पारम्परिक जल स्रोतों का गुम होता ज्ञान

लेखक: पुखराज जयपाल | स्थान: थाट, जैसलमेर , राजस्थान
“हमने पानी को सिर्फ पीने की चीज़ समझा, पहचानना भूल गए कि वह हमारी परंपरा, संस्कृति और साझी ज़िम्मेदारी भी है।”
राजस्थान के थार मरुस्थल में स्थित जैसलमेर जिले के साकड़ा ब्लॉक की केलावा पंचायत का थाट गांव, कभी अपने पारम्परिक जल स्रोतों – नाड़ी, तालाब, बेरी और ऊकेरी – के लिए जाना जाता था। इन संरचनाओं ने वर्षों तक न केवल गांव की जल आवश्यकताओं को पूरा किया, बल्कि समुदायिक सहयोग, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को भी गहराई से प्रभावित किया।
लेकिन अब, आधुनिकता की दौड़ में यह ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है।

एक संवाद, जो अतीत की परतें खोलता है
हाल ही में थाट गांव में एक समूह चर्चा और व्यक्तिगत संवाद का आयोजन किया गया। इस बातचीत में गांव के वरिष्ठ नागरिक – रामचंद्र, चोखाराम, सुरेश, मोहनराम, बालूराम, नथाराम, विषनाराम, आसुराम, सहाबुद्दीन, शरीफ खां, कतु देवी, गोरधनराम, जयदेव आदि – शामिल हुए।
इनकी बातों से एक समृद्ध अतीत का चित्र उभर कर सामने आया, जहाँ पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि साझा आस्था और सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा था।
गांव में केवल दो समुदाय – मेघवाल और मुस्लिम – निवास करते हैं, और दोनों के बीच प्रेम, सहयोग और समरसता की मिसाल देखने को मिलती थी।
गांव की बेरी (छोटी कुई) से सभी लोगों को पानी मिलता था। वहां कोई जूते पहनकर नहीं जाता था, न ही कोई नशीला पदार्थ साथ ले जाया जाता। यह पवित्रता केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि जल स्रोतों के प्रति आदर और उत्तरदायित्व का प्रतीक थी।
जब तालाब में ‘खाटी’ निकाली जाती थी…
गांव की परंपरा में खाटी निकालना – यानी तालाब या बेरी से एक विशेष आकृति में मिट्टी हटाना – किसी की मृत्यु पर शोक-स्मरण, या किसी नवजात की कामना के रूप में किया जाता था।
कई बार कोई बुजुर्ग अंतिम समय में कहते, “हमारे नाम से तालाब की सफाई कर देना, हम आगे का घर देखेंगे।”
यह जल स्रोतों से जुड़ी एक ऐसी सांस्कृतिक भावना थी, जिसमें व्यक्ति अपना अस्तित्व पानी के साथ जोड़ कर देखता था।
ओजोणा, तीज जैसे त्योहारों के अवसर पर भी लोग अपने नाम की याद में जल स्रोतों की मरम्मत कराते थे। गांव में एक व्यक्ति पानी वितरण की ज़िम्मेदारी संभालता और तय करता कि किसे कितना पानी भरना है। असहाय और विकलांग लोगों तक पानी पहुंचाना भी सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा था।
यह सब दर्शाता है कि एक समय में पानी, व्यक्ति की नहीं, समाज की ज़िम्मेदारी हुआ करता था।
पारम्परिक जल स्रोत: कभी जीवन का आधार
थाट गांव के बुजुर्गों के अनुसार, बेरी और ऊकेरी जैसी संरचनाएं विशेष रूप से वर्षाजल संग्रहण के लिए बनाई जाती थीं।
नाड़ी और तालाब न केवल इंसानों बल्कि मवेशियों के लिए भी जीवन रेखा थे। इनकी देखरेख सामूहिक प्रयासों से होती थी – जिससे ना सिर्फ संसाधन सुरक्षित रहते, बल्कि गांव में सहयोग की भावना भी पनपती थी।
विरासत जो अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंच रही
आज की युवा पीढ़ी इस विरासत से कटती जा रही है।
चर्चा में सामने आया कि अधिकांश युवाओं ने इन जल स्रोतों के नाम तो सुन रखे हैं, परंतु उनके निर्माण, मरम्मत या प्रबंधन की विधियों की जानकारी नहीं है।
इसके पीछे कई कारण स्पष्ट हुए:
आधुनिक पाइपलाइनों और सरकारी जल योजनाओं पर बढ़ती निर्भरता
शिक्षा व्यवस्था में पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा
गांवों से बाहर पलायन और संस्कृति से दूरी
सामुदायिक सहभागिता की परंपरा का कमजोर होना
यह केवल जानकारी की कमी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत से एक गंभीर विच्छेदन है।
जल संकट के दौर में पुरानी सीख की नई ज़रूरत
आज जब देश के कई हिस्से जल संकट की गंभीर चपेट में हैं, ऐसे में थाट जैसे गांवों की परंपराएं नई उम्मीद देती हैं।
पारंपरिक जल स्रोत महज ‘पुरानी तकनीक’ नहीं हैं, बल्कि स्थानीय अनुकूलन, सामूहिक श्रम, और संवेदनशील योजना का परिणाम हैं।
इनका संरक्षण अब केवल अतीत से जुड़ाव नहीं, भविष्य की सुरक्षा है।
समाधान की दिशा में ठोस पहलें ज़रूरी हैं
थाट गांव की चर्चा के आधार पर, कुछ ठोस कदम सुझाए जा सकते हैं:
शिक्षा प्रणाली में एकीकरण
– स्थानीय विद्यालयों में पारंपरिक जल ज्ञान को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
बुजुर्गों का ज्ञान संरक्षित हो
– उनके अनुभवों का लेखन, रिकॉर्डिंग व डिजिटलीकरण कर संग्रहित किया जाए।
युवाओं को जोड़ना होगा
– गांव में ‘जल संरक्षण युवा समूह’ बनाकर उन्हें सफाई, मरम्मत और निर्माण में जोड़ा जाए।
सरकारी योजनाएं संवेदनशील बनें
– मनरेगा और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में पारंपरिक जल स्रोतों के पुनरुद्धार को प्राथमिकता दी जाए।
निष्कर्ष: अतीत से भविष्य की ओर एक पुल
थाट गांव की यह कहानी किसी एक गांव की नहीं, पूरे मरुस्थलीय राजस्थान की साझा सच्चाई है।
यदि अब हम नहीं चेते, तो अगली पीढ़ियों के लिए न केवल पानी की उपलब्धता घटेगी, बल्कि वे उस जीवनशैली और चेतना से भी वंचित रह जाएंगी, जिसने सदियों तक इस क्षेत्र को जीवित रखा।
अब समय है कि हम अतीत से सीखते हुए एक स्थायी, स्थानीय और समावेशी जल भविष्य की ओर बढ़ें।
क्योंकि पानी का मूल्य केवल उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उस समझ में है, जो समाज उसके प्रति रखता है।