रामीण व्यवसाय है, जिससे लाखों परिवार जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (CSWRI) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 2.6 मिलियन भेड़ पालक परिवार हैं। इनमें से राजस्थान जैसे राज्यों में भेड़ पालकों की संख्या काफी अधिक है। राजस्थान में लगभग 2.2 मिलियन भेड़ पालक हैं, जो देश के कुल भेड़ पालकों का लगभग 85% हिस्सा हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि कायम दीन जैसे कई भेड़ पालक सदियों से इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं, लेकिन आधुनिक मदद के बिना उन्हें अक्सर अपनी मेहनत का सही फल नहीं मिल पाता।
कायम दीन की जिंदगी में तब एक नया मोड़ आया जब वह उरमूल सीमांत समिति और सामाख्या कंपनी जैसी संस्थाओं से जुड़े। इन संस्थाओं ने उनके व्यवसाय को एक नई दिशा दी और भेड़ पालन से जुड़े कई फायदे उपलब्ध कराए।
संस्था की सहायता से आया बदलाव

कैटल फीड वितरण: संस्था ने कायम दीन जैसे भेड़ पालकों को उच्च गुणवत्ता वाला कैटल फीड उपलब्ध कराया। इससे भेड़ों का स्वास्थ्य बेहतर हुआ, उनकी शारीरिक वृद्धि हुई और ऊन का उत्पादन भी बढ़ गया।
भेड़ धुलाई एवं शेयरिंग शिविर: गांव-गांव में विशेष शिविर आयोजित किए गए, जहां भेड़ों की ऊन को वैज्ञानिक तरीके से उतारा गया। इससे ऊन की गुणवत्ता में सुधार हुआ और बाजार में ऊंचे दाम मिलने लगे। विशेषज्ञों का मानना है कि सही तरीके से की गई शेयरिंग से ऊन की गुणवत्ता 15-20% तक बढ़ सकती है।
ऊन की सीधी खरीद और उचित मूल्य: पहले ऊन के व्यापारियों के भरोसे रहकर कायम दीन को अक्सर घाटा होता था, लेकिन जब संस्था ने ऊन की सीधी खरीद शुरू की, तो उन्हें बाजार मूल्य से बेहतर दाम मिलने लगे। इस मॉडल से बिचौलिए खत्म हो गए, जिससे भेड़ पालकों की आय में सीधे तौर पर वृद्धि हुई।
दवा वितरण और पशु चिकित्सा सेवा: भेड़ों के लिए समय-समय पर मुफ्त दवाइयां और टीकाकरण की सुविधा दी गई। पशु डॉक्टर भी नियमित रूप से गांव में आते रहे, जिससे बीमारियों से होने वाले नुकसान में भारी कमी आई।
परिणाम:
आज कायम दीन के पास न केवल स्वस्थ भेड़ों का एक बड़ा झुंड है, बल्कि उनकी आमदनी भी पहले से दोगुनी हो गई है। उनकी सफलता की कहानी नारायणपुरा और आसपास के गांवों के लिए एक प्रेरणा बन गई है। कायम दीन जैसे सैकड़ों भेड़ पालक आज आत्मनिर्भर बन चुके हैं और गर्व से कहते हैं कि संस्था के सहयोग से ऊन के व्यवसाय में उन्हें बहुत फायदा हुआ है।
कायम दीन कहते हैं, “पहले भेड़ पालना सिर्फ एक परंपरा थी, अब यह मुनाफे वाला व्यवसाय बन गया है। संस्था की वजह से हमारी मेहनत को पहचान मिली है।”
नोट : कायम दीन से इस नंबर 8890876119 पर संपर्क किया जा सकता है।