बिहारो का पेड़: स्त्री स्वाभिमान का प्रतीक

अंजुम बानो, हरियाणा
01169310275
गेहूं के खेतों के बीच स्थित आमों के बाग की छांव में जैसे ही हम पहुंचते हैं, हमें ग्रामीणों द्वारा एक खास पेड़ के आम न खाने की हिदायत दी जाती है. लेकिन उसी पेड़ की डालियों और छालों को कुछ लोग लेकर जाते हुए दिखते हैं.
तफ्तीश करने पर पता चलता है कि वे अपने पालतू पशुओं को बीमारी से बचाने के लिए उससे तावीज़ बनाने के लिए यह सब ले जा रहे हैं. आप हैरान होते हैं… कि एक तरफ ग्रामीण इस पेड़ का फल न खाने की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसी पेड़ से अपने पशुओं का इलाज भी कर रहे हैं !
हम हैं हरियाणा के ज़िला यमुनानगर के गांव बनियावाला में, जहां चारों तरफ गेहूं की कटाई चल रही है. थक जाने पर किसान इस आम के बाग की छांव में सुस्ताने के लिए आते हैं. इस गर्म दोपहरी में हमें, एक ऐसे पेड़ की कहानी सुनने को मिलती है, जो हरियाणा की सरज़मीं पर खड़ा है लेकिन जाना जाता है हज़ारों किलोमीटर दूर झारखंड की एक औरत के नाम से. स्थानीय लोग इसे ‘बिहारो का पेड़’ कहते हैं, लेकिन
यह वृक्ष झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और हिमाचल जैसे राज्यों से शादी कर लाई गई महिलाओं के लिए अपनी एक बहन के संघर्ष, पहचान, अस्मिता और नारी सशक्तिकरण का एक जीवंत प्रतीक बन चुका है.
‘बिहारो’ शब्द एक खास अर्थ में हरियाणा में दूसरे किसी भी राज्य से शादी करके लाई गई महिला को स्थानीय लोग हिकारत से पुकारने के लिए प्रयुक्त करते हैं. ‘बिहारो’ शब्द की मार झेलने वाली महिला भले ही बिहार की न होकर पश्चिम बंगाल या असम की हो, तब भी उसे इसी संबोधन से बुलाया जाता है. यदि वह हरियाणा की नहीं है तो उसे हिकारत से देखने-पुकारने और भेदभाव करने के लिए लोग इस शब्द का इस्तेमाल अक्सर करते हैं. ऐसे भेदभावपूर्ण माहौल में ‘बिहारो का पेड़’ बाहरी राज्यों की महिलाओं के लिए गौरव का प्रतीक बन चुका है. यह जानने के लिए जब हम आस-पास की औरतों से बात करते हैं तो एक ऐसी कहानी और सफर से हम रूबरू होते हैं, जो नारी संघर्ष की अप्रतिम मिसाल है.

साल 1994 की बात है- झारखंड के गोड्डा ज़िले के एक छोटे से गांव मनिहारी कुरमा में नाज़नी अपने परिवार के साथ रहती थी. बचपन में ही उसके अब्बू इस दुनिया से चले गए. घर में चार बहनें थीं, और मां अकेले सब कुछ संभाल रही थी. तंगी हर तरफ थी — खाने को भरपेट भोजन भी नहीं था, पहनने को ठीक कपड़े नहीं. ऐसे में एक दिन अचानक नाज़नी के चाचा कुछ अजनबी लोगों को लेकर घर आए. बोले, “ये लोग हरियाणा से आए हैं, अच्छे घर के हैं. नाज़नी से शादी करना चाहते हैं. कहते हैं, इसे अच्छे से रखेंगे… और हां, तुम्हारे घरवालों और बहनों का भी ध्यान रखेंगे”. चाचा की बातें सुनकर और अपने हालात को देखते हुए नाजनी की अम्मी ने उसकी शादी हरियाणा से आए लड़के के साथ कर दी. नाज़नी की शादी होकर वह हरियाणा के लाडवा गांव चली आई… बहुत दूर, एक अनजान ज़िंदगी की ओर.
