बकरी पालन में नई उम्मीद और सरकारी योजनाओं का सहारा

मथुरा से लहर हिंदी के लिए अनीस आर खान की विशेष रिपोर्ट।
मथुरा की धरती, जिसे श्रीकृष्ण की लीलाओं और ब्रज संस्कृति के लिए जाना जाता है, आज एक और वजह से सुर्ख़ियों में है। यहाँ फ़रह ब्लॉक के मखदूम गाँव में स्थित है “सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऑन गोट्स (CIRG)”—एक ऐसा राष्ट्रीय स्तर का संस्थान जिसने बकरी पालन को नई पहचान दी है।
बकरी को अक्सर “गरीब आदमी की गाय” कहा जाता है। यह उपमा यूँ ही नहीं बनी। छोटे किसान, भूमिहीन मज़दूर, महिलाएँ और आदिवासी समुदाय। इन सबके लिए बकरी रोज़ी-रोटी और पोषण सुरक्षा का सबसे आसान साधन है। यही वजह है कि CIRG का काम आज न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है।
संस्थान की शुरुआत।

साल 1979 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने इस संस्थान की स्थापना की। उद्देश्य साफ़ था। कि बकरी पालन को वैज्ञानिक पद्धति से आगे बढ़ाना और इसे ग्रामीण आजीविका का मजबूत आधार बनाना।
आज CIRG में दर्जनों शोधकर्ता, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ काम करते हैं। यहाँ न सिर्फ़ बकरी की नस्ल सुधार पर शोध होता है, बल्कि किसान प्रशिक्षण, रोग-नियंत्रण, चारा प्रबंधन और व्यावसायिक मॉडल तक तैयार किए जाते हैं।
बकरी पालन क्यों अहम है?

भारत में आज लगभग 15 करोड़ बकरियाँ हैं। यह संख्या दुनिया में सबसे अधिक है।
- बकरी का दूध औषधीय गुणों से भरपूर है, जिसे बच्चे और बुज़ुर्ग आसानी से पचा सकते हैं।
- बकरी का मांस (chevon) देशी बाज़ार में भी खूब बिकता है और निर्यात में भी उपयोगी है।
- कम निवेश और कम जगह में भी बकरी पालन संभव है।
- महिलाएँ और बुज़ुर्ग भी इसे आसानी से संभाल सकते हैं।
- बकरी के गोबर से जैविक खाद तैयार होती है, जो खेती को सहारा देती है।
इसलिए कहा जाता है। कि बकरी पालन गरीब से गरीब परिवार को भी आत्मनिर्भर बना सकता है।
CIRG, शोध और प्रशिक्षण की प्रयोगशाला।

मखदूम स्थित इस विशाल कैंपस में बकरियों के लिए फार्म, शोध प्रयोगशालाएँ और किसान प्रशिक्षण हॉल हैं। यहाँ प्रमुखत: बरबरी, जमुनापारी, सिरोही, बीटल और ब्लैक बंगाल नस्लों पर काम होता है।
संस्थान में विकसित की गई प्रमुख तकनीकें:
- टीकाकरण और रोग नियंत्रण किट
- आर्टिफ़िशियल इन्सेमिनेशन (कृत्रिम गर्भाधान)
- फीड ब्लॉक और मिनरल मिक्स
- नस्ल सुधार और हाई-यील्ड मॉडल
संस्थान हर साल सैकड़ों किसानों और महिला समूहों को प्रशिक्षण देता है। प्रशिक्षण तीन दिन से पंद्रह दिनों तक के मॉड्यूल में होता है।
किसान कैसे ले सकते हैं प्रशिक्षण?

