तीन अनाथ बच्चे और इंसानियत की आख़िरी लौ

अनीस आर खान, नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के नौतनवा कस्बे में एक घटना घटी जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया। यह कहानी तीन मासूम बच्चों की है, जिन्होंने अपने पिता के शव को अंतिम संस्कार के लिए दो दिनों तक घर में रखा, फिर मजबूरी में उसे एक ठेले पर लादकर गली-गली भटकते रहे। श्मशान और कब्रिस्तान ने उन्हें अपनाने से मना कर दिया। समाज ने भी उन्हें ठुकरा दिया। लेकिन अंत में दो मुस्लिम भाइयों ने आगे आकर इंसानियत की वह मशाल जलाई, जो शायद इस अंधेरे दौर में हमें राह दिखा सके।
टूटा हुआ परिवार
लव कुमार पटवा का परिवार छोटा और साधारण था। छह महीने पहले ही उनकी पत्नी का निधन हो गया था। तब से वे ही अपने तीन बच्चों का सहारा थे।
राजवीर – उम्र 14 साल, सबसे बड़ा बेटा, लेकिन अभी बच्चा ही था।
देवराज – उम्र 10 साल, जिसे अभी तक यह समझ भी नहीं थी कि मौत का मतलब क्या होता है।
एक छोटी बहन – मासूम उम्र, जिसने माँ को पहले ही खो दिया था और अब पिता भी चले गए।
बीमारी से जूझते हुए लव कुमार ने दम तोड़ दिया। और इन तीनों बच्चों का सहारा हमेशा के लिए छिन गया।
दो दिन का इंतज़ार
पिता की मौत के बाद बच्चों ने उम्मीद की कि रिश्तेदार या पड़ोसी मदद के लिए आगे आएंगे। लेकिन दो दिन तक किसी ने दरवाज़े पर दस्तक नहीं दी। शव घर में पड़ा रहा, मासूम आँखें दरवाज़े पर टिकी रहीं।
“हम सोच रहे थे कोई आ जाएगा… कोई हमें बताएगा कि अब क्या करना है। पर कोई नहीं आया।” – यह शब्द राजवीर के थे, जिसने पिता के शव को ठेले पर लादने का सबसे कठिन फैसला लिया।
ठेले पर पिता
लव कुमार कभी अपने ठेले से परिवार का पेट पालते थे। वही ठेला अब उनकी आख़िरी यात्रा का साधन बन गया।
राजवीर ने अपने छोटे भाई और बहन की मदद से शव को ठेले पर रखा। कस्बे की गलियों में यह दृश्य हर किसी को रोक देने वाला था – तीन बच्चे, एक ठेला, और उस पर उनका मृत पिता।
लोग देखते रहे, कुछ हंसते रहे, कुछ वीडियो बनाने लगे। लेकिन कोई उनके पास जाकर मदद करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
श्मशान और कब्रिस्तान की दहलीज़ पर ठुकराए गए

बच्चे पहले श्मशान घाट पहुँचे। वहां लकड़ी नहीं थी। बिना लकड़ी चिता कैसे सजती?
राजवीर ने हाथ जोड़कर कहा –
“अगर जलाने की लकड़ी नहीं है, तो हमें गाड़ने दो।”
लेकिन घाट के लोगों ने मना कर दिया। “यहाँ केवल जलाया जाता है, दफनाया नहीं,” उन्होंने कहा।
हताश होकर बच्चे शव को लेकर कब्रिस्तान पहुँचे। वहाँ भी उन्हें लौटा दिया गया। “ये हिंदू शव है, इसे यहाँ नहीं दफनाया जा सकता,” यह कहकर उन्हें भगा दिया गया।
अब बच्चे सड़क पर थे – पिता का शव ठेले पर, और उनके होंठों पर मदद की गुहार।
मदद की भीख
तीनों भाई-बहन कस्बे की गलियों में घूमते रहे। ठेले पर शव, और उनकी आवाज़ें –
“पापा का अंतिम संस्कार कराना है… मदद कर दीजिए।”
लोग तमाशा देखते रहे। किसी ने इसे “नया ट्रेंड” कहा। किसी ने हंसी में उड़ा दिया। किसी ने पैसे देने के बजाय मोबाइल निकालकर वीडियो बनाया।
यह सिर्फ़ बच्चों की मजबूरी नहीं थी, यह समाज की संवेदनहीनता का आईना भी था।
इंसानियत की चमक
इसी बीच यह खबर नगर पालिका के दो मुस्लिम सभासदों – राशिद कुरैशी और वारिस कुरैशी – तक पहुँची। वे दोनों तुरंत मौके पर पहुँचे।
राशिद कुरैशी ने बच्चों से कहा –
“बेटा, अब चिंता मत करो। तुम्हारे पिता का सम्मानजनक संस्कार होगा।”
वारिस कुरैशी ने लकड़ी, चिता और सभी सामग्री का इंतज़ाम किया। फिर हिंदू रीति-रिवाज के साथ लव कुमार पटवा का अंतिम संस्कार कराया।
अंत में बच्चों को घर तक छोड़कर आए। जाते-जाते उन्होंने इतना ही कहा –
“धर्म बाद में है, इंसानियत पहले।”
समाज पर सवाल

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज के लिए आईना भी है। सवाल यह है कि
जब बच्चे दो दिन तक शव के साथ बैठे रहे, तब रिश्तेदार कहाँ थे?
जब शव ठेले पर लादकर बच्चे भीख मांग रहे थे, तब पड़ोसी क्यों चुप रहे?
प्रशासन की जिम्मेदारी कहाँ थी?
सोशल मीडिया और प्रतिक्रिया
जब यह खबर फैली, सोशल मीडिया पर लोग दो हिस्सों में बंट गए।
एक वर्ग ने कुरैशी भाइयों की इंसानियत को सलाम किया।
दूसरा वर्ग समाज की संवेदनहीनता पर आक्रोश जताता रहा।
लेकिन असल सवाल वही रहा कि क्या हम इतने बदल गए हैं कि मौत और अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील क्षणों में भी मदद करने से कतराने लगे हैं?
समाधान और सीख
इस घटना से कुछ गहरी सीख निकलती है –
अनाथ बच्चों की सुरक्षा का ढांचा बने – प्रशासन को ऐसे परिवारों की पहचान करनी होगी, जिनके बच्चे पूरी तरह अकेले रह गए हैं। उनके लिए आपातकालीन मदद ज़रूरी है।
सामाजिक जागरूकता – पड़ोस और रिश्तेदारी की जिम्मेदारी केवल शादी-ब्याह तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। दुख और मौत में भी सहारा देना ज़रूरी है।
मानवता की शिक्षा – धर्म और जाति की दीवारें टूटनी चाहिए। इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है, यह शिक्षा परिवार और स्कूल से ही मिलनी चाहिए।
शासन का दायित्व – शवों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए स्थानीय निकायों को स्पष्ट व्यवस्थाएँ करनी होंगी।
तीन बच्चों का यह संघर्ष सिर्फ़ उनकी कहानी नहीं है। यह हमारी सामाजिक विफलता की कहानी भी है। लेकिन साथ ही यह उन दो मुस्लिम भाइयों की कहानी भी है, जिन्होंने साबित किया कि जब समाज मुंह मोड़ ले, तब भी इंसानियत ज़िंदा रह सकती है।
यह ठेला केवल एक शव को नहीं ढो रहा था, यह हमारे समाज की संवेदनहीनता का बोझ भी उठा रहा था। और इस बोझ को हल्का किया इंसानियत ने।