अमेरिकी टैरिफ और भारत का कपड़ा निर्यात

अनीस आर खान, नई दिल्ली।

भारत का कपड़ा उद्योग, जिसे अक्सर देश की “आर्थिक रीढ़” कहा जाता है, आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ हर धागा वैश्विक राजनीति और व्यापारिक टकराव में उलझा हुआ है। यह उद्योग केवल विदेशी मुद्रा कमाने का साधन नहीं है, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका का आधार भी है।

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाने की घोषणा ने इस उद्योग को गहरी चिंता में डाल दिया है। यह निर्णय केवल निर्यात आंकड़ों को नहीं हिला रहा, बल्कि उन बुनकरों, सिलाई करने वाली महिलाओं और छोटे व्यापारियों की ज़िंदगियों पर भी असर डाल रहा है, जो रोज़मर्रा की रोटी इसी उद्योग से कमाते हैं।

अमेरिकी सुई से चुभा भारत का कपड़ा

भारत का कपड़ा निर्यात 2023-24 में 45 अरब डॉलर से अधिक रहा। इसमें से लगभग 30% यानी हर तीसरा निर्यातित परिधान अकेले अमेरिका गया। पर अब टैरिफ की तलवार लटकने के बाद यह पूरा समीकरण बदल सकता है।

गुरुग्राम के एक छोटे निर्यातक राजीव अरोड़ा कहते हैं। कि “हमारी सबसे बड़ी मार्केट अमेरिका है। 50% टैरिफ के बाद, तो भारतीय परिधान वहाँ महंगे हो जाएंगे। अमेरिकी खरीदार बांग्लादेश और वियतनाम जैसे विकल्पों की ओर देखेंगे। हमें बड़े ऑर्डर गंवाने पड़ सकते हैं।”

उनकी यह आशंका निराधार नहीं है। पहले भी अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के दौरान देखा गया कि कैसे ऑर्डर एक देश से खिसककर दूसरे के पास पहुँच गए। अब भारत के लिए वही खतरा मंडरा रहा है।

करघे से लेकर अनिश्चितता तक बुनकर की दास्तान

राजस्थान के बीकानेर ज़िले के मोहम्मद हाशिम अपने छोटे करघे पर सूती दुपट्टे और कपड़े बुनते हैं। उनके हाथों की मेहनत अक्सर दिल्ली और जयपुर के निर्यातकों के ज़रिए अमेरिकी बाज़ारों तक जाती है।

“हमें नहीं पता कि हमारे बनाए कपड़े वहाँ कौन पहनता है। बस इतना जानते हैं कि हर सीज़न नए ऑर्डर आते थे और हमारी रोज़ी-रोटी चलती थी। अब व्यापारी कह रहे हैं कि ऑर्डर कम हो सकते हैं। अगर काम नहीं मिला, तो हमें खेतों में मज़दूरी करनी पड़ेगी।”

उनकी पत्नी फातिमा चिंता भरे स्वर में जोड़ती हैं। “हमने बच्चों की पढ़ाई इसी काम से शुरू की थी। अगर धंधा मंदा पड़ा तो उनकी पढ़ाई अधूरी रह जाएगी।”

यह कहानी केवल हाशिम और फातिमा की नहीं है, बल्कि हज़ारों-लाखों बुनकर परिवारों की है जो कपड़े की डोर से बंधे हुए हैं।

फैक्ट्री की महिलाओं की चिंता

नोएडा की एक गारमेंट फैक्ट्री में 28 वर्षीय पूजा देवी रोज़ाना 10 घंटे मशीन पर सिलाई करती हैं। उनकी बनाई शर्ट्स और पैंट्स सीधे अमेरिका निर्यात होती हैं।

“हमें रोज़ 350 रुपये मिलते हैं। बच्चों का स्कूल, किराया और राशन सब इसी पर निर्भर है। मैनेजर ने कहा है कि अगर ऑर्डर कम हुए तो ओवरटाइम बंद करना पड़ेगा। इसका मतलब है कि महीने की कमाई आधी हो जाएगी।”

पूजा जैसी महिलाएँ, जो लाखों की संख्या में इस उद्योग की रीढ़ बनी हुई हैं, आज असुरक्षा में जी रही हैं। उनके लिए अमेरिकी टैरिफ केवल आंकड़ों का मामला नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल है।

नई रणनीति की तलाश

सरकार ने इस संकट को अवसर में बदलने के कवायद शुरू की है। वाणिज्य मंत्रालय ने 40 देशों में “आउटरीच प्रोग्राम” शुरू किया है। उद्देश्य साफ है कि भारतीय निर्यातकों के लिए नए बाज़ार तलाशना और अमेरिका पर निर्भरता कम करना।