नाज़नी ने सोचा था कि शादी के बाद उसकी ज़िंदगी एक नए रंग में रंगेगी — एक ऐसा घर मिलेगा जहाँ वह अपने सपनों को सहेज सकेगी. लेकिन जैसे ही उसने लाडवा गांव में स्थित ससुराल की चौखट पर कदम रखा, उसके सारे सपने मानो मिट्टी में मिलते चले गए.
उसके साथ पहला धोखा तो उसी दिन हुआ, जब उसे पता चला कि जिस परिवार ने उससे शादी की है, वह मुस्लिम नहीं है. झूठ बोलकर, पहचान छुपाकर, उसे एक ऐसे रिश्ते में बाँध दिया गया था जो छल और फरेब की बुनियाद पर खड़ा था.
ससुराल के आस-पास के लोग न तो उसे अपनाते थे, न ही बराबरी का दर्जा देते थे. अक्सर उसे “बिहारो” कहकर नीचा दिखाया जाता. जब उसने इस अपमान के बारे में अपने पति और ससुराल वालों से बात की, तब पता चला कि उसके ही चाचा ने ही कुछ पैसे ससुराल पक्ष से लेकर उसे इस झूठे रिश्ते में धकेल दिया था.
नाज़नी चाहकर भी अपने झारखंड स्थित मायके नहीं लौट सकी. ना तो रास्ता पता था, ना ही जेब में किराए के पैसे थे।
धीरे-धीरे, हालात और बदतर होते गए. ससुराल वाले उसके साथ इंसानों जैसा नहीं, जानवरों जैसा व्यवहार करने लगे. उसे बंधुआ मज़दूर की तरह काम पर लगाया जाने लगा, कई बार तो पेट भर खाना भी नसीब नहीं होता. जब वह अपने पति से शिकायत करती, तो उसके हिस्से में सिर्फ मारपीट और ज़िल्लत आती थी.
नाज़नी का हर आने वाला दिन एक नया नर्क था.
ये जुल्म और ज़ोर-ज़बरदस्ती सहते हुए कुछ साल गुज़र गए, वह एक नन्हीं-सी बच्ची की मां बन चुकी थी. बच्ची जब दो साल की थी, तभी से नाज़नी के ससुराल वाले उसके साथ भी अत्याचार करने से नहीं झिझके. मां काम करती रहे, इसके लिए बच्ची को मां से दूर रखा जाता था. बच्ची को भी मां की तरह भूखा रखा जाता था, जो कि नाज़नी की बर्दाश्त से बाहर था. वह अपने ऊपर हो रहे जुल्म के ख़िलाफ़ तो कभी आवाज़ नहीं उठा सकी. लेकिन कहते हैं ना कि बात जब अपने बच्चों पर आ जाए तो एक मां पूरी दुनिया से टक्कर ले लेती है. उसने बेटी के लिए आवाज़ उठाई तो ससुराल वालों ने उसे बेटी के साथ घर से बाहर निकाल दिया.
नाज़नी को नहीं पता था कि वो अपनी बेटी को लेकर कहाँ जाए, हाथ में पैसे भी नहीं थे, अपने मायके की वापसी का रास्ता भी नहीं पता था… वो बच्ची को गोद में चिपकाए रेलवे स्टेशन पहुँच तो गई थी… लेकिन उसके आगे वो किधर का रास्ता पकड़े उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. तो वह रेलवे स्टेशन पर ही रहने लग गई और मज़बूरी में भीख से मिले पैसों के सहारे गुज़ारा करने लगी, लेकिन उसे यह क़बूल नहीं था.

कुछ दिन बाद नाज़नी ने हिम्मत जुटाई और फिर से अपने पति के गाँव बनियावाला पहुँच गई और वहाँ जाकर गाँव के नम्बरदार से मिली और अपनी आपबीती बता कर काम माँगने लगी. नम्बरदार ने उसे और उसकी बेटी को खाना दिया और अपने बग़ीचे की देखभाल करने के काम पर लगा दिया. नाज़नी के लिए बेटी और यह बग़ीचा ही अब उसकी ज़िंदगी बन गया. वह यहीं झोपड़ी बनाकर रहने लगी और बग़ीचे की देखरेख करने लगी.
