महिला दिवस के बाद, क्या बदली ज़मीन की हकीकत?

लेखक: राजेन्द्र प्रसाद, हरयाणा।

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हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पूरे देश और दुनिया में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष भी हरियाणा सहित कई राज्यों में महिला दिवस के अवसर पर बड़े कार्यक्रम आयोजित हुए। सिरसा जिले में राज्य स्तरीय आयोजन में लाखों महिलाओं की भागीदारी देखने को मिली। यह भागीदारी निश्चित रूप से महिलाओं की बढ़ती जागरूकता और एकजुटता का संकेत है।
लेकिन महिला दिवस के आयोजन और उत्सव खत्म होने के बाद एक महत्वपूर्ण सवाल हमारे सामने खड़ा होता है—क्या इन आयोजनों के बाद महिलाओं की ज़मीनी हकीकत में कोई ठोस बदलाव आता है? महिला दिवस का मूल उद्देश्य केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि लैंगिक समानता, महिलाओं के अधिकार, प्रजनन स्वास्थ्य, और उनके खिलाफ होने वाली हिंसा व भेदभाव जैसे गंभीर मुद्दों पर समाज और सरकार का ध्यान केंद्रित करना है। इस दृष्टि से देखा जाए तो आज भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती।
यह सच है कि आज महिलाएं शिक्षा, प्रशासन, राजनीति और अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। उनकी भागीदारी और उपलब्धियां पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देती हैं। लेकिन अगर हम परिवार और समाज के अंदर झांककर देखें, तो महिलाओं की स्वतंत्रता, उनके निर्णय लेने के अधिकार और उनके विचारों को महत्व देने जैसे मुद्दों पर अपेक्षित बदलाव अभी भी अधूरा है।

आज भी अनेक घरों में महिलाओं के निर्णयों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई जगहों पर उन्हें आज भी एक श्रमशक्ति, संतान उत्पत्ति के माध्यम या उपभोग की वस्तु के रूप में देखा जाता है। यह सोच ही लैंगिक असमानता की जड़ है, जो आज भी समाज में गहराई तक मौजूद है। भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध इस असमानता का सबसे क्रूर उदाहरण हैं। सरकार द्वारा सख्त कानून बनाए जाने के बावजूद, यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है। आए दिन समाचारों में अवैध क्लीनिकों और इसमें शामिल लोगों के पकड़े जाने की खबरें इस बात का प्रमाण हैं कि कानून से ज्यादा जरूरी सामाजिक मानसिकता में बदलाव है।
इसके साथ ही, युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति भी एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनकर उभरी है। इसका सीधा असर महिलाओं के खिलाफ हिंसा और दुर्व्यवहार के रूप में सामने आता है। हरियाणा में इसका एक और चिंताजनक परिणाम यह देखने को मिल रहा है कि स्थानीय स्तर पर विवाह योग्य युवकों की कमी के चलते अन्य राज्यों—बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और असम—से लड़कियों को दुल्हन बनाकर लाने का चलन बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति कई बार “ब्राइड ट्रैफिकिंग” का रूप ले लेती है, जहां गरीब परिवारों की लड़कियों को बहला-फुसलाकर या धोखे से लाया जाता है और उन्हें ऐसे परिवारों में भेज दिया जाता है, जहां उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिलता। यह न केवल महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि मानवता के लिए भी एक गंभीर चुनौती है।
हरियाणा के अनेक गांवों में आज बाहरी राज्यों से आई महिलाएं रह रही हैं, लेकिन उनकी स्थिति बेहद चिंताजनक है। उन्हें अक्सर स्थानीय महिलाओं के बराबर सम्मान नहीं मिलता। कई मामलों में उनसे खेतों और घरों में मजदूरी करवाई जाती है, उनकी पहचान पत्र नहीं बनवाए जाते, और उन्हें संपत्ति में अधिकार से वंचित रखा जाता है। पति की मृत्यु के बाद ऐसी महिलाओं को घर से निकाल देने के मामले भी सामने आते हैं, जिससे वे न्याय के लिए भटकने को मजबूर हो जाती हैं। यह स्थिति न केवल सामाजिक असंवेदनशीलता को दर्शाती है, बल्कि प्रशासनिक विफलता को भी उजागर करती है।

यह समझना जरूरी है कि किसी भी महिला या पुरुष का दूसरे राज्य में विवाह करना कोई अपराध नहीं है। अपराध है—उन्हें समान अधिकार और सम्मान न देना, उनके साथ भेदभाव करना और उनका शोषण करना। इसमें समाज के साथ-साथ सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी भी तय होती है।
महिला दिवस 2026 का थीम “दान से लाभ” था, जो इस बात पर जोर देता है कि समाज और सरकार को मिलकर लैंगिक समानता की दिशा में काम करने वाले प्रयासों को समर्थन देना चाहिए। लेकिन अब, जब महिला दिवस बीत चुका है, तो यह समय आत्ममंथन का है—क्या हम केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित रह गए हैं, या वास्तव में बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? जरूरत है कि महिला दिवस को एक प्रतीकात्मक आयोजन से आगे बढ़ाकर उसे निरंतर सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाए। इसके लिए समाज में सोच का बदलाव सबसे जरूरी है। साथ ही, सरकार को भी चाहिए कि वह महिलाओं—खासतौर पर हाशिए पर खड़ी महिलाओं—के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए।
महिला दिवस के बाद अब असली चुनौती शुरू होती है—उन संकल्पों को जमीन पर उतारने की, जो हमने 8 मार्च को लिए थे। यदि हम वास्तव में एक समान और न्यायपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें हर दिन महिला दिवस की भावना को जीवित रखना होगा। तभी इस दिवस की वास्तविक सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।
(लेखक सोशल एक्टिविस्ट हैं. और पिछले कई वर्षों से इंपॉवर पिपुल संस्था की टीम मेंबर के रुप में ब्राइड ट्रैफिकिंग के खिलाफ काम कर रहे हैं. इसके अलावा विभिन्न समाजिक मुद्दों पर काम करने का लंबा अनुभव भी रखते हैं)