पटाखों का इतिहास, बारूद की आमद, अरबों का खर्च और अग्नि दुर्घटनाओं का जोखिम।

अनीस आर खान
पटाखे, या आतिशबाजी, सदियों से दुनिया भर की संस्कृतियों में उत्सव, उल्लास और विजय का प्रतीक रहे हैं। भारत में, दीपावली के त्योहार पर इनका उपयोग इतना व्यापक और गहरा है कि पटाखों के बिना जश्न की कल्पना करना भी मुश्किल है। रोशनी के इस त्योहार को अक्सर शोर और धुएं के आवरण में लपेटा जाता है। हालांकि, इस शानदार प्रदर्शन के पीछे एक जटिल इतिहास, एक विशाल अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य तथा सुरक्षा का एक गंभीर संकट छिपा हुआ है।
मेरा यह आलेख पटाखों के इतिहास की परतों को खोलता है, उनके मूल तत्व बारूद के भारत में आगमन की पड़ताल करता है, व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले अरबों रुपये के खर्च का आकलन करता है, और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, हर साल पटाखों के कारण होने वाली भयावह अग्नि दुर्घटनाओं और उनके तथ्यों पर प्रकाश डालता है। यह विश्लेषण हमें पारंपरिक उत्सव और आधुनिक जीवन की चुनौतियों के बीच एक महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को समझने में मदद करता है।
1. पटाखों का उद्गम और बारूद का ऐतिहासिक आगमन।
पटाखों का इतिहास सीधे तौर पर उनके मूल घटक—बारूद—के इतिहास से जुड़ा हुआ है।

1.1 बारूद का जन्म और प्रारंभिक उपयोग
आतिशबाजी का जन्मस्थान चीन माना जाता है, जहाँ 7वीं से 9वीं शताब्दी (तांग राजवंश) के बीच गलती से बारूद का आविष्कार हुआ था। बारूद (Gunpowder), जिसे चीनी लोग “हूओ याओ” (आग की दवा) कहते थे, चीन के चार महान आविष्कारों में से एक है। यह मूल रूप से कीमियागरों द्वारा अमरता का अमृत खोजने के प्रयास में पोटेशियम नाइट्रेट (शोरा/सोर), कोयला (चारकोल) और गंधक (सल्फर) को मिलाकर बनाया गया था।
शुरुआत में, बारूद का उपयोग मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और जादुई उद्देश्यों के लिए किया जाता था। चीनी मानते थे कि बांस की नलियों में भरे इस मिश्रण को जलाने से होने वाली तेज आवाज दुष्ट आत्माओं और विपत्तियों को दूर भगाती है। 10वीं शताब्दी तक, बांस की नलिकाओं को कागज़ के खोल से बदल दिया गया, जिससे आधुनिक पटाखों का प्रारंभिक रूप सामने आया।
1.2 बारूद की भारत में आमद

बारूद का भारत में आगमन थोड़ा विवादास्पद है, लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्य मुख्य रूप से मध्यकाल के दौरान सैन्य उपयोग के साथ इसके जुड़ाव को दर्शाते हैं।
- सैन्य मार्ग: सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत सिद्धांत यह है कि बारूद मध्य एशिया और फारस के माध्यम से भारत पहुँचा। 13वीं शताब्दी तक, मंगोलों के आक्रमणों के साथ या अरब व्यापारियों के माध्यम से बारूद का ज्ञान भारतीय उपमहाद्वीप में फैल चुका था।
- दिल्ली सल्तनत और मुग़ल काल: बारूद का संगठित और प्रभावी सैन्य उपयोग सबसे पहले दिल्ली सल्तनत के शासनकाल में देखा गया। हालांकि, इसे भारत में निर्णायक रूप से स्थापित करने का श्रेय अक्सर बाबर (16वीं शताब्दी) को दिया जाता है, जिसने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में तोपों (जिसमें बारूद का उपयोग होता था) का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया।
- आतिशबाजी का प्रवेश: मुग़ल बादशाहों के दरबार में आतिशबाजी का प्रचलन सैन्य तोपों के इस्तेमाल के बाद तेजी से बढ़ा। मुग़ल उत्सवों और शाही समारोहों में रंगीन और शोरगुल वाली आतिशबाजी एक अनिवार्य हिस्सा बन गई थी। ‘आईन-ए-अकबरी’ जैसी ऐतिहासिक कृतियों में भी उत्सवों के दौरान आतिशबाजी के उपयोग का उल्लेख मिलता है, जो दर्शाता है कि 16वीं शताब्दी तक यह मनोरंजन का एक स्थापित रूप बन चुका था।
दीपावली जैसे धार्मिक त्योहारों पर इसका व्यापक प्रचलन 20वीं शताब्दी में, विशेष रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के बाद, औद्योगीकरण और आतिशबाजी के सस्ता होने के कारण तेज़ी से बढ़ा।
2. पटाखों की अर्थव्यवस्था और व्यक्तिगत खर्च।

