एक भारत की दो कहानियाँ

अनीस आर खान, नई दिल्ली
भारत। एक ऐसा देश है जहाँ हर सुबह दो अलग ही दुनिया जन्म लेती हैं। एक तरफ़ महानगरीय चमक, ग्लोबल तकनीक और उपभोक्तावाद की कतारें हैं। तो दूसरी तरफ़ गांव के खेत, धूप‑सूरज में झुलसते किसान और खाद, बीज और पानी के लिए संघर्षरत हाथ। कल्पना करें तो एक भारत वर्चुअल रियलिटी हेडसेट्स में खोया हुआ, मॉल और ड्रोन पैकेज से सजी दुनिया, और दूसरा भारत, जो अभी भी मिट्टी और मौसम से जुड़ा, अपनी बुनियादी जरूरतों की लड़ाई में लगा है। यह कहानी है एक सपनों और लालसा की, दूसरी संघर्ष और जीविका की।
उपभोक्तावाद का भारत।
आप कल्पना करें, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु की दुकानों के बाहर लंबी कतारें, लोग कम से कम 80,000 रू के नए iPhone का इंतजार कर रहे हैं। यह कतार केवल तकनीक का प्रतीक नहीं, बल्कि पहचान और सामाजिक स्थिति का भी दर्पण है।

स्मार्टफोन अब जीवन का अंग बन चुके हैं। 2025 के डेटा के अनुसार भारत में 85.5% घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन है, और ग्रामीण क्षेत्रों में भी 95.5% लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। 5G उपयोगकर्ता की संख्या 365 मिलियन तक पहुँच चुकी है। इंस्टाग्राम, OTT, डिजिटल भुगतान, सबकुछ रोजमर्रा का हिस्सा बन गया है। शहरों में युवा अपने पुराने फोन को ‘पुराना’ मानकर नए गैजेट्स की कतार में खड़े हैं। यह भारत उपभोक्तावाद की दौड़ में सबसे आगे है।
संघर्ष का भारत।
भारत की यह तस्वीर पूरी नहीं होती अगर हम ग्रामीण भारत की ओर न देखें। राजस्थान, यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड के गांवों में किसान खाद की बोरी के लिए सुबह से कतार में खड़े हैं। कभी ट्रैक्टर की लाइट, कभी खाली बोरी बिछाकर इंतजार कर रहे हैं, कई बार लाठीचार्ज तक झेलना पड़ता है।

खाद और बीज किसानों के लिए जीवन और मृत्यु का सवाल बन जाते हैं। बजट 2025‑26 में खाद और खाद्य सब्सिडी के लिए ₹ 3.71 लाख करोड़ आवंटित किए गए थे, जिसमें से खाद पर ₹ 37,216 करोड़ विशेष रूप से किसानों के लिए। फिर भी वितरण में देरी और असमानता किसानों को कतार में खड़ा कर देती है।
ग्रामीण भारत की गरीबी दर 2023‑24 में गिरकर 4.86% हो गई, जबकि शहरी गरीबी 4.09% थी। लेकिन आंकड़े केवल एक हिस्सा दिखाते हैं। वास्तविक संघर्ष तब है जब फसल सूखती है, बिजली नहीं है, और बाजारों तक पहुँच मुश्किल है।
राज्योंवार अंतर: डिजिटल और आर्थिक विभाजन।
भारत के कुछ राज्य जैसे केरल, पंजाब, हिमाचल, गुजरात डिजिटल क्रांति और उपभोक्तावाद दोनों में आगे हैं। यहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में स्मार्टफोन की पहुँच 90%से भी अधिक है। दूसरी ओर, बिहार, यूपी, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्य अभी भी डिजिटल विभाजन झेल रहे हैं, यहाँ के ग्रामीण हिस्सों में स्मार्टफोन की पहुँच केवल 60‑65% है।
गरीबी और जीवन-स्तर में भी अंतर है। बिहार में ग्रामीण गरीबी रेखा ₹ 2,616/माह, झारखंड में ₹ 2,263/माह, जबकि केरल जैसे राज्य में यह बहुत कम है। यह अंतर दिखाता है कि “खाद की कतार” और “iPhone की कतार” क्यों इतना भिन्न अनुभव देती हैं।

भविष्य की झलक।
तकनीक और उपभोक्तावाद के फैलाव से शहर और गांव के बीच की खाई और बढ़ सकती है।
- शहर: आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, रोबोट, मेटावर्स और इलेक्ट्रिक वाहनों से लैस।
- गांव: जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की कमी से जूझता।
यदि डिजिटल एग्रीकल्चर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ ग्रामीण भारत तक पहुँच जाएँ, तो यह खाई कम हो सकती है। किसान भी स्मार्ट खेती और बाज़ारों से जुड़ सकते हैं। लेकिन असली खतरा यह है कि यदि डिजिटल और आर्थिक असमानता इसी तरह बढ़ती रही, तो “दो भारत” की खाई और गहरी होगी।
समाधान और मार्ग।

दो भारतों को मिलाने के लिए कदम उठाने होंगे:
- डिजिटल एग्रीकल्चर: ड्रोन सिंचाई, मिट्टी सेंसर, ऑनलाइन बाज़ार।
- समान शिक्षा और स्वास्थ्य: हर बच्चे को समान अवसर, चाहे वह शहर में हो या गाँव में।
- नीतिगत सुधार: सब्सिडी, खाद और बीज वितरण में पारदर्शिता।
डेटा बताता है कि स्मार्टफोन पहुँच और उपभोक्ता क्रय शक्ति बढ़ रही है, लेकिन किसानों की ज़रूरतें अभी भी प्राथमिक हैं। अगर नीति और तकनीक साथ चलें, तो भविष्य का भारत संतुलित और विकसित हो सकता है।
दो कतारें: एक iPhone के लिए और दूसरी खाद के लिए—सिर्फ़ वर्तमान की तस्वीर नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी भी हैं।
- उपभोक्तावाद और तकनीकी महत्वाकांक्षा बिना नीति सुधार और ग्रामीण विकास के अधूरी हैं।
- कृषि, जल, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश के बिना तकनीक केवल शहरी आनंद तक सीमित रह जाएगी।
भारत तभी संतुलित होगा जब “दो भारतों” की खाई को पाट कर एक साझा विकास की कतार खड़ी की जाएगी। तभी शहर और गाँव दोनों का भारत प्रगतिशील, टिकाऊ और समृद्ध बन सकेगा।