रज़िया सुल्ताना : सल्तनत की पहली महिला गद्दीनशीन

इतिहास के झरोखे से……
फौजिया रहमान खान, नई दिल्ली
“सन 1236 की एक सुबह, दिल्ली की गलियों में हलचल थी। लोग हैरान थे. सल्तनत की गद्दी पर कोई राजकुमार नहीं, बल्कि एक राजकुमारी बैठी थी, जिसका नाम था रज़िया।”
भारतीय इतिहास में यह क्षण किसी विस्मय से कम नहीं था। मध्यकालीन समाज में जब स्त्रियों को पर्दे में रखा जाता था और उनकी भूमिका घर की चौखट तक सीमित कर दी जाती थी, तब एक महिला का मुस्लिम सल्तनत की गद्दी पर बैठना अपने आप में क्रांतिकारी घटना थी। यह कहानी है रज़िया सुल्ताना की, एक ऐसी शासक की जिसने परंपराओं को तोड़ा, साहस के साथ शासन किया और विरोध की आंधियों का सामना किया।
बेटियों से परे एक सुल्तान की दृष्टि
रज़िया, दिल्ली सल्तनत के तीसरे शासक सुल्तान (शमसुद्दीन) इल्तुतमिश की बेटी थीं। इल्तुतमिश गुलाम वंश से आते थे और अपनी योग्यता से दिल्ली के सुल्तान बने थे। इस पृष्ठभूमि ने उन्हें यह समझ दी थी कि सत्ता का आधार जन्म नहीं बल्कि क्षमता होती है।
उनके बेटे भी थे, लेकिन वे राजनीति और प्रशासन में कमजोर सिद्ध हुए। इसके विपरीत, रज़िया न सिर्फ़ विद्वान और युद्धकला में दक्ष थीं, बल्कि जनता के बीच भी लोकप्रिय थीं। इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज लिखते हैं कि जब इल्तुतमिश अभियानों पर जाते, तो दिल्ली की जिम्मेदारी अक्सर रज़िया के हाथों में छोड़ जाते। रज़िया ने यह भरोसा कायम किया कि वह शासन चला सकती हैं।
इसी योग्यता के आधार पर इल्तुतमिश ने खुले दरबार में घोषणा की थी कि उनकी बेटी ही उनकी उत्तराधिकारी होगी। यह घोषणा उस दौर के लिए असाधारण थी, क्योंकि उत्तराधिकार के अधिकार को केवल पुरुषों तक सीमित माना जाता था।
भाई की नाकामी और जनता का असंतोष
1236 ई. में इल्तुतमिश की मृत्यु हुई। दरबारी अमीरों ने रज़िया की योग्यता को दरकिनार कर परंपरा का सहारा लिया और उनके भाई रुकनुद्दीन फिरोज़ को गद्दी पर बैठाया। लेकिन शासन के मामले में रुकनुद्दीन बेहद लापरवाह निकला।
उसने सत्ता को गंभीरता से लेने के बजाय ऐशो-आराम और विलासिता में डूबकर राजकोष को खोखला करना शुरू कर दिया। उसकी मां शाह तुरकान ने भी दरबार में हस्तक्षेप बढ़ाया और अत्याचार किए। नतीजा यह हुआ कि जनता में असंतोष भड़क उठा।
दरबार के अमीरों और आम जनता दोनों को लगा कि राज्य की बागडोर गलत हाथों में है। यही असंतोष रज़िया के पक्ष में राजनीतिक अवसर बना।
जनता की आवाज़, रज़िया का ताज

रुकनुद्दीन की नाकामी से क्षुब्ध जनता और असंतुष्ट अमीरों ने रज़िया को समर्थन देना शुरू किया। 1236 ई. में विद्रोह भड़का और रुकनुद्दीन को अपदस्थ कर दिया गया।
इसके बाद जनता की मांग पर रज़िया को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया। यह घटना भारतीय इतिहास का वह अनूठा पल था, जब पहली बार किसी महिला ने अपनी क्षमता और जनता के विश्वास के बल पर मुस्लिम सल्तनत की गद्दी हासिल की।
दिल्ली की गलियों में चर्चा थी कि अब “सल्तनत को एक औरत चला रही है।” यह न सिर्फ़ इतिहास का, बल्कि सामाजिक मानसिकता का भी बड़ा मोड़ था।
जब रज़िया ने परंपराओं को तोड़ा
गद्दी पर बैठने के बाद रज़िया ने जो पहला साहसी कदम उठाया, उसने उनकी पहचान और स्पष्ट कर दी। इतिहासकारों का वर्णन है कि उन्होंने पर्दे के पीछे से शासन करने से साफ़ इनकार किया।
रज़िया खुले दरबार लगाती थीं, जनता की फरियाद सीधे सुनती थीं और पुरुष शासकों की तरह शाही परिधान व पगड़ी पहनती थीं। उन्होंने स्त्रियों को केवल पर्दे तक सीमित रखने की धारणा को चुनौती दी।
यह दृश्य जनता के लिए नया और चौंकाने वाला था। लेकिन रज़िया का यही साहस उन्हें इतिहास में अलग स्थान दिलाता है।
प्रशासनिक निर्णय और नीतियाँ
रज़िया ने अपने छोटे से शासनकाल में कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसले लिए:
न्यायप्रिय शासन : वे सीधे दरबार में प्रजा की शिकायतें सुनती थीं।
अधिकारियों की नियुक्ति : उन्होंने वंश और जाति के बजाय योग्यता को प्राथमिकता दी। यही कारण था कि उन्होंने एक अबीसी (हब्शी) गुलाम जमाल-उद-दीन याकूत को उच्च पद पर नियुक्त किया, जो तुर्की अमीरों को नागवार गुज़रा।
राजकोष की मजबूती : रुकनुद्दीन द्वारा खोखले किए गए राजकोष को संतुलित करने का प्रयास किया।
जनसंपर्क : उन्होंने आम जनता से संपर्क बढ़ाया और उनकी समस्याओं का त्वरित समाधान किया।
चुनौतियाँ और विरोध
रज़िया के सामने सबसे बड़ी चुनौती दरबारी तुर्क अमीर थे। वे नहीं चाहते थे कि एक महिला उन पर शासन करे, और न ही यह स्वीकार कर पा रहे थे कि एक गैर-तुर्क (याकूत) को उच्च पद मिल सकता है।
उनकी यह असंतुष्टि धीरे-धीरे विद्रोह में बदल गई। कई अमीरों ने गुप्त रूप से षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया।
जनता का विश्वास बनाम दरबार का विरोध