भारत में पटाखों का उद्योग एक विशाल, बहु-अरब डॉलर का वार्षिक कारोबार है, जिसका केंद्र तमिलनाडु का शिवकाशी शहर है। यह उद्योग देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ लाखों लोगों की आजीविका को भी प्रभावित करता है।
2.1 भारतीय पटाखा उद्योग का पैमाना
भारतीय पटाखा उद्योग का वार्षिक कारोबार अनुमानित रूप से 6,000 करोड़ रुपये से 10,000 करोड़ रुपये के बीच है। यह उद्योग एक मौसमी चक्र पर चलता है, जिसकी लगभग 90% बिक्री दीपावली के त्योहार के आसपास केंद्रित होती है।
- उत्पादन केंद्र: शिवकाशी (तमिलनाडु) को भारत की ‘पटाखा राजधानी’ कहा जाता है, जहाँ देश के 90% से अधिक पटाखे बनाए जाते हैं। यह क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार देता है, जिससे यह स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन जाता है।
- रोजगार: इस उद्योग में लगभग 3 लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।
- आपूर्ति श्रृंखला: उत्पादन से लेकर खुदरा बिक्री तक, एक जटिल आपूर्ति श्रृंखला काम करती है जिसमें कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता, निर्माता, थोक व्यापारी और स्थानीय खुदरा विक्रेता शामिल होते हैं।
2.2 व्यक्तियों द्वारा होने वाला खर्च (Expenditure by Individuals)
पटाखों पर होने वाला व्यक्तिगत खर्च किसी भी देश की त्योहारों से जुड़ी अर्थव्यवस्था का एक आश्चर्यजनक पहलू है।
- उच्च डिस्पोजेबल आय का प्रभाव: जैसे-जैसे शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लोगों की डिस्पोजेबल आय (Disposable Income) बढ़ी है, पटाखों पर खर्च भी तेजी से बढ़ा है। यह खर्च अब केवल प्रतीकात्मक आतिशबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘फैंसी’ और आयातित (अवैध रूप से) पटाखों पर होता है जो अधिक शोर और रोशनी पैदा करते हैं।
- औसत घरेलू खर्च: विभिन्न बाजार सर्वेक्षणों के अनुमानों के अनुसार, एक औसत भारतीय परिवार जो दीपावली पर पटाखे जलाता है, वह इस पर 500 रुपये से लेकर 5,000 रुपये या इससे भी अधिक खर्च करता है। उच्च आय वर्ग के परिवारों में यह आंकड़ा आसानी से 10,000 रुपये के पार चला जाता है, जिसमें महंगी आतिशबाजी डिस्प्ले शामिल होती है।
- कुल आर्थिक बहिर्वाह: यदि केवल 10 करोड़ परिवार 1,000 रुपये का औसत खर्च करते हैं, तो दीपावली पर पटाखों पर होने वाला कुल खर्च 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है, जो उद्योग के वार्षिक कारोबार के बराबर है। यह विशाल राशि त्योहार के उत्साह के कारण हर साल हवा में उड़ जाती है, जिसका कोई स्थायी आर्थिक या सामाजिक मूल्य नहीं होता।
- पर्यावरणीय लागत: इस व्यक्तिगत खर्च के अलावा, प्रदूषण को नियंत्रित करने, स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करने और आग से हुई क्षति की मरम्मत में सरकार और नागरिकों द्वारा एक अदृश्य पर्यावरणीय और स्वास्थ्य लागत भी वहन की जाती है, जो इस 10,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को और भी बढ़ा देती है।
3. अग्नि दुर्घटनाओं का गंभीर पहलू।
पटाखों का सबसे भयावह परिणाम वे आग की दुर्घटनाएँ हैं जो हर साल दीपावली की रात और उसके आसपास होती हैं। ये दुर्घटनाएँ संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाती हैं और दुर्भाग्य से, अक्सर जानलेवा भी साबित होती हैं।