यदि कोई किसान या महिला स्वयं सहायता समूह यहाँ प्रशिक्षण लेना चाहे, तो प्रक्रिया सरल है:
- वेबसाइट (https://cirg.res.in) पर जाकर प्रशिक्षण कार्यक्रमों की तिथियाँ देखी जा सकती हैं।
- आवेदन ऑनलाइन या सीधे संस्थान को डाक से भेजा जा सकता है।
- निर्धारित शुल्क जमा करने के बाद किसान को नामांकित किया जाता है।
- प्रशिक्षण के दौरान ठहरने और भोजन की सुविधा संस्थान उपलब्ध कराता है।
संपर्क:
Director, Central Institute for Research on Goats (CIRG), Makhdoom, Farah, Mathura (U.P.) – 281122
फोन: 0565-2763380
ईमेल: dir.cirg@icar.gov.in
किसानों के अनुभव।
राजस्थान के नागौर से आई गीता देवी कहती हैं कि “हम पहले पारंपरिक तरीके से बकरियाँ पालते थे। कई बार जानवर बीमार होकर मर जाते थे। CIRG में प्रशिक्षण लेने के बाद हमने सीखा कि टीकाकरण और साफ़-सफ़ाई कितनी ज़रूरी है। अब हमारी आय दोगुनी हो गई है।”
मध्य प्रदेश के एक युवा किसान ने बताया कि “CIRG से सीखी हुई तकनीक से हमने छोटा-सा फार्म शुरू किया। अब हर महीने 40 से 50 हज़ार रुपये तक की आमदनी हो रही है।”
सरकारी योजनाएँ।
सिर्फ़ प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि सरकार भी बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएँ चला रही है।
1. राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM)
- प्रजनन फार्म, चारा यूनिट और बकरी पालन प्रोजेक्ट पर 50% तक सब्सिडी।
- आवेदन: dahd.gov.in
2. उत्तर प्रदेश बकरी पालन योजना
- 20 लाख से 1 करोड़ तक का ऋण + 50% तक सब्सिडी।
- आवेदन: Udyam-I-Mitra पोर्टल या राज्य पशुपालन विभाग से।
3. अनुसूचित जाति परिवारों के लिए विशेष योजना (यूपी)
- 5 मादा + 1 नर बकरा उपलब्ध कराया जाता है।
- लागत लगभग ₹60,000, जिसमें से ₹54,000 सरकार वहन करती है (90% सहायता)।
4. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (MUDRA Loan)
- छोटे पैमाने पर बकरी पालन के लिए ऋण उपलब्ध।
5. अन्य राज्य योजनाएँ।
- हिमाचल प्रदेश की कृषक बकरी पालन योजना
- मध्य प्रदेश व राजस्थान में भी विशेष बकरी पालन प्रोत्साहन योजनाएँ हैं।
आवेदन प्रक्रिया।
- पात्रता जाँचें – योजनाओं में SC/ST, महिला समूह, सामान्य किसान सभी के लिए अलग श्रेणियाँ हैं।
- प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करें – कितनी बकरियाँ, किस नस्ल की, चारा-आहार व स्वास्थ्य प्रबंधन का विवरण।
- ऑनलाइन आवेदन – राष्ट्रीय पशुधन मिशन या Udyam-I-Mitra पोर्टल पर।
- ऑफ़लाइन आवेदन – जिला पशु चिकित्सालय या राज्य पशुपालन विभाग में।
- अनुदान प्राप्त करें – परियोजना लागू होने के बाद सब्सिडी जारी होती है।
भविष्य की राह।

CIRG और सरकारी योजनाओं का साझा लक्ष्य है—
- बकरी पालन को एग्री-बिज़नेस मॉडल में बदलना।
- युवाओं के लिए स्टार्ट-अप अवसर बनाना।
- महिलाओं को बकरी आधारित SHG मॉडल से सशक्त करना।
- बकरी दूध से मूल्यवर्धित उत्पाद (चीज़, आइसक्रीम, दही) तैयार करना।
मथुरा का CIRG यह साबित करता है कि यदि परंपरा में विज्ञान का मेल हो जाए, तो छोटे किसान भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। बकरी पालन अब सिर्फ़ “गरीब आदमी की गाय” नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बन चुका है।
सरकारी योजनाएँ और CIRG जैसे संस्थान मिलकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि भारत का हर किसान आत्मनिर्भर हो और हर घर में पोषण की गारंटी मिले।