पानी में उतरता एक सवाल: कटिहार के तालाब से उठती आवाज़ें

लहर डेस्क /अनीस आर ख़ान, नई दिल्ली
कटिहार की दोपहर थी। आसमान से बरसती धूप खेतों को झुलसा रही थी, मगर तालाब का पानी घुटनों तक ठंडा था। इसी पानी में अपनी पैंट मोड़कर राहुल गांधी उतरे और सीधे मखाना तोड़ते मज़दूरों के बीच खड़े हो गए। चारों ओर हरे-भूरे पत्तों की परत, हाथों में बांस की टोकरी और कीचड़ में डूबी मेहनतकश हथेलियाँ—यह दृश्य सिर्फ़ एक तस्वीर भर नहीं था, बल्कि उस अदृश्य जीवन का आईना था, जहाँ रोज़ रोटी-रोज़गार पानी के भीतर से निकलता है।
राजनीति में ऐसे क्षण कम ही आते हैं जब कैमरा और जनता, प्रतीक और प्रक्रिया, सब एक साथ दिखते हैं। राहुल गांधी की यह तस्वीर उसी तरह चर्चा में रही, जैसे किसी नेता का हल उठाना या चाक पर मिट्टी गढ़ना। मगर सवाल यह है—क्या यह दृश्य केवल ‘फ़ोटो-ऑप’ था, या वास्तव में उस श्रम-जगत में प्रवेश की कोशिश जहाँ भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हक़ीक़त दबी पड़ी है?
मखाना: इतिहास और पहचान
मखाना, जिसे गोरगोनट या फॉक्सनट भी कहा जाता है, बिहार की संस्कृति और आर्थिकी से सदियों से जुड़ा है। मिथिला क्षेत्र के तालाबों में इसे देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, और यह व्रत-उपवास का भी प्रमुख हिस्सा है।
इतिहासकार बताते हैं कि 17वीं शताब्दी के मुगल ग्रंथों में भी मखाना का उल्लेख मिलता है। अंग्रेज़ी शासन के दौरान इसे “लोटस सीड” कहकर यूरोप भेजा गया, लेकिन असली पहचान इसे 20वीं सदी के उत्तरार्ध में मिली जब इसका उपयोग “स्वास्थ्यवर्धक स्नैक” के रूप में शुरू हुआ।
आज मखाना को “सुपरफूड” कहा जाता है। 2022 में भारत ने 2500 करोड़ रुपये से ज़्यादा का मखाना उत्पादन किया, और इसमें से 80-90% हिस्सा बिहार से आया। मिथिला मखाना को 2022 में जीआई टैग भी मिला। लेकिन यह सारी चमक एक कड़वे सच को ढँक देती है—मजदूर की झुकी हुई पीठ और कीचड़ में घुटनों तक धँसे पैर।
तालाब के भीतर की सच्चाई
तालाब से मखाना निकालना कोई आसान काम नहीं। मज़दूर पानी में झुककर काँटेदार डंठलों से बीज निकालते हैं। कई घंटे की मेहनत के बाद सिर्फ़ कुछ किलो गीले बीज मिलते हैं। इन्हें सुखाना, भूनना और बार-बार तपाना पड़ता है, तब जाकर पॉप होकर सफ़ेद दाने तैयार होते हैं।
“साहब, सुबह पाँच बजे से हम पानी में उतरते हैं। घुटनों तक कीचड़, हाथ में काँटे की चोट, और दिन भर में बस इतना कमाते हैं कि घर का राशन ही मुश्किल से चलता है।” मोहम्मद सुल्तान, मखाना मज़दूर, कटिहार
यह प्रक्रिया इतनी श्रम-प्रधान है कि परिवार के लगभग सभी सदस्य इसमें शामिल हो जाते हैं। बच्चे स्कूल से लौटकर भी तालाब पर लग जाते हैं, महिलाएँ घर संभालने के बाद बीज छाँटती हैं, और पुरुष पानी में उतरते हैं।
फिर भी मजदूर की जेब में बचता है बहुत कम। बिचौलियों और व्यापारी नेटवर्क की पकड़ इतनी मज़बूत है कि असली मुनाफ़ा कहीं और चला जाता है।
राजनीति और पानी का संगम
राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का मक़सद भले चुनावी था—लोकतंत्र, मतदाता सूची और नागरिक अधिकारों को केंद्र में लाना। लेकिन कटिहार में तालाब के बीच उतरकर मजदूरों से बात करना इस यात्रा का सबसे शक्तिशाली प्रतीक बन गया।
एक ओर जनता ने देखा कि एक राष्ट्रीय नेता उनके कामकाज की वास्तविकता को छू रहा है। दूसरी ओर मीडिया ने इसे सुर्ख़ियों में रखा—“राहुल पानी में उतरे, मज़दूर ने दिल की बात कही।” इस दृश्य ने सरकार की उपेक्षा, किसानों की समस्या और मज़दूरों की रोज़मर्रा की लड़ाई को राष्ट्रीय विमर्श में जगह दी।
मगर असली सवाल यही है—प्रतीक से आगे कौन बढ़ेगा? क्योंकि कैमरा पलटते ही मजदूर फिर उसी तालाब में लौट आया, उसी अनिश्चित मजदूरी, उसी कीचड़ और उन्हीं जोखिमों के साथ।
मज़दूर के दिल की बात