नाज़नी की ज़िंदगी अब पहले से बेहतर चल रही थी, 2 से 3 साल हो गए थे बागीचे की देखभाल करते और अपनी बच्ची को संभालते हुए. इसी दरमियान उसी गांव का नाज़र गुर्जर उससे मिला और उसके बारे में जानने के बाद नंबरदार से नाज़नी से अपनी शादी करने की इच्छा जताई. नंबरदार ने इस बारे में जब नाज़नी से बात की तो पहले तो उसने मना कर दिया, लेकिन नंबरदार के कुछ एक बार बच्ची और उसकी लंबी ज़िंदगी के बारे में समझाने पर वह शादी को राज़ी हो गई.
नाजनी और नाजर गुर्जर की इस तरह शादी हो गई. नाजर पशुपालन का काम करता था, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब थी, ऐसे में नाजनी ने बाग की देखभाल का काम नहीं छोड़ा. वह पति के साथ सहयोग करते हुए घर के काम के साथ-साथ बाग का काम देखती रही और घर की स्थिति सुधारने के लिए आस-पास के घरों में पशुओं की देखभाल का काम भी करती रही. वक्त के साथ, वह और पांच बच्चों की मां बनी, यानी अब उसके छह बच्चे थे. दूसरे पति से उसे तीन लड़कियां और दो लड़के हुए, जिंदगी अब ढर्रे पर थी. लेकिन तूफान किसी की जिंदगी में खामोशी से ही दस्तक देता है. ऐसे हालात से नाजनी का अब जाकर सामना हुआ. जो उसकी शांत और संघर्षपूर्ण जिंदगी में अचानक आ धमका.
ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए नाजनी जी कड़ी मेहनत कर रही थीं. लेकिन कहते हैं ना कि मर्द की फितरत कभी नहीं बदलती, नाजर का अपनी ही गांव की एक दूसरी महिला से संबंध हो गया. जिसके कहने पर वह नाजनी के साथ मार-पीट भी करने लगा. रोज़-रोज़ की घरेलू कलह और हिंसा ने नाजनी की ज़िंदगी को फिर से दो राहे पर लाकर खड़ा कर दिया, वह सोच नहीं पा रही थी कि अब वह क्या करे. तभी वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई और उस औरत ने उसके घर आकर पति के सामने ही उस पर नाटक करने का आरोप लगाया, भरा-बुरा कहने लगी और उसे थप्पड़ भी मारा. जो कि नाज़नी की बर्दाश्त से बाहर था. अब तक ज़िंदगी का हर सितम झेलने वाली यह खुदमुख्तार औरत इसे सहन नहीं कर सकी, पति की बेरूखी और उसके सामने खुद पर पड़े थप्पड़ों को वह झेल नहीं सकी और उसी बाग में जाकर आम के इस पेड़ पर खुद के गले में फंदा डालकर खुदकुशी कर ली. यह साल 2012 की गर्मियों के मौसम की बात है.
नाजनी को इस दुनिया से गए सालों गुजर गए हैं, पति नाजर गुर्जर की कैंसर से नाजनी के जाने के कुछ समय बाद ही मौत हो चुकी है. उसके बच्चे आज भी उसी गांव में हैं. बेटियों की शादी हो चुकी है, बेटे अपनी-अपनी ज़िंदगी अच्छे से गुज़ार रहे हैं. आज भी “बिहारो का पेड़” उसके संघर्ष, साहस और स्वाभिमान की गाथा का गवाह बना खड़ा है. उसने कभी किसी से खुद के लिए कुछ नहीं मांगा, खुद कमाया तब खाया. ज़िंदगी ने उसे ठोकरें दीं, लेकिन जिंदा रहते हुए और मरने के बाद भी उसने सिर्फ सबको दिया ही है. बाहरी राज्यों की महिलाओं के लिए “बिहारो का पेड़” उनके आत्मसम्मान का प्रतीक है- एक पेड़, जो इन महिलाओं को अपनी जड़ों से हमेशा जुड़े रहने की सीख देता है और अपने तने से सिखाता है कि दुखों और दुर्दिनों के बावजूद अपने स्वाभिमान के लिए हमेशा खड़ा रहना चाहिए. वहीं स्थानीय लोगों के लिए वह दवा और दुआ की शरणस्थली है.