एक ऐसी आवाज़ जो सिर्फ गूंजती नहीं, बदलाव भी लाती है

लेखक: सुल्तान अहमद और शनि श्रीवास्तव
बलरामपुर की एक सुबह। तुलसीपुर ब्लॉक की गलियों में धूप धीरे-धीरे उतर रही है। कहीं चूल्हे की राख से धुआँ उठता है, तो कहीं स्कूल जाने की हड़बड़ाहट में बच्चों की चप्पलों की आवाज़ कान में गूंज रही है है । और उसी बीच, अपने आँगन में खड़ी एक महिला, प्रियंका सिंह, अपने जीवन की सबसे गहरी साँस लेती है — साँस नहीं, फैसला।
कभी जिसकी दुनिया रसोई और रिश्तों के बीच सिमटी थी, आज वह तकनीक की दुनिया से जुड़कर आवाज़ बन गई है — उन महिलाओं की, जो चुप रहीं, क्योंकि बोलने का हक़ उन्हें कभी मिला ही नहीं था।
प्रियंका कोई रसूखदार महिला नहीं , कोई बड़ी पहचान भी नहीं — एक आम महिला हैं। पर उनके भीतर जो आग थी, उसने उन्हें खास बना दिया।
शुरुआत आसान नहीं थी।
जब उन्होंने पहली बार गांव की एक बैठक में ग्राम वाणी और मोबाइल वाणी की बात सुनी, तो उन्हें यह सिर्फ एक तकनीकी प्लेटफॉर्म नहीं लगा — यह लगा, मानो किसी ने उनके भीतर की दबी आवाज़ को पहली बार सुन लिया हो।
लेकिन घर और समाज में उठने लगे अनेकों सवाल :
“औरत होकर बाहर जाओगी?”
“किस ज़रूरत ने यह सब करने को कहा?”
पति ने विरोध किया, मोहल्ले ने ताने मारे
पर प्रियंका डरी नहीं।
सीनियर साथियों की मदद से पति को समझाया और धीरे-धीरे समाज की दीवारों में अपनी आवाज़ की दरारें बनानी शुरू कीं।
ग्राम वाणी से जुड़ने के बाद, उन्होंने ट्रेनिंग ली — महिला भूमि अधिकार, IVR, टोल-फ्री नंबर, डिजिटल साक्षरता, सामुदायिक मीडिया , समुदायिक प्रबंधन, अकत्रीकरण जैसे विषयों पर। और फिर, एक नई प्रियंका ने जन्म लिया — जो न केवल खुद जागरूक थी, बल्कि दूसरों को भी जगाने का बीड़ा उठा लिया।
हर हफ्ते कई मीटिंग, कई रिकॉर्डिंग, सेकड़ों नई आवाज़ और समुदायिक समस्याओं का अंबार।
वह अब गाँव की महिलाओं के बीच सिर्फ एक दीदी नहीं, उनकी उम्मीद बन गई थीं।

अपने प्रयास से:
- 5000 से अधिक महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया,
- 100 से ज़्यादा महिलाओं को महिला उद्यमिता कार्यक्रम से जोड़ा और उनके रोजगार स्थापित करने में मदद की
- 200 से अधिक महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार के रास्ते दिखाए , उम्मीद की किरण बनकर प्रतीत हुई ।
और यह सब करते हुए भी, उन्होंने खुद की पढ़ाई नहीं छोड़ी।
दिल्ली स्थित ग्राम वाणी संस्था की तरफ़ से मिलने वाली 3-4 हज़ार रुपये की तकनीकी सहभागिता राशि को उन्होंने सिर्फ खर्च नहीं किया — उससे अपनी एम.ए. की पढ़ाई पूरी की, और अपने बच्चों के सपनों में निवेश किया।
अब वह सिर्फ एक गृहिणी नहीं, एक विकास उद्यमी हैं — जो बदलाव की राह पर न सिर्फ चल रही हैं, बल्कि दूसरों को साथ लेकर चल रही हैं।
जब कोई कहता है -“औरत क्या कर सकती है?” तो प्रियंका की कहानी जवाब बनकर खड़ी हो जाती है।
उनका संदेश सीधा, सशक्त और जरूरी है —
“अपने सपनों को मत मारो। समाज से पहले खुद को सुनो। जब तुम खुद को पहचानोगी, तभी समाज भी तुम्हारी पहचान मानेगा।”
आज प्रियंका सिंह, तुलसीपुर की गलियों में नहीं, लाखों दिलों में गूंज रही हैं -एक ऐसी आवाज़ बनकर, जो सिर्फ गूंजती नहीं, बदलाव भी लाती है।