आस्था पर पहरा और ‘बुलडोज़र न्याय’: क्या भारतीय संविधान की आत्मा मदद की गुहार लगा रही है?

अनीस आर ख़ान, नई दिल्ली
भारत की बहुलतावादी संस्कृति और उसका धर्मनिरपेक्ष संविधान लंबे समय से पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल रहे हैं। संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आ रही तस्वीरें बेहद चिंताजनक हैं। मस्जिदों को तोड़ा जाना, नमाज़ अदा कर रहे लोगों को सरेआम अपमानित किया जाना और अब तो निजी घरों में सामूहिक प्रार्थना पर भी रोक—ये सब हमें एक असहज सवाल पूछने पर मजबूर करते हैं:
क्या न्याय का पलड़ा किसी एक समुदाय के खिलाफ झुकता जा रहा है?

बुलडोज़र सिंड्रोम: मेहरौली से हल्द्वानी तक
आज बुलडोज़र सिर्फ़ एक मशीन नहीं रह गया है, बल्कि एक खतरनाक मानसिकता का प्रतीक बन चुका है। चाहे दिल्ली के मेहरौली में 600 साल पुरानी अखूंजी मस्जिद को गिराया जाना हो या हल्द्वानी के बनभूलपुरा में मदरसे और मस्जिद को ढहाया जाना—“अवैध अतिक्रमण” के नाम पर जिस तेजी और तरीके से कार्रवाई की गई, वह कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
तथ्य:
मेहरौली मामले में वक़्फ़ रिकॉर्ड में मस्जिद की वैधता दर्ज होने के बावजूद, रातों-रात उसे ढहा दिया गया।


कानूनी चिंता:
सुप्रीम कोर्ट बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि बिना उचित प्रक्रिया और पूर्व सूचना के किसी भी ढांचे को नहीं तोड़ा जा सकता। लेकिन आज ‘न्याय’ अदालतों से नहीं, बल्कि बुलडोज़रों से होता दिख रहा है।

सार्वजनिक अपमान: दिल्ली की घटना
कुछ महीने पहले दिल्ली के इंद्रलोक इलाके से एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक पुलिसकर्मी सड़क किनारे नमाज़ पढ़ रहे एक युवक को लात मारते हुए दिखाई दिया। इस दृश्य ने लाखों भारतीय मुसलमानों की आत्मा को झकझोर कर रख दिया।
हां, सड़क पर नमाज़ से यातायात प्रभावित हो सकता है—लेकिन क्या इसका जवाब अपमान और हिंसा है?
दोहरा मापदंड साफ़ दिखता है:
जब धार्मिक जुलूस या यात्राएँ दिनों तक सड़कें जाम करती हैं, तो उन पर फूल बरसाए जाते हैं और प्रशासन पूरी व्यवस्था करता है। लेकिन दस मिनट की नमाज़ अचानक “कानून-व्यवस्था की समस्या” बन जाती है।

घर में नमाज़: क्या अब यह भी अपराध है?
सबसे चिंताजनक स्थिति उत्तर प्रदेश के बरेली, मुरादाबाद और मेरठ जैसे जिलों से सामने आई है, जहां लोगों के खिलाफ अपने ही घरों में सामूहिक नमाज़ अदा करने पर एफआईआर दर्ज की गई।
कानून का दुरुपयोग:
आईपीसी की धारा 153A और 505 जैसी गंभीर धाराएं शांतिपूर्वक इबादत करने वालों पर लगाई जा रही हैं, मानो वे “सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने” के दोषी हों।
संवैधानिक सवाल:
अगर कोई व्यक्ति अपने घर में परिवार के साथ नमाज़ पढ़ता है, तो उससे सार्वजनिक व्यवस्था कैसे भंग होती है? यह न केवल धार्मिक स्वतंत्रता बल्कि निजता के मौलिक अधिकार पर भी सीधा हमला है।

आंकड़े और वैश्विक चिंता
इंडिया हेट लैब रिपोर्ट (2023–24):
धार्मिक स्थलों पर हमलों और नफरत फैलाने वाली घटनाओं में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF):
अपनी ताज़ा रिपोर्ट में उसने एक बार फिर भारत को “कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न” की सूची में डालने की सिफारिश की है, धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंधों का हवाला देते हुए।

न्यायपालिका से उम्मीद
भारतीय मुसलमान हमेशा संविधान में आस्था रखते आए हैं और उसकी सर्वोच्चता पर विश्वास करते हैं। आज ज़रूरत है कि उच्च न्यायपालिका स्वतः संज्ञान लेते हुए इन घटनाओं पर हस्तक्षेप करे।
अगर आज घर में नमाज़ पढ़ना अपराध बना दिया गया, तो कल इसकी सीमा कहाँ जाकर रुकेगी?
लोकतंत्र बदले की भावना से नहीं, न्याय से चलता है। अगर राज्य की कोई शाखा अल्पसंख्यकों को डराने लगे, तो वह गणराज्य की नींव को हिला देती है। मुसलमानों को भी चाहिए कि वे शांतिपूर्ण ढंग से, संवैधानिक दायरे में रहकर अपने अधिकारों के लिए सजग रहें।
क्योंकि जब आस्था पर पहरा बिठाया जाता है और न्याय को बुलडोज़र से रौंदा जाता है, तो नुकसान किसी एक समुदाय का नहीं पूरे लोकतंत्र का होता है।