जीएसटी का ‘उत्सव’ बनाम 8 साल की ‘आफ़त’: राहत की ख़बर या चुभता सवाल

लहर डेस्क
21 सितंबर 2025 की शाम 5 बजे, जब प्रधानमंत्री टीवी पर आए तो पूरे देश को लगा कि कोई बड़ा ऐलान होने वाला है। लेकिन औपचारिक अंदाज़ में उन्होंने “जीएसटी बचत उत्सव” की घोषणा की। अगले ही दिन यानी 22 सितंबर से देशभर की दुकानों और मॉलों में “जीएसटी बचत उत्सव” के पोस्टर चमकने लगे। उपभोक्ता समूहों और व्यापारी संगठनों ने राहत की सांस ली—अब आटा, चावल, साबुन, डिटर्जेंट से लेकर टीवी और फ्रिज तक सस्ते मिलने वाले थे। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे “जनता के लिए सबसे बड़ा राहत पैकेज” करार दिया और दावा किया कि इस कदम से लोगों की जेब में करीब 2 लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त बचेंगे।
लेकिन जैसे ही जश्न का माहौल बना, एक सवाल हवा में तैर गया—“अगर यह राहत आज संभव थी, तो आठ साल तक जनता पर बोझ क्यों डाला गया?” यह सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक भी है।
जीएसटी 2.0: नया ढांचा, नई उम्मीदें।

जीएसटी परिषद ने चार स्लैब (5%, 12%, 18%, 28%) को घटाकर अब केवल दो स्लैब (5% और 18%) कर दिए हैं।
- 5% स्लैब: आटा, चावल, दालें, तेल, साबुन, टूथपेस्ट, डिटर्जेंट, बिस्किट जैसी रोज़मर्रा की वस्तुएँ।
- 18% स्लैब: टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन जैसे घरेलू उपकरण (पहले 28% पर थे)।
- शून्य जीएसटी: जीवन और स्वास्थ्य बीमा।
सरकार का दावा है कि इससे उपभोग बढ़ेगा और मांग में नई जान आएगी।
आँकड़ों में जीएसटी: 2017 से 2025
| वर्ष | अनुमानित जीएसटी संग्रह (लाख करोड़ रु.) | टैक्सपेयर्स की संख्या (करोड़) | महँगाई दर (%) |
|---|---|---|---|
| 2017-18 | 7.2 | 0.65 | 3.6 |
| 2018-19 | 9.0 | 0.85 | 4.3 |
| 2019-20 | 10.3 | 1.0 | 4.8 |
| 2020-21 | 8.5 (कोविड असर) | 1.1 | 6.2 |
| 2021-22 | 11.4 | 1.2 | 5.5 |
| 2022-23 | 13.0 | 1.3 | 6.7 |
| 2023-24 | 14.8 | 1.45 | 5.9 |
| 2024-25 | 16.2 | 1.5 | 6.1 |
वित्त मंत्रालय का वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey 2024-25)
विश्लेषण:
- टैक्सपेयर्स की संख्या दोगुनी से अधिक हुई।
- जीएसटी संग्रह लगातार बढ़ा, सरकार को मज़बूत राजस्व मिला।
- लेकिन महँगाई पर काबू नहीं पाया जा सका—आवश्यक वस्तुओं पर ऊँचे टैक्स ने बोझ बढ़ाया।
8 साल की आफ़त’: जनता का अनुभव
गृहिणी की नज़र से।
जयपुर की कविता देवी कहती हैं कि “जब जीएसटी आया, तो दाल-तेल जैसे सामान महंगे हो गए। हर महीने का बजट बिगड़ जाता था। अब अगर दाम सच में घटेंगे तो राहत है, लेकिन बीते सालों में जो तंगी झेली, उसका हिसाब कौन देगा?”
छोटे दुकानदार का दर्द।
पटना के कपड़ा व्यापारी मोहम्मद इरफ़ान बताते हैं कि “हमारे जैसे छोटे कारोबारियों के लिए जीएसटी सबसे बड़ा सिरदर्द था। हर महीने ऑनलाइन रिटर्न, इनवॉइस अपलोड, अकाउंटेंट की फ़ीस…सब खर्चा बढ़ गया। अब अगर सिस्टम सरल होगा तो राहत मिलेगी, लेकिन आठ साल की तकलीफ़ कोई नहीं भूलेगा।”
बीमा धारक की राहत।
दिल्ली के आईटी कर्मचारी अमित शर्मा कहते हैं कि “हम हर साल स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर 18% जीएसटी भरते थे। यह बहुत भारी लगता था। अब टैक्स हट गया है तो सच्ची राहत मिली है।”
उद्यमी की राय।
गुड़गांव की स्टार्टअप संस्थापक नेहा गुप्ता का कहना है कि “जीएसटी ने लंबे समय तक स्टार्टअप्स पर अनुपालन का बोझ डाला। लेकिन अब अगर केवल दो स्लैब रहेंगे और दरें कम होंगी, तो कारोबार आसान हो सकता है।”
राजनीतिक पैंतरेबाज़ी या आर्थिक सुधार?