“बीज निकालने के बाद भी असली पैसा तो व्यापारी ले जाता है। हमको न पक्का भाव मिलता है, न कोई बीमा। अगर बीमारी हो जाए तो रोज़ी भी छिन जाती है।” — सुनीता देवी, मज़दूरनी, दरभंगा
मखाना मज़दूरों का कोई स्थायी अनुबंध नहीं होता। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की पहुँच अक्सर अधूरी रहती है। भुगतान का तरीका भी तय नहीं—कहीं वजन के हिसाब से, कहीं दिहाड़ी पर।
“हम चाहेंगे कि सरकार यहाँ छोटे-छोटे भट्ठे और यूनिट लगाए। ताकि हम यहीं मखाना प्रोसेस कर सकें, और बिचौलियों पर निर्भर न रहें।” — मुन्ना लाल, सहरसा
कई बार पूरा परिवार दिन भर की मेहनत के बाद उतनी कमाई कर पाता है जिससे बस घर का राशन भर सके। यही वजह है कि मजदूरों की अपेक्षा सिर्फ़ सहानुभूति नहीं होती, बल्कि संरचनात्मक बदलाव की होती है।
बाज़ार की चमक बनाम खेत की सच्चाई
मिथिला मखाना को GI टैग मिलने के बाद निवेशक, स्टार्टअप और निर्यातक इसमें रुचि दिखाने लगे। शहरी भारत में इसे “हेल्दी स्नैक” के रूप में अपनाया जाने लगा।
“तालाब में खड़े रहना आसान नहीं है। कई बार पैरों में फोड़े हो जाते हैं, फिर भी दवा तक अपनी जेब से खरीदनी पड़ती है। हमारी मेहनत का दाम हमें मिलना चाहिए।” — शांति देवी, मधुबनी
ज्यादातर मुनाफ़ा प्रोसेसिंग और मार्केटिंग के स्तर पर जाता है। प्राथमिक उत्पादक और तालाब में मेहनत करने वाले मजदूर वहीं के वहीं रह जाते हैं। अगर स्थानीय स्तर पर माइक्रो-प्रोसेसिंग यूनिट और मज़दूर सहकारिताएँ खड़ी हों, तो मूल्य-श्रृंखला का बड़ा हिस्सा यहीं टिक सकता है।
जलवायु और जोखिम
बदलते मौसम ने भी मखाना उत्पादन को असुरक्षित बना दिया है। कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी तालाब की गहराई घट जाना—इन सबका असर सीधा मजदूर की रोज़ी पर पड़ता है।
वैज्ञानिक बताते हैं कि अब पारंपरिक तालाब सिकुड़ रहे हैं। जलग्रहण क्षेत्रों में निर्माण और रासायनिक खेती ने भी तालाबों की सेहत पर असर डाला है।
मजदूरों के लिए यह काम वैसे भी जोखिम भरा है। घंटों पानी में खड़े रहने से त्वचा रोग, साँप-बिच्छू के काटने और थकान का खतरा हमेशा बना रहता है।
सामाजिक ताने-बाने में मखाना
मखाना उत्पादन सिर्फ़ एक फसल नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज का हिस्सा है। यहाँ जाति और वर्ग की रेखाएँ भी साफ़ दिखाई देती हैं। अधिकांश तालाबों का स्वामित्व बड़े किसानों या महाजनों के पास है, जबकि मजदूर भूमिहीन दलित या पिछड़े समुदायों से आते हैं।
इसलिए मखाना की पूरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक असमानता भी छिपी हुई है। तालाब से लेकर मंडी तक, मजदूर हमेशा ‘नीचे’ की कड़ी में फँसा रहता है।
नीति और भविष्य
सरकार ने हाल के वर्षों में “प्रधानमंत्री मखाना मिशन” जैसी योजनाएँ घोषित कीं। लेकिन ज़मीन पर इनका असर अभी सीमित है। छोटे किसानों और मज़दूरों के लिए कर्ज़, बीमा, और तकनीकी सहायता तक पहुँचना आसान नहीं है।
जरूरत है-
मज़दूरों की औपचारिक पहचान और सामाजिक सुरक्षा
तालाब प्रबंधन की वैज्ञानिक प्रणाली
बिचौलियों पर रोक और सीधे खरीद की व्यवस्था
स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयाँ और सहकारिताएँ
पारदर्शी भुगतान और मूल्य-स्थिरता
अगर ये कदम उठाए जाएँ तो मखाना उद्योग सिर्फ़ निर्यात का चमकता सितारा नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय मज़दूरों के जीवन का भी सहारा बन सकेगा।
उपसंहार
कटिहार के उस तालाब का पानी अब भी वहीं है। मज़दूर आज भी उसी तरह उसमें उतरते हैं। फर्क बस इतना है कि अब उस पानी में एक सवाल तैर रहा है—क्या किसी नेता का उतरना हमारी ज़िंदगी बदल सकता है, या यह सिर्फ़ एक और दृश्य था?
लोकतंत्र की असली परख वहीं होती है—जहाँ वोटर अधिकार, श्रम अधिकार और जीवन अधिकार एक साथ खड़े हों। मखाना मज़दूर की झुकी पीठ हमें यही याद दिलाती है कि तस्वीरों से आगे बढ़कर अगर दस्तावेज़ और नीतियाँ नहीं बनीं, तो लोकतंत्र का यह तालाब हमेशा अधूरा रहेगा।