रज़िया को जनता से गहरा समर्थन मिला, लेकिन दरबार की राजनीति भारी पड़ने लगी। अमीरों का गठजोड़ मजबूत था और वे लगातार सुल्ताना के निर्णयों को चुनौती देते रहे।
रज़िया का शासनकाल केवल साढ़े तीन वर्ष (1236–1240 ई.) तक ही चला, लेकिन इस छोटे दौर में उन्होंने जनता के दिलों में जगह बना ली।
ऐतिहासिक महत्व
रज़िया का सत्ता में आना केवल दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव का प्रतीक भी था। उन्होंने यह साबित किया कि नेतृत्व का आधार लिंग नहीं, बल्कि योग्यता और साहस होता है।
उनकी कहानी हमें यह याद दिलाती है कि इतिहास में स्त्रियों को यदि अवसर मिले तो वे समाज और राज्य को नई दिशा दे सकती हैं।
निष्कर्ष
रज़िया सुल्ताना की यात्रा संघर्ष, साहस और विद्रोह की कहानी है। उनका सत्ता में आना उस युग के लिए चमत्कार से कम नहीं था।
हालाँकि उनके शासनकाल को लंबे समय तक टिकने नहीं दिया गया, लेकिन उन्होंने यह संदेश ज़रूर दिया कि “ताज किसी के लिंग से नहीं, उसकी क्षमता से तय होता है।”
रज़िया सुल्ताना की यात्रा केवल अतीत की कहानी नहीं है, बल्कि वह आज की औरत की कहानी भी है। उन्होंने बारहवीं सदी में जिस साहस के साथ सत्ता की गद्दी पर बैठने का हक़ जताया, वैसा ही संघर्ष आज भी महिलाएँ अपने-अपने क्षेत्र में कर रही हैं।

21वीं सदी में महिलाएँ राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, कला, सेना और खेलों तक हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज ने उन्हें पूरी तरह से बराबरी दी है? जवाब है. अब भी नहीं।
आज भी महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका में आते ही कई तरह के पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है। जैसे कभी रज़िया को यह कहकर कमजोर साबित करने की कोशिश हुई कि वह एक “औरत” हैं, वैसे ही आज भी महिलाओं को “कमज़ोर लिंग” कहा जाता है। उन्हें अक्सर दोहरी ज़िम्मेदारियों घर और बाहर के बीच संतुलन बैठाना पड़ता है।
फिर भी, जैसे रज़िया ने अपने साहस और कार्यकुशलता से दरबारियों और समाज की मानसिकता को चुनौती दी थी, वैसे ही आज की महिलाएँ हर क्षेत्र में अपनी योग्यता से यह साबित कर रही हैं कि नेतृत्व का आधार लिंग नहीं बल्कि क्षमता है।
भारत की संसद से लेकर पंचायतों तक, आईएएस से लेकर सेना तक, वैज्ञानिकों से लेकर अंतरिक्ष यात्राओं तक। महिलाएँ उस राह पर चल रही हैं जिसे कभी रज़िया ने अपने साहस से खोला था।
रज़िया का इतिहास हमें यही सिखाता है कि बाधाएँ चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हों, अगर विश्वास और क्षमता है तो कोई भी स्त्री समय की धारा मोड़ सकती है।
रज़िया सुल्ताना का सत्ता तक पहुँचना इतिहास की एक अनूठी घटना थी, लेकिन उनका संदेश कालातीत है। उनकी कहानी हमें यह याद दिलाती है कि औरत को कभी कमतर मत आँको, क्योंकि वह जब चाहे ताज और तख़्त हासिल कर सकती है।
आज जब महिलाएँ अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही हैं, तो रज़िया की गाथा प्रेरणा देती है।
“नेतृत्व की असली ताक़त लिंग में नहीं, साहस और दृष्टि में होती है।”