सखी नेता की कहानी, जहाँ हुनर सबसे बड़ा उपहार है।

अनीस आर खान, नई दिल्ली
“हम पहले साथ मिलकर बल्ब बनाना सीखते थे, और अब साथ मिलकर अचार बना रहे हैं। हम सिर्फ काम ही नहीं करते—हम एक-दूसरे के साथ नई स्किल्स भी साझा करते हैं और एक-दूसरे को आगे बढ़ने में मदद करते हैं।”
रुपाली, जो आज सखी नेता के रूप में पहचानी जाती हैं, यह बात किसी मंच से नहीं कह रहीं। वे यह बात मुस्कुराते हुए, अपने अनुभव को याद करते हुए कहती हैं। उनके शब्दों में आत्मगौरव है, संघर्ष की स्मृतियाँ हैं और भविष्य की उम्मीद भी। यह वाक्य किसी एक महिला की नहीं, बल्कि सैकड़ों उन महिलाओं की आवाज़ है, जो चुपचाप अपने हालात बदल रही हैं—एक-दूसरे का हाथ थामकर।
क्रिसमस आमतौर पर चमकती रोशनियों, उपहारों और उत्सवों का त्योहार माना जाता है। लेकिन इस साल यमुनानगर और धुबरी में क्रिसमस का मतलब कुछ और था। यहाँ न तो महंगे तोहफे थे और न ही भव्य सजावट। यहाँ उपहार के रूप में हुनर, समय, सहयोग और भरोसा बाँटा जा रहा था। यहाँ महिलाएँ किसी से कुछ पाने की उम्मीद में नहीं थीं—वे खुद एक-दूसरे की सीक्रेट सांता बन चुकी थीं।
हुनर बाँटने से बदलती ज़िंदगी।
सखी नेता कार्यक्रम से जुड़ी महिलाएँ पहले अलग-अलग ज़िंदगियाँ जी रही थीं। कोई घरेलू कामों तक सीमित थी, कोई मज़दूरी करती थी, तो कोई अपने हुनर को पहचान ही नहीं पाई थी। लेकिन जब महिलाएँ एक-दूसरे के साथ बैठीं, बातचीत शुरू हुई और सीखने-सिखाने का सिलसिला चला—तो कुछ बदलने लगा।

कहीं एक महिला बल्ब बनाना सीख चुकी थी, तो उसने वही हुनर दूसरी को सिखाया। कहीं अचार बनाने की परंपरागत जानकारी को व्यावसायिक रूप दिया गया। किसी ने पैकेजिंग सीखी, किसी ने हिसाब-किताब। सीखने की यह प्रक्रिया किसी ट्रेनिंग हॉल में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बीच चलती रही।
यहाँ कोई “टीचर” और “स्टूडेंट” नहीं था—सब एक-दूसरे की सखी थीं।
एंपावर पीपल : सशक्तिकरण की साझी सोच।
दिल्ली स्थित गैर-सरकारी संस्था एंपावर पीपल पिछले कई वर्षों से महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए काम कर रही है। संस्था का मानना है कि सशक्तिकरण का मतलब केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, निर्णय लेने की क्षमता और नेतृत्व को मजबूत करना है।
सखी नेता कार्यक्रम इसी सोच का विस्तार है। यह कार्यक्रम महिलाओं को सिर्फ प्रशिक्षण नहीं देता, बल्कि उन्हें आगे आकर नेतृत्व करने का अवसर देता है—अपने समुदाय के भीतर, अपने अनुभवों के आधार पर।
जब क्रिसमस बना सामूहिक उत्सव।
इस साल क्रिसमस के मौके पर यमुनानगर और धुबरी में जो दृश्य देखने को मिला, वह सामान्य उत्सवों से अलग था। महिलाएँ, बच्चे और समुदाय के लोग एक साथ इकट्ठा हुए। गीत गाए गए, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हुईं, बच्चों की हँसी गूँजी—लेकिन सबसे खास बात यह थी कि इन कार्यक्रमों का संचालन खुद सखी नेता महिलाएँ और किशोरियाँ कर रही थीं।
कोई मंच से अपनी बात रख रही थी, कोई बच्चों को कार्यक्रम के लिए तैयार कर रही थी, तो कोई पूरे आयोजन का समन्वय संभाल रही थी। यह सिर्फ उत्सव नहीं था—यह आत्मविश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन था।

यह एक ऐसा माहौल था, जहाँ महिलाओं को न तो सहानुभूति की ज़रूरत थी और न ही किसी की अनुमति की। यहाँ वे अपने अस्तित्व को लेकर आश्वस्त थीं।
सम्मान, सुरक्षा और अपनापन।
इन आयोजनों में एक चीज़ साफ दिखाई दी—गरिमा। यह वह गरिमा थी, जो तब पैदा होती है जब किसी को सुना जाता है, समझा जाता है और सम्मान दिया जाता है। महिलाओं और किशोरियों के लिए यह एक सुरक्षित स्थान था, जहाँ वे खुलकर बोल सकती थीं, हँस सकती थीं और अपने सपने साझा कर सकती थीं।
यही वह माहौल है, जहाँ असली बदलाव जन्म लेता है।
डिजिटल पहुँच: एक छोटा साधन, बड़ा बदलाव।
एंपावर पीपल का मानना है कि आज के दौर में सशक्तिकरण की एक अहम कड़ी डिजिटल कनेक्टिविटी है। मोबाइल फोन अब सिर्फ बातचीत का साधन नहीं रहा—यह जानकारी, अवसर और नेटवर्क का दरवाज़ा है।
इसी सोच के तहत संस्था https://www.empowerpeople.in ने एक भावनात्मक लेकिन व्यावहारिक अपील की है—
अपने पुराने मोबाइल फोन दान करें।

एक पुराना मोबाइल फोन सखी नेता की किसी महिला के लिए क्या-क्या कर सकता है?
वह उसे दूसरी महिलाओं से जुड़े रहने में मदद कर सकता है।
उसे सरकारी योजनाओं और ज़रूरी सेवाओं की जानकारी दिला सकता है।
वह उसके काम को व्यवस्थित करने और ग्राहकों से संपर्क बनाए रखने का ज़रिया बन सकता है।
और सबसे बढ़कर—वह उसके छोटे से व्यवसाय को आगे बढ़ाने में सहायक बन सकता है।
जो फोन किसी घर में बेकार पड़ा है, वही किसी और के लिए आत्मनिर्भरता का पहला कदम बन सकता है।
असली क्रिसमस की रौशनी।
इस पूरी पहल से एक बात साफ होती है—असली बदलाव ऊपर से नहीं आता, वह भीतर से पैदा होता है। जब महिलाएँ एक-दूसरे पर भरोसा करती हैं, एक-दूसरे को आगे बढ़ाती हैं और साथ चलती हैं—तो समाज खुद-ब-खुद मजबूत होने लगता है।
इस क्रिसमस, यमुनानगर और धुबरी में कोई एक सांता नहीं था।
यहाँ हर महिला, हर किशोरी—किसी न किसी की सीक्रेट सांता थी।
और शायद यही इस कहानी का सबसे सुंदर संदेश है।
एंपावर पीपल संस्था से संपर्क करने के लिए यहां https://www.empowerpeople.in विजिट करें.