3.1 अग्नि दुर्घटनाओं के आंकड़े
आतिशबाजी से लगने वाली आग की घटनाओं का सबसे सटीक आंकड़ा फायर ब्रिगेड सेवाओं द्वारा दर्ज किया जाता है।
- दीपावली की रात का चरम: दीपावली की रात, देश भर में फायर ब्रिगेड सेवाओं पर कॉल का बोझ सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाता है।
- दिल्ली अग्निशमन सेवा (DFS) के तथ्य: कवल दिल्ली में, दीपावली की रात को आग से संबंधित कॉल्स की संख्या अक्सर 200 से 400 के बीच दर्ज की जाती है, जबकि सामान्य दिनों में यह संख्या 20-30 के आसपास रहती है। उदाहरण के लिए, एक विशिष्ट वर्ष की दीपावली की रात (2022-2024 के बीच), DFS को 200 से अधिक आग की कॉल्स मिलीं, जिनमें से अधिकांश पटाखों के कारण थीं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि आग लगने की घटनाओं में 1000% से अधिक की वृद्धि होती है।
- घटनाओं के प्रकार: आग लगने की अधिकांश घटनाएँ निम्नलिखित कारणों से होती हैं:
- छतों पर रॉकेटों का गिरना: लापरवाही से चलाए गए रॉकेट अक्सर घरों की छतों, बालकनी या अस्थायी शेड्स पर गिर जाते हैं, जिससे आग लग जाती है।
- खुले में जमा ज्वलनशील सामग्री: पटाखों के जलने से निकलने वाली चिंगारी घास, सूखी पत्तियाँ, या खुले में जमा कचरे में आग लगा देती है, जो बाद में बड़े क्षेत्रों में फैल जाती है।
- वाहनों को नुकसान: सड़कों पर खड़े वाहनों पर गिरी चिंगारी या पटाखे वाहनों को जला देते हैं।
- दुकानों में आग: पटाखों के अत्यधिक ज्वलनशील स्टॉक के कारण अवैध रूप से चल रहे गोदामों या अस्थायी दुकानों में बड़ी आग की घटनाएँ होती हैं, जिनमें संपत्ति का भारी नुकसान होता है।
3.2 संपत्ति और जीवन की हानि
आग लगने की घटनाओं का आर्थिक और मानवीय नुकसान बहुत बड़ा होता है:
- आर्थिक क्षति: आग से घरों, दुकानों और औद्योगिक इकाइयों को करोड़ों रुपये का नुकसान होता है। यह नुकसान केवल सीधे संपत्ति के नुकसान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बीमा दावों, व्यापार में रुकावट और पुनर्निर्माण की लागत को भी बढ़ाता है।
- मानवीय नुकसान: हर साल, सैकड़ों लोग पटाखों से जुड़ी आग और विस्फोटों के कारण घायल होते हैं।
- आँखों की चोटें: सबसे आम चोटों में आँखों का जलना और आँखों की रोशनी का नुकसान शामिल है, जिनमें से कई मामले लाइलाज साबित होते हैं।
- जलन: बच्चों और वयस्कों दोनों में गंभीर जलन के मामले दर्ज किए जाते हैं।
- दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु: कभी-कभी, पटाखों के अवैध निर्माण या बड़े विस्फोटों के कारण लोगों की दुखद मृत्यु भी हो जाती है।

3.3 सुरक्षा नियम और उल्लंघन
पटाखों से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट और सरकारी एजेंसियों द्वारा कड़े नियम बनाए गए हैं (जैसे रात 10 बजे के बाद पटाखों पर प्रतिबंध, केवल ग्रीन पटाखों की अनुमति), लेकिन दुर्भाग्य से, हर साल इन नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन होता है। पटाखों के लिए सुरक्षा मानकों की अनदेखी और अनधिकृत निर्माण स्थल दुर्घटनाओं के लिए एक टाइम बम का काम करते हैं।
4. पटाखों का रासायनिक और पर्यावरणीय प्रभाव।
हालांकि यह लेख मुख्य रूप से आग और अर्थव्यवस्था पर केंद्रित है, पटाखों की रासायनिक संरचना उनके हानिकारक प्रभावों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
- विषैले रसायन: पटाखे केवल शोर और धुआँ नहीं पैदा करते; वे वायुमंडल में कई जहरीले भारी धातु कण और गैसें छोड़ते हैं।
- बेरियम नाइट्रेट: हरा रंग देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो श्वास संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है।
- स्ट्रोंटियम लवण: लाल रंग के लिए, जो जहरीला होता है।
- लेड (सीसा) और कैडमियम: ये भारी धातुएँ श्वसन तंत्र और तंत्रिका तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती हैं।
- गैसीय उत्सर्जन: सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन होता है, जो अम्लीय वर्षा और गंभीर श्वसन रोगों में योगदान देता है।

पुनरावलोकन और जिम्मेदारी।
पटाखे, जो कभी आध्यात्मिक सुरक्षा और शाही उत्सव का प्रतीक थे, आज एक विशाल, मौसमी उद्योग बन चुके हैं, जो अरबों का कारोबार करता है, लेकिन साथ ही हर साल प्रदूषण, स्वास्थ्य संकट और संपत्ति को बड़े नुकसान का कारण भी बनता है।
बारूद के ऐतिहासिक आगमन ने भारत को सैन्य और उत्सव दोनों ही क्षेत्रों में एक नया आयाम दिया, लेकिन 21वीं सदी में हमें इस बारूदी जश्न की लागत का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। व्यक्तियों द्वारा हजारों रुपये खर्च करने का सामाजिक औचित्य तब समाप्त हो जाता है जब हम दीपावली की अगली सुबह आग से झुलसे घरों और सांस की तकलीफ से जूझते रोगियों को देखते हैं।
आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि दीपावली की रात अग्नि दुर्घटनाओं के लिए एक ‘रेड अलर्ट’ होती है। इस विरोधाभास को खत्म करने के लिए कड़े नियमों को लागू करना, ग्रीन और इको-फ्रेंडली विकल्पों को बढ़ावा देना और नागरिकों द्वारा स्वैच्छिक रूप से ज़िम्मेदारी निभाना अपरिहार्य है। हमें उत्सव की भावना को बरकरार रखना होगा, लेकिन अब समय आ गया है कि शोर और धुएं के स्थान पर, हम शुद्ध प्रकाश, स्वास्थ्य और सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाएं।