चौधरी सलामुद्दीन बजाड़ का राजनीतिक और सामाजिक सफर

गुज्जर बकरवाल के बेबाक नेता
मोहम्मद अय्यूब कटारिया, वारसन, कुपवाड़ा
पृष्ठभूमि और इलाके का महत्व
उत्तरी कश्मीर के सरहदी ज़िला कुपवाड़ा से लगभग बाईस किलोमीटर दूर बसा गाँव वारसन गुज्जरान सिर्फ़ अपनी भौगोलिक विशेषताओं की वजह से ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक महत्व की वजह से भी जाना जाता है। पहाड़ों की गोद में बसा यह गाँव गुज्जर–बकरवाल बिरादरी की मेहनत, बहादुरी और वफ़ादारी का प्रतीक माना जाता है।
यह गाँव सिर्फ़ एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि ऐसी धरती है जहाँ कई शख्सियतें पैदा हुईं, जिन्होंने न केवल अपने इलाके बल्कि पूरे कश्मीर की राजनीतिक और सामाजिक फिज़ा पर असर डाला। इन्हीं हस्तियों में चौधरी सलामुद्दीन बजाड़ का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जा सकता है, जिन्होंने राजनीति में ही नहीं बल्कि समाजिक स्तर पर भी अमिट छाप छोड़ी। ख़ैर मोहम्मद बजाड़, जो अपने ज़माने के रईस और नंबरदार थे, गाँव की केंद्रीय शख्सियत माने जाते थे। इसी खानदान ने आगे चलकर दो ऐसे फ़र्ज़ंद दिए। चौधरी सलामुद्दीन और चौधरी जलालुद्दीन जिन्होंने अपनी जुर्रत और बेबाकी से पूरी नस्ल को प्रभावित किया।
सलामुद्दीन बजाड़ का शुरुआती और राजनीतिक सफर

1990 का दशक कश्मीर की तारीख़ का सबसे अशांत दौर माना जाता है। एक तरफ़ आतंकवाद और ख़ून-ख़राबा, दूसरी तरफ़ डर और सहम का माहौल; ऐसे में किसी का भारत के साथ खड़ा होना मौत को न्योता देने जैसा था। लेकिन चौधरी सलामुद्दीन बजाड़ उन चुनिंदा लोगों में से थे जिन्होंने गोलियों की बौछार में खड़े होकर “आज़ाद हिंदुस्तान ज़िंदाबाद” का नारा बुलंद किया। यह सिर्फ़ एक नारा नहीं बल्कि एक रुख़ था, जो अपनी जान हथेली पर रखे बिना मुमकिन न था। उनके कई साथी मौत के घाट उतार दिए गए। अल्फ़ुद्दीन बजाड़ और काचामा के सरीर ख़ान समेत दर्जनों लोग सिर्फ़ इसलिए निशाना बने कि वे मुल्क के साथ वफ़ादार थे।
ऐसे हालात में 3 मार्च 1993 का दिन यादगार है, जब सलामुद्दीन बजाड़ ने उस वक़्त के केंद्रीय गृह मंत्री राजेश पायलट को वारसन, मेलियाल और शमनाग में जनसभाओं को संबोधित करने के लिए बुलाया। हज़ारों की भीड़ के सामने उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि “आप उम्मीद मत छोड़िए, कश्मीर हिंदुस्तान के साथ था और रहेगा।”
यह ऐलान महज़ अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि एक सियासी एलान-ए-जंग था। नतीजे में उनके जवान बेटे को, शादी के सिर्फ़ सात दिन बाद, गोलियों का निशाना बनाया गया। लेकिन चौधरी साहब के क़दम कभी नहीं डगमगाए। वे लगातार यही पुकार लगाते रहे:
“अलबरक बीड़ा ग़र्क” यानी जो दहशतगर्दी का साथ देगा, उसका सफाया होगा।
क़ुर्बानियाँ और तालीमी व सामाजिक सेवाएँ
यह कहना ग़लत न होगा कि सलामुद्दीन बजाड़ ने अपने क़बीले और इलाके के लिए क़ुर्बानियों का एक नया बाब लिखा। वारसन इलाके में क़रीब 42 लोग आतंकवाद की बर्बरता का शिकार हुए। मगर इन्हीं क़ुर्बानियों का नतीजा है कि आज वही इलाका देशभक्ति और तिरंगे की रैलियों का केंद्र बना हुआ है।
राजनीतिक मैदान में उन्होंने कांग्रेस के साथ वफ़ादारी निभाई। वे मुफ़्ती मोहम्मद सईद, ग़ुलाम नबी आज़ाद, प्रोफ़ेसर सैफ़ुद्दीन सोज़, ग़ुलाम रसूल कार और दूसरे क़द्दावर नेताओं के क़रीबी रहे। कुपवाड़ा विधानसभा सीट से उन्होंने दो बार चुनाव लड़ा। एक बार महज़ 145 वोटों के फ़र्क़ से हार मिली। यह हार दरअसल उस दौर की जनता की मानसिकता का नतीजा थी, जब बंदूक उठाना “बहादुरी” और सरकार के साथ खड़ा होना “कमज़ोरी” समझा जाता था।
लेकिन सलामुद्दीन बजाड़ का असली कमाल उनकी सामाजिक सेवाओं में था। जब घाटी के ज़्यादातर इलाके तालीम से महरूम थे, उन्होंने वारसन में हायर सेकेंडरी स्कूल क़ायम कराया, चार मिडिल स्कूल बनवाए और गुज्जर–बकरवाल हॉस्टल के क़ियाम पर ज़ोर दिया। उनका यक़ीन था कि बंदूक की छाया से निकलने का रास्ता सिर्फ़ तालीम है।
उन्हें कई बार स्टेट एडवाइजरी बोर्ड का सदस्य नामज़द किया गया। वे गुज्जर–बकरवाल कांफ़्रेंस के राज्य सलाहकार रहे। इंटरनेशनल गुज्जर महासभा के चेयरमैन, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के ज़िला अध्यक्ष कुपवाड़ा और एग्ज़ीक्यूटिव कमेटी सदस्य के तौर पर भी उनकी सेवाएँ अहम रहीं।
आख़िरी दिन, वफ़ात और विरासत

ज़िंदगी के आख़िरी साल में वे बीमार ज़रूर रहे, लेकिन उनकी ज़ुबान पर हमेशा तीन बातें रहतीं:
- ख़ुदा की इबादत
- मुल्क की वफ़ादारी
- तालीम की अहमियत
10 सितंबर 2025 को वे इस फ़ानी दुनिया से रुख़सत हो गए। उनकी मौत ने सिर्फ़ गुज्जर–बकरवाल कौम को नहीं बल्कि पूरे कश्मीर को ग़मगीन कर दिया। उनके जनाज़े में कई राजनीतिक और सामाजिक शख्सियतों ने शिरकत की और उन्हें श्रद्धांजलि दी।
- मीर सैफ़ुल्लाह ने कहा: “मेरी सियासत की शुरुआत इन्हीं की वजह से हुई।”
- डीडीसी मुस्तफ़ा ने कहा: “उन्होंने हमें हाथ पकड़कर चलना सिखाया।”
- भाजपा के सैयद रफ़ीक़ शाह ने कहा: “जब कश्मीर में बंदूक का कल्चर था, चौधरी साहब ने मुल्क की सलामती बचाई।”
- पीडीपी के ग़ुलाम नबी लोन, ख़ुरशीद आलम और नूर मोहम्मद ने उन्हें “जनजातीय समुदाय का सायबान” बताया।
- महबूबा मुफ़्ती, सज्जाद ग़नी लोन और जावेद अहमद राणा ने ट्विटर पर दुख ज़ाहिर किया।
- ग़ाज़ी हुसैन मक्की ने कहा: “ऐसी शख्सियतें सदियों बाद पैदा होती हैं।”
- आईटी सचिव हफ़ीज़ मसूदी ने कहा: “वह जात–पात से ऊपर उठकर हर किसी का दर्द बाँटते थे।”
एक शख्स नहीं, एक दौर
चौधरी सलामुद्दीन बजाड़ की शख्सियत सिर्फ़ एक इंसान की नहीं बल्कि पूरे दौर की निशानी थी। वे नेता भी थे, अदीब भी और समाजसेवी भी। उन्होंने अपने इलाके को तालीम की रौशनी दी, अपनी बिरादरी को इज़्ज़त बख़्शी और वतन के साथ वफ़ादारी को क़ुर्बानियों से साबित किया। आज जब हम उनकी जद्दोजहद को याद करते हैं तो साफ़ नज़र आता है कि वे महज़ एक रहनुमा नहीं बल्कि एक ऐसा बाब थे जिसने गुज्जर–बकरवाल कौम की तारीख़ को हमेशा के लिए सुनहरा बना दिया।