सरकारी डिस्पेंसरी के ताले और प्राइवेट अस्पतालों की लूट

ओखला में टीकाकरण की जंग।

लहर डेस्क

दिल्ली के ओखला इलाके में रहने वाले लाखों लोग आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा, यानी टीकाकरण, के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की दूरी यहाँ साफ झलकती है। अरविंद केजरीवाल सरकार ने “दिल्ली मॉडल ऑफ हेल्थ” के तहत मोहल्ला क्लिनिक और डिस्पेंसरी की शुरुआत तो की, लेकिन मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र के लोगों के लिए यह मॉडल राहत से ज़्यादा परेशानी लेकर आया है।

मोहल्ला क्लिनिक में टीकाकरण नहीं

ओखला में कई मोहल्ला क्लिनिक तो खोले गए, लेकिन वहाँ टीकाकरण की सुविधा उपलब्ध नहीं है। स्थानीय लोगों ने जब इस बारे में जानकारी माँगी तो उन्हें साफ कहा गया कि “टीका सिर्फ डिस्पेंसरी में लगेगा।” लेकिन मुश्किल यह है कि इतने बड़े क्षेत्र में केवल एक सरकारी डिस्पेंसरी है। लाखों की आबादी और हज़ारों बच्चों वाले इलाके में एक डिस्पेंसरी पर निर्भर रहना लोगों को मजबूरी में प्राइवेट अस्पतालों का रुख करने पर विवश करता है।

डिस्पेंसरी में दुर्व्यवहार।

लोगों का आरोप है कि जब वे डिस्पेंसरी जाते हैं तो उन्हें वहाँ उचित जानकारी देने के बजाय अपमानित किया जाता है। शाहिद , जो ओखला के बाटला हाउस इलाके में रहते हैं, बताते हैं। कि “हम अपने काम से वापस आकर शाम चार बजे बच्चों को टीकाकरण कराने गए थे। तो एक महिला गार्ड ने हमें गेट से ही डाँटकर बाहर कर दिया। उसने कहा कि ‘आप यहाँ कैसे आ गए? किसने अनुमति दी? समय मालूम है?’ जब हमने समय पूछा तो बोली सुबह 8:30 बजे। लेकिन यह नहीं बताया कि आख़िरी समय कब तक है। क्यूंकी सुबह हमें अपने काम पर जाना होता है। इसलिए मैं शाम को गया था।” यह सिर्फ़ एक परिवार का अनुभव नहीं है। कई लोगों ने इस तरह के व्यवहार की शिकायत की। उनका कहना है कि महिला गार्ड और डिस्पेंसरी में उपस्थित स्टाफ अक्सर “हम कुछ नहीं बताएँगे, खुद पता करो” जैसे जवाब देते हैं।

नौकरीपेशा और मज़दूर वर्ग की मुश्किल।

ओखला के अधिकांश लोग दिहाड़ी मज़दूरी, छोटे व्यापार या नौकरी से जुड़े हैं। ऐसे में सुबह 8:30 बजे डिस्पेंसरी पहुँच पाना उनके लिए असंभव है। फातिमा, जो आसपास के घरों में काम करती हैं, कहती हैं। “हम सुबह ही काम पर जाते हैं। इतनी जल्दी सुबह के टाइम में टीका लगवाना संभव नहीं है। एक दिन जब हम छुट्टी लेकर गए तो वहाँ स्टाफ ने कहा कि समय निकल गया है। अब आप ही बताएं हम कहाँ जाएँ?” कामकाजी वर्ग की यह मजबूरी उन्हें सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर कर देती है।

प्राइवेट अस्पताल का बोझ।

स्थानीय लोग बताते हैं कि मजबूरी में वे प्राइवेट अस्पतालों का रुख करते हैं। ओखला के मशहूर अल-शिफ़ा अस्पताल में टीकाकरण होता है, लेकिन उसकी लागत गरीब परिवारों के लिए बहुत भारी है। केवल डॉक्टर की फीस: ₹350 इसके बाद एक बार में टीकाकरण शुल्क: ₹5000 से ₹8000 तक है। रईस अहमद, जो दिहाड़ी मज़दूर हैं, कहते हैं। कि “सरकार कहती है कि टीका मुफ़्त है, लेकिन हमें ₹6000 देने पड़ते हैं। हमारे जैसे लोग कहाँ जाएँ? मुफ़्त की सुविधा तो सिर्फ़ पोस्टर में है।”

सूचना तंत्र की विफलता।

डिस्पेंसरी और मोहल्ला क्लिनिक में कहीं भी स्पष्ट सूचना उपलब्ध नहीं है कि

टीकाकरण का समय क्या है?

किस आयु वर्ग को कौन सा टीका मिलेगा?

किन दस्तावेज़ों की ज़रूरत होगी?

यहाँ तक कि स्थानीय प्रतिनिधि और प्रशासन भी इस पर ठोस जवाब देने से बचते हैं। नतीजा यह है कि नागरिकों को अंधेरे में रखा जाता है।

सरकारी दावे बनाम हकीकत।

दिल्ली सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि “दिल्ली मॉडल” के तहत स्वास्थ्य सेवाएँ देश में सबसे बेहतर हैं। लेकिन ओखला का अनुभव बताता है कि यह मॉडल गरीब और अल्पसंख्यक इलाकों तक पहुँचने में विफल रहा है।

सरकार का दावा।

हर मोहल्ला क्लिनिक में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा।

डिस्पेंसरी और अस्पतालों में मुफ़्त इलाज और टीकाकरण।

हकीकत।

मोहल्ला क्लिनिक में टीकाकरण सुविधा नहीं।

एक डिस्पेंसरी पर अत्यधिक बोझ।

गार्ड और स्टाफ का दुर्व्यवहार।

प्राइवेट अस्पतालों पर निर्भरता और महँगी लागत।

भविष्य की ज़रूरत।

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस स्थिति से सबक लेकर सरकार को स्वास्थ्य नीति में बदलाव करना चाहिए।

मोहल्ला क्लिनिक में टीकाकरण की व्यवस्था हो।

कामकाजी लोगों के लिए शाम को भी समय दिया जाए।

स्पष्ट सूचना तंत्र विकसित हो जैसे बोर्ड, हेल्पलाइन, मोबाइल मैसेज।

गार्ड और स्टाफ की निगरानी और जवाबदेही तय हो।

प्राइवेट अस्पतालों की फीस पर नियंत्रण रखा जाए।

निष्कर्ष।

ओखला की यह तस्वीर एक सवाल खड़ा करती है कि क्या स्वास्थ्य का अधिकार केवल काग़ज़ों और चुनावी नारों में ही सीमित रह जाएगा? लाखों गरीब और कामकाजी लोग आज भी मुफ्त टीकाकरण से वंचित हैं, जबकि प्राइवेट अस्पताल उन्हें जेब से खून निकालने पर मजबूर कर रहे हैं। अगर सरकारें इस ओर ध्यान नहीं देतीं तो भविष्य में स्वास्थ्य सेवाएँ और भी असमान हो जाएँगी। ओखला का यह संघर्ष सिर्फ़ एक मोहल्ले की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे देश के उन इलाकों की झलक है जहाँ लोग अभी भी “मुफ़्त” और “सुलभ” स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर सिर्फ़ इंतज़ार कर रहे हैं।