विश्लेषकों का कहना है कि इस बदलाव का समय बहुत अहम है। 2026 में कई राज्यों में चुनाव और 2029 में लोकसभा चुनाव हैं।
- विपक्ष का आरोप: सरकार ने आठ साल तक जनता की जेब खाली की और अब चुनाव से पहले ‘राहत’ बांट रही है।
- सरकार का बचाव: अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने और टैक्स अनुपालन बढ़ाने के बाद ही ऐसे बड़े कदम उठाना संभव था।
यह बहस साफ़ करती है कि जीएसटी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहराई से राजनीतिक मुद्दा भी है।
अर्थशास्त्रियों की राय
- समर्थन में:
अर्थशास्त्री अरुण कुमार का मानना है कि “दर घटाने से खपत बढ़ेगी और जीडीपी को बल मिलेगा। यह मध्यम वर्ग और गरीबों के लिए सकारात्मक है।” - आलोचना में:
दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की प्रोफ़ेसर रश्मि बंसल कहती हैं, “आठ साल तक ऊँची दरों ने उपभोक्ता की जेब और छोटे उद्योग दोनों को नुकसान पहुँचाया। अब राहत देना स्वागतयोग्य है, लेकिन देर से लिया गया फैसला है।”
जीएसटी की उपलब्धियाँ बनाम चुनौतियाँ
उपलब्धियाँ:
- एक राष्ट्र, एक टैक्स का सपना साकार।
- लॉजिस्टिक लागत घटी, चेकपोस्ट हटे।
- टैक्स बेस और संग्रह बढ़ा।
चुनौतियाँ:
- छोटे व्यापारियों के लिए जटिल अनुपालन।
- शुरुआती वर्षों में ऊँचे स्लैब से महँगाई।
- राज्यों और केंद्र के बीच राजस्व बंटवारे पर खींचतान।
उत्सव और आफ़त के बीच की यात्रा
जीएसटी 2.0 निश्चित रूप से राहत की खबर है। इससे उपभोक्ता की जेब हल्की होगी और कारोबारी माहौल सरल हो सकता है। लेकिन “8 साल की आफ़त” का सवाल इतिहास में दर्ज रहेगा।
यह सुधार अगर 2017 में ही सरल ढांचे के साथ लागू होता, तो शायद भारत की आर्थिक कहानी अलग होती। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जीएसटी 2.0 केवल चुनावी ‘उपहार’ साबित होता है या सचमुच दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता लाता है।
जीएसटी की यात्रा हमें यही सिखाती है कि सुधार केवल नीति नहीं, बल्कि जनता के धैर्य और विश्वास से भी बनते हैं।