पंजाब की त्रासदी और मुस्लिम समुदाय का योगदान

अनीस आर खान, नई दिल्ली
पंजाब की उपजाऊ धरती, जो हरियाली और धान, गेहूँ के सुनहरे खेतों के लिए जानी जाती है, इस बार पानी के अथाह सागर में बदल गई। लगातार बरसात, ऊपरी इलाकों से छोड़ा गया अतिरिक्त पानी और नदियों का उफान। सबने मिलकर ऐसी त्रासदी रच दी कि हज़ारों गाँव जलमग्न हो गए। घरों की दीवारें गिर पड़ीं, मवेशी बह गए और खेत महीनों के लिए बर्बाद हो गए।
इस प्राकृतिक आपदा के बीच जहाँ सरकारी मशीनरी बड़े पैमाने पर जुटी थी, वहीं कई छोटे-छोटे समुदायिक नेटवर्क भी अपने स्तर पर राहत पहुँचाने में लगे थे। इन्हीं में सबसे उल्लेखनीय योगदान मुस्लिम समुदाय का रहा। मस्जिदों से लेकर मदरसों तक, व्यक्तिगत प्रयासों से लेकर संगठित संस्थाओं तक। हर स्तर पर मुसलमानों ने इस आपदा में इंसानियत का फर्ज निभाया।
इस फीचर रिपोर्ट में हम उसी मानवीय प्रयास को क्रमवार तरीके से देखेंगे। समय-रेखा, प्रत्यक्ष कहानियाँ, सीमाएँ, चुनौतियाँ और वे सबक जो इस आपदा ने हमें दिए।

पानी के बीच खुलती दीवारें।
अगस्त के दूसरे हफ्ते से शुरू हुई लगातार बारिश और ऊपरी क्षेत्रों (हिमाचल, जम्मू) से छोड़े गए पानी ने पंजाब को डुबो दिया। सतलज, बेयास और रावी नदियाँ अपने किनारे तोड़कर गाँवों और कस्बों में घुस गईं। कई जगह बाँध और तटबंध टूट गए।
सरकारी आँकड़े बताते हैं कि लगभग 1,200 गाँव गंभीर रूप से प्रभावित हुए और लाखों लोग विस्थापित हुए। हज़ारों घर ढह गए, खेतों में महीनों की फसल बर्बाद हो गई। सरकारी टीमें, एनडीआरएफ, सेना और पुलिस लगातार राहत और बचाव के कामों में लगी रहीं।
लेकिन इस बीच छोटे-छोटे स्थानीय समूहों का योगदान भी सामने आया। एक विस्थापित किसान, बलविंदर सिंह (फिरोज़पुर) ने कहा कि “सरकारी नावें बाद में आईं, पहले हमारे मुस्लिम लड़के ही ट्रैक्टर लेकर आए और हमें निकालकर ऊँचाई पर पहुँचाया। उस वक़्त हमें बस इंसान दिखे, मज़हब नहीं।”

मस्जिदें, इबादत से बढ़कर आश्रय का केन्द्र।
पंजाब की बाढ़ ने यह साबित कर दिया कि धार्मिक स्थल सिर्फ पूजा-अर्चना की जगह नहीं, बल्कि आपदा के समय आश्रय-गृह भी बन सकते हैं। इस बात को सच साबित करते हुए मस्जिदों ने अपने दरवाज़े खोल दिए। मस्जिदों के बड़े हॉलों में फर्श पर गद्दे बिछाए गए, महिलाओं और बच्चों के लिए अलग कमरे बनाए गए। सामुदायिक रसोई चलाई गई, जहाँ रोज़ सैकड़ों लोगों के लिए रोटियाँ और दाल बनती रही।
लुधियाना के एक इमाम ने कहा।
“नमाज़ के साथ-साथ इस वक़्त भूखे को खाना खिलाना और बेघर को छत देना भी बड़ा काम है। हमारी मस्जिद ने सौ से ज़्यादा परिवारों को पनाह दी। बच्चों के लिए दूध और दवाइयाँ भी हमने जुटाईं।” दूसरी तरफ, गुरदासपुर की रहमत बी (राहत लेने वाली महिला) की आँखों में आँसू थे। उसने कहा कि “हमारा घर टूट गया, सारा सामान बह गया। मस्जिद ने हमें छत दी, खाना दिया। जब मेरे बेटे को तेज़ बुखार हुआ, तो वहीं से दवाई मिली। उस वक़्त हमें लगा कि हम अकेले नहीं हैं।”

नाव, ट्रैक्टर और थकान से भरी कहानियाँ।
सरकारी नावों के साथ-साथ, स्थानीय युवाओं और किसानों ने अपने निजी साधन राहत कार्य में झोंक दिए। कई गाँवों में ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया। कहीं-कहीं पर लोगों ने बाँस और ड्रम से अस्थायी नावें बनाईं। मलोट के दो भाई, आरिफ़ और यूनुस ने मिलकर 20 अस्थायी नावें बनाई और बाढ़-ग्रस्त गाँवों तक पहुँचाईं। आरिफ़ ने बताया कि “हमारे पास पैसे नहीं थे, पर लकड़ी और बाँस थे। सोचा इन्हें जोड़कर नाव बना लेते हैं। हमारी नावों से लगभग 300 लोग सुरक्षित बाहर निकाले गए।”
एक और कहानी संगरूर से आई, जहाँ गाँव की महिलाओं ने सामूहिक रूप से 5000 रोटियाँ बनाकर ट्रॉलियों में भरकर भेजीं। उनमें से एक महिला, फातिमा बेगम, ने हँसते हुए कहा कि “पानी ने हमारा आटा भिगो दिया था, लेकिन हमने फिर भी जुटकर रोटियाँ बनाई। हमें लगा, अगर खाना नहीं पहुँचाया तो लोग भूख से मरेंगे।”
संगठित दान और संस्थागत पहलें।
कुछ मुस्लिम चैरिटेबल संस्थाओं ने राहत कार्य को संगठित रूप दिया। उन्होंने राशन किट, बिस्तर, कपड़े और दवाइयाँ बड़े पैमाने पर वितरित कीं।
पटियाला की ‘अंसार वेलफ़ेयर सोसायटी’ ने 5,000 से अधिक राहत किट भेजीं। हर किट में आटा, चावल, दाल, नमक, तेल और पानी की बोतलें थीं।
संस्था के सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा कि “हमने इस साल ईद मिलाद- उन- नबी के बजट को राहत कार्य में लगा दिया। हमारी टीम ने प्रशासन के साथ मिलकर काम किया ताकि मदद सही जगह पहुँचे।”
इसी तरह, कई मदरसों ने अपनी कक्षाएँ बंद कर उन्हें राहत-शिविरों में बदल दिया। बच्चों को पढ़ाने वाली जगह पर इस बार बाढ़-पीड़ित परिवार सो रहे थे।
सीमाएँ, चुनौती और गलत सूचनाएँ।
हालाँकि इस राहत प्रयास के बीच कई चुनौतियाँ भी रहीं। सबसे बड़ी समस्या थी संसाधनों का समन्वय। सरकारी सहायता, एनजीओ और स्थानीय प्रयास। तीनों का तालमेल हमेशा सहज नहीं रहा। कई बार मदद पहुँचने में देरी हुई। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर कई फर्जी वीडियो और अफवाहें फैलीं। किसी पिछले साल की बाढ़ का वीडियो पंजाब की बाढ़ बताकर वायरल हुआ, कहीं दान के गलत दावे भी सामने आए। पत्रकारों और फैक्ट-चेकर्स को लगातार स्पष्ट करना पड़ा कि कौन सी खबर सच्ची है और कौन सी भ्रामक।

सांप्रदायिक सौहार्द का इम्तिहान।
इस बाढ़ ने पंजाब की बहुलतावादी समाज की असली ताक़त को सामने लाया। जहाँ राजनैतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे थे, वहीं ज़मीनी स्तर पर इंसानियत की जीत हो रही थी।
होशियारपुर के सिख किसान हरजीत सिंह ने साफ कहा कि “मेरे गाँव में पहले मुस्लिम लड़के ही राशन लेकर पहुँचे। उनके हाथ से रोटियाँ खाते हुए कभी नहीं लगा कि हम अलग हैं। बाढ़ ने हमें जोड़ दिया, बाँटा नहीं।”
सबक और सिफारिशें।
स्थानीय धार्मिक संस्थानों को औपचारिक रूप से जोड़ना: मस्जिदें, गुरुद्वारे, मंदिर और चर्च आपदा-प्रबंधन योजनाओं का हिस्सा बनने चाहिए।
राहत वितरण का रजिस्ट्रेशन: ताकि भविष्य की योजनाओं में पारदर्शिता बनी रहे।
तेज़ फैक्ट-चेक तंत्र: अफवाहें आपदा से भी ज़्यादा नुकसान कर सकती हैं।
सामुदायिक भरोसे को संस्थागत रूप देना: जो भरोसा इस बार मस्जिदों ने बनाया, उसे आगे भी संरक्षित रखना चाहिए।
मानवीय चेहरे।
आख़िरकार, यह बाढ़ सिर्फ आँकड़ों की कहानी नहीं है। यह कहानी है, उस इमाम की जिसने मस्जिद का दरवाज़ा खोला, उस किसान की जिसने अपनी नाव दान कर दी, उस महिला की जिसने भीगे आटे से भी रोटियाँ बनाईं। पंजाब की त्रासदी ने दिखा दिया कि संकट चाहे जितना बड़ा हो, इंसानियत का दीपक बुझता नहीं। और इस दीपक को जलाए रखने में मुसलमानों का योगदान इस बार विशेष रूप से याद किया जाएगा।