जहाँ उम्मीद ने शक़्ल ली आवाज़ की?

लेखक: सुल्तान अहमद एवं रफी सिद्दीकी

दिल्ली की गलियों में जब सूरज धीरे-धीरे सिर उठाता है और धूल जमी सड़कों पर चाय की भाप फैलती है, तब खजूरी खास स्थित श्रीराम कॉलोनी की संकरी गलियों में एक पुराना ऑटो स्टार्ट होता है।

ऑटो के स्टार्ट होने की खड़खड़ाहट में थकी हुई दिल्ली की नींद टूटती है। हकबकाए, बदहवास लोग आंखें मलते हुए लड़खड़ाते पैरों को संभालते हैं — और उस ऑटो में बैठा एक इंसान, हसमत अली, दिन की पहली सवारी से पहले अपने आपसे एक वादा करता है:

आज किसी की आवाज़ बनूंगा।”

हसमत अली — कोई मंत्री नहीं, कोई नामचीन नेता या सेलिब्रिटी नहीं। वह एक साधारण ऑटो चालक है, जिसने अपने जीवन की स्टीयरिंग को केवल कमाई तक सीमित नहीं रखा। उसने रफ्तार दी उस दिशा को, जहाँ सड़कें जाती थीं — उन वीरान, गंदगी से भरी गलियों के लोगों के दुःख-दर्द, अन्याय और उम्मीदों की ओर। शहरी प्लानिंग कमिशन इन्हें सकल घरेलू उत्पाद में ‘बड़ा  घोटक’ मानता तो है, लेकिन इनके लिए कुछ करता नहीं।

मोबाइल से बनी आवाज़ का औज़ार

कभी अपने ही मोहल्ले की टूटी नालियों की दुर्गंध से परेशान रहने वाला हसमत, अब ‘श्रमिक वाणी’ नामक सामुदायिक मीडिया मंच से जुड़कर समाज की दुर्गंध को दूर करने की लड़ाई में उतर चुका है।

मोबाइल तकनीक उसके लिए कोई फैशन नहीं, बल्कि एक ऐसा औज़ार बन गई है — जो मूक समाज को वाणी दे सके।

अब वह हर वह आवाज़ रिकॉर्ड करता है जिसे दबा दिया गया है जैसे किसी बुज़ुर्ग की पेंशन न आना, किसी विधवा का राशन कट जाना, या गली के मज़दूरों को समय पर वेतन न मिलना।

हसमत किसी भी घटना को “छोटी बात” नहीं मानता, जैसे तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया जन मुद्दों को छोटा मानती है।

आवाज़ बनती गई आंदोलन

मोबाइल वाणी से जुड़े हुए हसमत को आठ साल से अधिक हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने कई बार प्रशिक्षण लिया — ऑफलाइन भी और ऑनलाइन भी। इन प्रशिक्षणों में उन्होंने सिर्फ तकनीक नहीं सीखी, बल्कि यह समझा कि एक खबर सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि एक संघर्ष का दस्तावेज़ होती है।

उन्होंने यह भी सीखा कि इंसान के चेहरे के हाव-भाव क्या कहते हैं, जो डाटा में नहीं दिखते। कंप्यूटर की मेमोरी मानवीय पीड़ा को पढ़ नहीं सकती। उन्होंने जाना कि गरीबों की खुशियाँ और उनके चेहरे की मुस्कान कितनी कीमती होती है — और उसी मुस्कान के लिए वे जी-जान से जुट जाते हैं।

उन्होंने सीखा कि किस तरह एक साधारण मुद्दा, जब सही सवालों के साथ उठाया जाए, तो शासन की दीवारें भी सुनने लगती हैं।

जब स्कूल ने इनकार किया

दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने प्रवासी मजदूरों के बच्चों को सिर्फ इसलिए दाख़िला देने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके पास स्थानीय पते का प्रमाण नहीं था। ये बच्चे सड़क के किनारे, झुग्गियों में पढ़ने का सपना देखते थे और व्यवस्था ने उन्हें काग़ज़ों की दीवारों से बाहर फेंक दिया था।

हसमत ने इसे निजी संघर्ष की तरह लिया। उन्होंने माँ-बाप की दबी आवाज़ें रिकॉर्ड कीं, बच्चों की टूटती आंखों से झांकते सपनों को शब्द दिए और मोबाइल वाणी के मंच से सवाल उछाला:

क्या शिक्षा का अधिकार सिर्फ स्थायी पते वालों के लिए है?”

यह आवाज़ गूंजी — और इतनी गूंजी कि प्रशासन की मोटी, वातानुकूलित दीवारें हिलने लगीं।
नतीजा: 15 बच्चों को दाख़िला मिला। और समाज ने महसूस किया कि चुप्पी से बड़ा कोई अन्याय नहीं होता।

फैक्ट्री के भीतर की आवाज़

श्रीराम कॉलोनी के पास के औद्योगिक छेत्र की एक फैक्ट्री में मजदूरों से 12-12 घंटे काम लेकर उन्हें आधी मजदूरी दी जा रही थी। कोई सुनवाई नहीं होती थी।

हसमत वहाँ पहुँचे — न नारों के साथ, न झंडे लेकर — सिर्फ एक मोबाइल रिकॉर्डर और अपने भीतर की आग लेकर।

उन्होंने मजदूरों की व्यथा को शब्द दिए, समय पर न मिलने वाले वेतन की टीस को आवाज़ दी, और श्रमिक अधिकारों की चेतना को फिर से ज़िंदा कर दिया। फैक्ट्री को झुकना पड़ा। मजदूरों को उनका हक़ मिला।

एक नई पहचान — कर्म, अधिकार और आत्मबल

मोबाइल वाणी के अभियानों, सर्वेक्षणों और खबरों में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उन्हें सिर्फ एक सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं बनाया बल्कि एक आर्थिक रूप से सशक्त, विकासशील आजीविका धारक नागरिक भी।

जो पहले दिन भर की दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करता था, अब वही हर महीने सामाजिक उत्थान और जरूरी सवालों को हल करने के एवज में मिलने वाली आर्थिक सहायता से अपने बच्चों की पढ़ाई, दवाइयाँ और छोटे सपनों की तक़दीर  खरीद पा रहा है।

अब जब हसमत अपने ऑटो में बैठते हैं, तो वह सिर्फ एक ड्राइवर नहीं दिखते।
वह समाज के सबसे अनसुने कोनों से निकली आवाज़ों को लेकर चलते हैं कभी प्रशासन तक, कभी समाज के ज़मीर तक।

क्योंकि वे जानते हैं:

“जिस दिन आम आदमी बोलना सीख गया, उसी दिन बड़े-बड़े महलों की दीवारें सुनना शुरू कर देंगी।”

(ग्राम वाणी फीचर्स)