नाम, पहचान और घर छीन लेने का अपराध

ब्राइड ट्रैफिकिंग की शिकार तुलसी की कहानी
अंजुम बानो, हरियाणा

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तुलसी आज किसी और नाम से जानी जाती है।
क्योंकि मानव तस्करी सिर्फ़ इंसानों की ख़रीद-फ़रोख़्त नहीं करती—वह उनका नाम, पहचान, घर, रिश्ते और अतीत तक छीन लेती है।
यह कहानी किसी एक महिला की नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहाँ ग़रीबी, असमानता और सामाजिक चुप्पी के बीच हज़ारों लड़कियाँ हर साल “काम” और “शादी” के नाम पर अपने घरों से ग़ायब हो जाती हैं—और फिर कभी वापस नहीं पहुँच पातीं।
एक कमरे का घर और बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी
तुलसी जब 14–15 साल की थी, तब उसका जीवन एक छोटे से कमरे में सिमटा हुआ था। घर में दो भाई, तीन बहनें, शराब पीकर देर रात लौटने वाले पिता और दूसरों के घरों में काम करने वाली माँ। ऐसे हालात में घर और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी तुलसी के कंधों पर आ चुकी थी।
भूख क्या होती है, यह तुलसी ने बहुत कम उम्र में समझ लिया था। वह काम करना चाहती थी—किसी बड़े सपने या शौक़ के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि उसके भाई-बहन रात को भूखे न सोएँ।
यहीं से गरीबी, मजबूरी और भरोसे के सहारे मानव तस्करी का रास्ता निकलता है।
काम का झांसा: तस्करी की पहली सीढ़ी
एक दिन एक महिला—जिसे तुलसी आज भी ‘दीदी’ कहती है—उसकी माँ से मिलने आई। बाहर काम दिलाने का वादा किया गया। कहा गया, “अच्छे पैसे मिलेंगे।”
माँ ने मना किया—घर में छोटे बच्चे थे।
तो सौदा बदला गया—“तुलसी को भेज दो।”
यह कोई असाधारण घटना नहीं है।
ऐसे ही वादों के ज़रिये हर साल सैकड़ों लड़कियाँ अपने घरों से दूर ले जाई जाती हैं—जहाँ से लौटने का रास्ता अक्सर बंद हो जाता है।

घर से कटने की पहली यात्रा
14–15 साल की तुलसी यह नहीं जानती थी कि वह जिस गाड़ी में बैठी है, वह उसे उसके घर से हमेशा के लिए काट देगी। साल 2005 में वह उत्तर प्रदेश पहुँची।
उसे नहीं पता था कि वह किस शहर में है।
न रास्ता मालूम था, न ज़िला।
घर से बाहर जाने की सख़्त मनाही थी।
वहाँ कई लड़कियाँ थीं, लेकिन कोई आज़ाद नहीं थी।
दिनचर्या तय थी—घर का काम, खाना बनाना और चुप रहना।
न पैसे।
न सवाल करने की इजाज़त।
यहीं तुलसी को पहली बार समझ आया कि यह नौकरी नहीं, बल्कि एक जाल है।
भागने की कोशिश और डर के ज़रिये नियंत्रण
तुलसी ने वहीं रहने वाली एक बुज़ुर्ग महिला (अम्मा) से अपने घर लौटने की बात कही। भरोसा दिया गया—“कुछ दिन में भेज देंगे।”
उसी घर में एक रात बंगाल से लाई गई एक और लड़की थी। भाषा अलग थी, लेकिन दर्द एक जैसा—वह भी अपने घर लौटना चाहती थी।
दोनों ने भागने की कोशिश की। बंगाली लड़की किसी तरह निकल गई। तुलसी पकड़ी गई।
उसे धमकाया गया, पीटा गया, सवाल किए गए। दो दिन तक भूखा रखा गया।
यह सब इसलिए था ताकि वह दोबारा भागने की हिम्मत न कर सके।

‘फोटो खिंचवाने’ से ज़िंदगी बदल देने तक
“फोटो खिंचवाने” के बहाने तुलसी को सहारनपुर ले जाया गया।
इसके बाद हरियाणा के यमुनानगर में उसकी शादी कर दी गई।
यह उसकी मर्ज़ी नहीं थी। यह उसका फ़ैसला नहीं था।
आज तुलसी हरियाणा में रहती है। उसके दो बच्चे हैं, पति और ससुराल है। लेकिन यह सच्चाई नहीं बदली कि वह अपने घर, अपने माता-पिता और अपने असली नाम से पूरी तरह कट चुकी है।
घर की पहचान: अब साफ़ होती तस्वीर
20 साल बाद भी तुलसी की स्मृतियाँ ज़िंदा हैं।
वह बताती है कि गाँव तक पहुँचने के लिए गोइलकेरा से पैदल रास्ता जाता है।
उसे अपने पिता का नाम टुपूरा याद है।
भाइयों के नाम—वीरा, मंगोला और बारका।
यह जानकारी किसी काग़ज़ से नहीं, बल्कि एक बेटी की स्मृति से आई है—जो दो दशकों से अपने घर का रास्ता मन में सँजोए बैठी है।
नाम भी छीन लिया गया
जब उससे पूछा गया—“क्या आज भी तुम्हारा नाम तुलसी है?”
वह कहती है—
“नहीं। मेरा घर छीना, परिवार छीना और मेरा नाम भी।”
मानव तस्करी का सबसे क्रूर सच यही है—
पीड़िता ज़िंदा रहती है, लेकिन उसका अस्तित्व मिटा दिया जाता है।
घर न सही, एक मुलाक़ात की चाह

तुलसी कहती है—
“अगर मैं अपने घर नहीं भी जा पाई, तो कम से कम एक बार अपने माँ-बाप, अपने भाई-बहनों को देखना चाहती हूँ। उनसे बात करना चाहती हूँ।”
यह कोई बड़ी माँग नहीं है।
यह एक बिछड़ी हुई बेटी की आख़िरी उम्मीद है।
यह कहानी सिर्फ़ एक महिला की नहीं
यह कहानी उस समाज पर सवाल है जहाँ—
ग़रीबी को मजबूरी नहीं, अपराध की तरह देखा जाता है
लड़कियों की गुमशुदगी को धीरे-धीरे भुला दिया जाता है
और तस्करी को ‘शादी’ और ‘काम’ के नाम पर ढक दिया जाता है
तुलसी आज भी इंतज़ार कर रही है—
किसी पहचान का,
किसी रास्ते का,
और शायद अपने घर का।
यह अपील झारखंड से पूरे देश तक
अगर आप झारखंड, विशेष रूप से
अगर टुपूरा, वीरा, मंगोला, बारका नाम के किसी परिवार के बारे में जानते हैं—
तो यह सिर्फ़ सूचना नहीं, एक बेटी की पुकार है।
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अगर आप झारखंड में किसी को जानते हैं,
तो कृपया यह जानकारी साझा करें।
शायद आपकी एक कोशिश तुलसी को उसके परिवार से मिला दे।
यह सिर्फ़ तुलसी की इच्छा नहीं है—
यह हमारे समाज, मीडिया और इंसान होने की सामूहिक ज़िम्मेदारी है।