मानवता के लिए रहमत, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की यौमे-मिलाद

12 रबी-उल-अव्वल पर विशेष लेख
अनीस आर खान, नई दिल्ली
मानव इतिहास में समय-समय पर ऐसे महापुरुष जन्मे जिन्होंने अंधकार में डूबी दुनिया को प्रकाश दिखाया। छठी शताब्दी में जब अन्याय, अज्ञान और असमानता ने मानवता को घेर रखा था, तब मक्का की पवित्र धरती पर 12 रबी-उल-अव्वल को हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ का जन्म हुआ। यह जन्म पूरी इंसानियत के लिए रहमत और करुणा का प्रतीक था।
जन्म की पृष्ठभूमि।
अरब समाज उस समय नैतिक पतन में डूबा था।
बेटियों को ज़िंदा दफ़ना दिया जाता था।
कबीलाई झगड़े आम थे।
गरीबों और अनाथों पर अत्याचार होता था।
ऐसे समय में हज़रत मुहम्मद ﷺ का जन्म मानो मानवता के लिए नई सुबह लेकर आया।
युवावस्था: “अल-अमीन” की उपाधि।

युवावस्था से ही हज़रत मुहम्मद ﷺ अपनी सच्चाई और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। लोग उन्हें “अल-अमीन” यानी भरोसेमंद कहते थे। व्यापारी अपने माल उनके सुपुर्द कर देते। विवादों का निपटारा उनके न्यायपूर्ण फ़ैसलों से होता। यही उनके भविष्य की पैग़म्बरी का आधार था।
पैग़म्बरी और संदेश।
40 वर्ष की आयु में हिरा की गुफ़ा में ईश्वर का पहला संदेश मिला। उनका संदेश था:
केवल एक ईश्वर की इबादत करो।
गरीबों और कमजोरों की मदद करो।
अन्याय और अत्याचार का विरोध करो।
सभी इंसानों में समानता और भाईचारा स्थापित करो।
यह संदेश केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय क्रांति का आह्वान था।
रहमत के अनोखे प्रसंग।
- ताइफ़ का सफ़र
जब हज़रत मुहम्मद ﷺ मक्का में ज़ुल्म और तकलीफ़ें सहते हुए ताइफ़ पहुँचे, तो वहाँ के लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया और पत्थर बरसाए। उनके पैरों से ख़ून बहने लगा। उस समय फ़रिश्ते ने आकर पूछा कि क्या आप इन लोगों पर अज़ाब (सज़ा) भेजना चाहते हैं? लेकिन हज़रत मुहम्मद ﷺ ने दुआ की: “ऐ अल्लाह! इन्हें हिदायत दे, क्योंकि ये नहीं जानते।”
यह घटना दर्शाती है कि जब लोग उन पर पत्थर बरसा रहे थे, तब भी उनके दिल में केवल रहमत और दुआ थी, बदले की भावना नहीं।

- बूढ़ी औरत और कचरा
मक्का की एक बूढ़ी औरत हज़रत मुहम्मद ﷺ के रास्ते में रोज़ाना कचरा फेंकती थी। एक दिन जब वह औरत बीमार हो गई और कचरा न फेंक पाई, तो हज़रत मुहम्मद ﷺ खुद उसके घर पहुँचे और उसका हाल-चाल लिया। औरत यह देखकर दंग रह गई कि जिससे वह नफ़रत करती थी, वही उसकी सेवा करने आया। वह उनकी रहमत और करुणा से इतनी प्रभावित हुई कि इस्लाम को स्वीकार कर लिया।
- बद्र के युद्ध का क़ैदी
बद्र की लड़ाई में मुसलमानों ने दुश्मन के कई लोगों को क़ैद किया। हज़रत मुहम्मद ﷺ ने आदेश दिया कि क़ैदियों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए। साथी सहाबा ने अपने हिस्से का खाना भी क़ैदियों को दे दिया और खुद भूखे रह गए। एक क़ैदी ने बाद में कहा कि “मैंने आज तक ऐसा कैदीपन नहीं देखा, जहाँ कैद करने वाले भूखे सोएं और कैदियों को खाना खिलाएँ।” यह उनकी रहमत और इंसानियत का जीवंत उदाहरण है।
समानता और भाईचारा।
हज़रत मुहम्मद ﷺ ने कहा कि “किसी अरबी को किसी अजमी पर, और किसी गोरे को किसी काले पर कोई श्रेष्ठता नहीं है। श्रेष्ठता केवल अच्छे कर्मों और परहेज़गारी में है।” यह संदेश भारत जैसे विविधता भरे देश में विशेष महत्व रखता है। गंगा-जमुनी तहज़ीब, सूफी परम्परा और आपसी मोहब्बत इसी शिक्षा का परिणाम है।
न्यायप्रियता।
हज़रत मुहम्मद ﷺ ने कहा कि “अगर मेरी बेटी फ़ातिमा भी चोरी करती, तो मैं उस पर भी वही सज़ा लागू करता।” यह कथन न्याय की निष्पक्षता का अद्वितीय उदाहरण है।
स्त्रियों के अधिकार।

हज़रत मुहम्मद ﷺ ने औरतों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए।
बेटियों को रहमत बताया।
औरतों को शिक्षा का अधिकार दिया।
पति-पत्नी के रिश्ते को साझेदारी और सम्मान पर आधारित किया।
भारत में असर और सूफी परम्परा।
भारत में हज़रत मुहम्मद ﷺ का संदेश सूफियों के माध्यम से फैला। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम दिया।
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने दिल्ली में “मोहब्बत सबके लिए, नफ़रत किसी से नहीं” का संदेश फैलाया।
बुल्ले शाह और कबीर जैसे संतों ने इंसानियत को धर्म से ऊपर रखा।
सूफी दरगाहें आज भी गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक हैं, जहाँ हिंदू-मुसलमान दोनों झुककर एक ही ख़ुदा से दुआ माँगते हैं।
यौमे-मिलाद: आत्मचिंतन का अवसर।
यौमे-मिलाद केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। हमें सोचना चाहिए:
क्या हम ग़रीबों की मदद कर रहे हैं?
क्या हम जाति-धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत को अपनाते हैं?
क्या हमारे जीवन में न्याय और दया का स्थान है?
आज की दुनिया में प्रासंगिकता।

आज दुनिया आतंकवाद, नफ़रत और पर्यावरण संकट से जूझ रही है। ऐसे समय में हज़रत मुहम्मद ﷺ का संदेश इंसानियत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
शांति और भाईचारा
गरीबों और अनाथों की सेवा
जाति-धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत
प्रकृति की रक्षा।
भारत जैसे विविध देश में अगर उनके सिद्धांतों को अपनाया जाए तो आपसी नफ़रत की जगह मोहब्बत और एकता स्थापित हो सकती है। हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ का जीवन करुणा और इंसानियत का प्रतीक है। उनका यौमे-मिलाद हमें याद दिलाता है कि असली उत्सव उनके जीवन और शिक्षाओं को अपनाने में है।
भारत की मिट्टी में गंगा-जमुनी तहज़ीब, सूफी परम्परा और आपसी मोहब्बत इसी बात का प्रमाण है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ की रहमत यहाँ भी गहराई से रची-बसी है। आज हमें उसी रहमत और करुणा को अपने जीवन का हिस्सा बनाना है, ताकि इंसानियत का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल बन सके।