कश्मीर में वार्षिक परीक्षाएँ शुरू — उम्मीदें बहुत, व्यवस्थाएँ कमजोर

रिपोर्ट: मोहम्मद अयूब कटारिया वारसन, कुपवाड़ा, कश्मीर

कश्मीर घाटी के सरकारी स्कूलों में इस सप्ताह पहली से आठवीं कक्षा तक की वार्षिक परीक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं।
सुबह-सुबह बच्चे अपने बैग और किताबों के साथ स्कूलों की ओर निकल रहे हैं। कुछ के चेहरों पर उत्साह है, तो कुछ के मन में घबराहट। मगर इस दृश्य के पीछे एक सच्चाई है। कि
क्या ये बच्चे सचमुच वह शिक्षा पा रहे हैं जिसकी उन्हें उम्मीद है?

शिक्षा के आँकड़े, एक सच्ची तस्वीर

समस्याआँकड़ा / तथ्यस्रोत
एकल शिक्षक वाले स्कूलजम्मू-कश्मीर में 1,371 सरकारी स्कूलों में लगभग 32,000 छात्र सिर्फ एक शिक्षक पर निर्भर हैं।KMS News, 27 सितम्बर 2025
पढ़ने की क्षमता में गिरावटआठवीं कक्षा के 52% छात्र दूसरी कक्षा की किताबें ठीक से नहीं पढ़ पाते।ASER Report 2024, Deccan Herald
बुनियादी सुविधाओं की कमी30% स्कूलों में पानी की सुविधा नहीं, और आधे से ज़्यादा स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं।Jammu & Kashmir Policy Institute, 2024
नामांकन में गिरावट2023 तक सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में 61,000 से अधिक की कमी आई।JKPI Report 2024
निजी स्कूलों पर निर्भरताराज्य में लगभग 46% छात्र अब निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं।Kashmir Life, 2024

एक कमरा, छह कक्षाएँ।

कुपवाड़ा ज़िले के वारसन गांव में एक प्राथमिक स्कूल है जहाँ पहली से छठी तक की सभी कक्षाएँ एक ही कमरे में चलती हैं।

अकेले शिक्षक मुनीर अहमद बताते हैं कि “मैं कोशिश करता हूँ कि हर क्लास को अलग-अलग समय दूँ, लेकिन जब 60 से ज़्यादा बच्चे एक कमरे में हों, तो कुछ भी ठीक से कर पाना मुश्किल हो जाता है।”

राजवाड़ा ब्लॉक के तरहगाम इलाके में स्थिति और खराब है। वहाँ की एक महिला अध्यापिका बताती हैं कि “जब बारिश होती है तो छत टपकने लगती है, बच्चे खड़े होकर परीक्षा देते हैं। कई बार कापियाँ गीली हो जाती हैं, लेकिन हमें कुछ करने का अधिकार नहीं।”

अभिभावकों की चिंता।

अब्दुल राशिद मीर, एक खेतिहर मज़दूर, कहते हैं कि “हमारे पास पैसे नहीं कि बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेज सकें, लेकिन सरकारी स्कूल में तो बस नाम के लिए पढ़ाई है। मजबूर होकर उधार लेकर फीस भरनी पड़ती है।”

शाजिया बेगम नाम की एक माँ बताती हैं कि “मेरे बेटे को सिर्फ इसलिए गेट पर रोक दिया गया क्योंकि हमने आधी फीस बाकी रखी थी। वो बहुत शर्मिंदा होकर घर लौटा। क्या यही शिक्षा है?”

परीक्षा या बोझ?

कुपवाड़ा, केरन और करालपोरा के कई स्कूलों में परीक्षा के दौरान बच्चे लकड़ी की बेंच पर बैठते हैं, जिनमें से कुछ टूटी होती हैं।
कई जगह बिजली या हीटर नहीं — जबकि बाहर ठंड बढ़ चुकी है।

परीक्षा तो हो रही है, लेकिन सवाल ये है — कि
क्या बच्चे वास्तव में कुछ सीख पाए हैं, या यह परीक्षा केवल औपचारिकता भर है?

आगे क्या किया जा सकता है?

  1. हर स्कूल में न्यूनतम दो शिक्षक नियुक्त किए जाएँ, विशेषकर प्राथमिक स्तर पर।
  2. बेसलाइन टेस्टिंग (परीक्षा से पहले मूल्यांकन) शुरू हो ताकि बच्चों का वास्तविक स्तर पता चल सके।
  3. स्कूल इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड बनाया जाए जिसमें पंचायत और स्थानीय समाज की भागीदारी हो।
  4. निजी स्कूलों की फीस नियंत्रण नीति राज्य स्तर पर बने।
  5. स्कूल-समुदाय संवाद कार्यक्रम (School Dialogue Forum) हर ब्लॉक में शुरू हो।

परीक्षा नहीं, शिक्षा की परीक्षा।

कश्मीर के बच्चे सिर्फ किताबें नहीं उठा रहे, वे उम्मीदें उठा रहे हैं — अपने परिवारों की, अपने गाँव की, अपने भविष्य की।

लेकिन जब स्कूलों की छत टपकती हो, जब एक शिक्षक छह कक्षाएँ संभालता हो,
तो यह परीक्षा केवल बच्चों की नहीं, पूरे सिस्टम की हो जाती है।

एक बुज़ुर्ग शिक्षक ने कहा था — कि “अगर स्कूल बच्चों को सपने देखना नहीं सिखा पाएँ, तो फिर परीक्षा का क्या मतलब?”

सरकार, समाज और शिक्षकों — तीनों को अब मिलकर सोचना होगा कि
कश्मीर का अगला सत्र शिक्षा का सुधार सत्र बने, न कि परीक्षा का डर सत्र।