एक छोटे गाँव से उठी बड़ी कहानी

लक्ष्मी रानी: संघर्ष से बदलाव तक

फौजिया रहमान खान, नई दिल्ली


राजस्थान के गंगानगर ज़िले के गाँव 281 हैंड की गलियों में पली-बढ़ी लक्ष्मी रानी की कहानी उन असंख्य ग्रामीण स्त्रियों की कहानी है, जिनके जीवन में कम उम्र में ही विवाह और जिम्मेदारियों का बोझ डाल दिया जाता है। माता-पिता के दुलार में बचपन बीता, लेकिन आठवीं के बाद पढ़ाई छूट गई और महज़ सत्रह साल की उम्र में शादी हो गई।

ससुराल पहुँची तो जीवन की वास्तविकता और कठोरता से सामना हुआ। शिक्षा और जागरूकता की कमी वाला माहौल, और उसमें अपनी बात रखने पर दमन का सामना। पाँच वर्षों में दो बेटे हुए, लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते बिगड़ते गए। एक दिन घरेलू हिंसा ने हद पार कर दी। बेरहमी से मारपीट, टूटे सपनों के साथ घायल शरीर। यह क्षण उनकी ज़िंदगी का मोड़ साबित हुआ। पड़ोसियों ने मायके वालों को बुलाया, अस्पताल में भर्ती कराया गया, पुलिस तक मामला पहुँचा।

अतीत से विदाई और नये सफ़र की शुरुआत

घाव तो भर गए, लेकिन मन की पीड़ा कहीं गहराई तक रह गई। उसी पीड़ा ने उनके भीतर नई आग जलाई। उन्होंने ठान लिया कि अब खुद को और अपने बच्चों को एक नया जीवन देना है। उन्होंने पढ़ाई फिर से शुरू की, दसवीं और बारहवीं पास की।

उनके सामने सवाल था “अब आगे क्या?”

शहर बज्जू में पिता के साथ आकर वे एक एनजीओ (गैर सरकारी संगठन) से जुड़ीं। साल 2014 में यहाँ काम शुरू किया, और यहीं से लक्ष्मी रानी का संघर्ष एक सामाजिक आंदोलन में बदलने लगा।

हज़ारों बच्चों के जीवन में बदलाव

सबसे पहले उन्होंने एनजीओ में 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन के साथ काम किया। फोन पर आने वाली हर पुकार एक नई चुनौती होती। कहीं बाल विवाह रोका, कहीं बाल मजदूरी से बच्चों को छुड़ाया, तो कहीं घरेलू हिंसा से पीड़ित बच्चियों को सुरक्षित स्थान दिलाया। साल 2017 तक वे करीब 800 बच्चों तक पहुँच चुकी थीं। इस काम ने उन्हें संवेदनशील भी बनाया और मज़बूत भी। उनके लिए यह काम केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक मिशन था।

सीमा के गाँवों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना

2017 के बाद लक्ष्मी रानी ने एक और बड़ा कदम उठाया। वे क्राफ्ट प्रोग्राम से जुड़ीं। राजस्थान-पाकिस्तान बॉर्डर से लगे इलाक़ों के गाँवों में आजीविका के अवसर बेहद सीमित हैं। महिलाएँ घर की चारदीवारी तक सीमित रहती हैं। लक्ष्मी ने इन महिलाओं को संगठित किया और अलग-अलग कारीगरी से जोड़ा। कढ़ाई, सिलाई, बुनाई और अन्य हस्तशिल्प। इन्हीं के सहारे उन्होंने हज़ारों महिलाओं को आय का साधन दिया। परिणाम यह हुआ कि गाँव की वही महिलाएँ, जो पहले आर्थिक रूप से निर्भर थीं, अब हर महीने पाँच से दस हज़ार रुपये तक कमा रही हैं।

डिजिटल दुनिया की ओर कदम

लक्ष्मी जानती थीं कि भविष्य डिजिटल युग का है। उन्होंने खुद कंप्यूटर सीखा और फिर लड़कियों को सिखाने की ठानी। अब तक 150 से अधिक लड़कियाँ और 300 बच्चे कंप्यूटर शिक्षा पा चुके हैं। यह केवल तकनीकी ज्ञान नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने का रास्ता था।

न्याय और पुनर्मिलन

सालों बाद जब अदालत ने फैसला सुनाया, तो उनके पति और बच्चे फिर से उनके साथ रहने लगे। यह क्षण केवल व्यक्तिगत जीत नहीं था, बल्कि यह उस स्त्री की ताकत की पहचान थी, जिसने अपने हक़ के लिए संघर्ष किया और हार नहीं मानी।

राष्ट्रीय पहचान और सम्मान

साल 2022 लक्ष्मी रानी की ज़िंदगी में नई पहचान लेकर आया। उन्हें CII Foundation Exemplars के लिए चुना गया। यह केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि उस सफ़र की गवाही थी, जिसे उन्होंने आँसुओं, संघर्ष और हिम्मत से तय किया था। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से सम्मानित होना उनके लिए गर्व और प्रेरणा का क्षण था।

क्यों ज़रूरी है लक्ष्मी जैसी कहानियाँ?

राजस्थान के सीमावर्ती इलाक़ों में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की भारी कमी है। बाल विवाह यहाँ की एक कड़वी सच्चाई है। लड़कियाँ समय से पहले स्कूल छोड़ देती हैं और शादी के बंधन में बाँध दी जाती हैं। घरेलू हिंसा और सामाजिक दमन आम है। ऐसे में लक्ष्मी जैसी कहानियाँ केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज के लिए उम्मीद का प्रतीक हैं। वह यह दिखाती हैं कि बदलाव संभव है, अगर कोई ठान ले तो।

आलोचनात्मक दृष्टि

लक्ष्मी रानी

लेकिन यह भी सच है कि ऐसी कहानियाँ अपवाद हैं, नियम नहीं। सवाल यह है कि कितनी और लक्ष्मी रानी हैं जो आज भी आवाज़ नहीं उठा पातीं? सरकारी योजनाएँ और नीतियाँ काग़ज़ों पर भले मौजूद हों, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में उनका असर सीमित है। नागरिक समाज और एनजीओ (गैर सरकारी संगठन) संस्थाएँ जिस तरह हस्तक्षेप किया, वही असली बदलाव का कारण बना। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या केवल व्यक्तिगत संघर्ष से बदलाव आ सकता है, या व्यवस्था को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी?

आज और कल

आज लक्ष्मी रानी अपने गाँव और आसपास की हज़ारों महिलाओं-बच्चों की प्रेरणा हैं। उनका सपना है कि राजस्थान के सीमांत इलाक़ों की हर लड़की को डिजिटल शिक्षा से जोड़ा जाए। वे चाहती हैं कि कोई भी बच्ची उस दर्द से न गुज़रे, जिससे वे गुज़रीं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि हिम्मत और शिक्षा से हर बेड़ी तोड़ी जा सकती है।