अब फोकस दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया जैसे गैर-पारंपरिक बाज़ारों पर है। कपड़ा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं। कि “हमारी रणनीति विविधीकरण की है। अमेरिकी टैरिफ ने हमें मजबूर किया है कि हम अपनी निर्यात नीति पर नए सिरे से सोचें। गैर-पारंपरिक बाज़ार ही भविष्य की कुंजी हैं।”

इसके तहत व्यापार मेलों, खरीदार-विक्रेता बैठकों और भारतीय वस्त्रों की विशेष प्रदर्शनियों का आयोजन किया जा रहा है।

बांग्लादेश की रफ़्तार और भारत की चुनौतियाँ

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती पड़ोसी बांग्लादेश है। बांग्लादेश को यूरोपीय संघ (EU) में ड्यूटी-फ्री एक्सेस का फायदा मिलता है। वहीं, वियतनाम ने अमेरिका और यूरोप के साथ कई मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हुए हैं।

इसके मुकाबले भारत की स्थिति कठिन है। बिजली, लॉजिस्टिक्स और कच्चे माल की लागत यहाँ अधिक है। यही कारण है कि कई बार भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धी नहीं रह पाते।

उद्योग के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को इस अंतर को पाटने के लिए तकनीकी उन्नयन और लागत कम करने की दिशा में गंभीर कदम उठाने होंगे।

योजनाओं और निवेश की ज़रूरत

भारत सरकार ने हाल के वर्षों में कई योजनाएँ शुरू की हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना। इसके तहत कपड़ा उद्योग को तकनीकी उन्नयन और आधुनिक मशीनरी में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इसके अलावा मेगा टेक्सटाइल पार्क्स की भी घोषणा की गई है, जहाँ एक ही जगह धागे से लेकर रेडीमेड कपड़ों तक की पूरी वैल्यू चेन विकसित की जाएगी। इसका मकसद उत्पादन लागत घटाना और वैश्विक खरीदारों को “वन-स्टॉप डेस्टिनेशन” उपलब्ध कराना है।

नवाचार ही असली रास्ता

गारमेंट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के अध्यक्ष का कहना है कि
“हमें नए बाज़ारों में पकड़ बनानी ही होगी। अमेरिका की अनिश्चितता लंबे समय तक हमें रोक नहीं सकती।”

हालांकि, उद्योग विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि केवल बाज़ार बदलने से समस्या हल नहीं होगी।
“भारत को नवाचार और तकनीकी सुधार पर ज़ोर देना होगा। केवल कच्चे माल और बेसिक गारमेंट्स नहीं, बल्कि उच्च मूल्य वाले फैशन प्रोडक्ट्स और तकनीकी वस्त्र ही हमें वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ले जा सकते हैं।”

तकनीकी वस्त्र (Technical Textiles) जैसे मेडिकल फैब्रिक, ऑटोमोबाइल सीट कवर और स्पोर्ट्स गियर का वैश्विक बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है। भारत के लिए यह नया क्षेत्र बड़ा अवसर साबित हो सकता है।

चीन पर निर्भरता

भारत अक्सर अमेरिका और यूरोप के लिए वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता के रूप में देखा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि भारत का कपड़ा उद्योग कई मामलों में चीन पर निर्भर है। चाहे सिंथेटिक धागा हो या डाई और केमिकल्स। काफी कुछ चीन से आता है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत को अगर सचमुच वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है, तो कच्चे माल में आत्मनिर्भरता ज़रूरी होगी। “मेक इन इंडिया” के साथ-साथ “स्पिन इन इंडिया” और “वीव इन इंडिया” जैसी अवधारणाओं पर भी ज़ोर देना होगा।

ई-कॉमर्स और डिज़िटल निर्यात

आज के दौर में निर्यात केवल पारंपरिक खरीदारों तक सीमित नहीं है। अमेज़न, फ्लिपकार्ट, मिंत्रा जैसी ई-कॉमर्स कंपनियाँ भी भारतीय परिधानों को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचा रही हैं।

दिल्ली के एक युवा उद्यमी अदिति गुप्ता बताती हैं कि “हमने हैंडलूम साड़ियाँ और स्कार्फ सीधे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से अमेरिका और यूरोप भेजे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म छोटे उद्यमियों के लिए नए अवसर खोल रहे हैं।”

इस क्षेत्र में और नीतिगत समर्थन मिलने पर भारत के छोटे और मझोले निर्यातकों को बड़ा सहारा मिल सकता है।

टिकाऊ फैशन, भविष्य की माँग

वैश्विक स्तर पर टिकाऊ (Sustainable) फैशन की माँग लगातार बढ़ रही है। पर्यावरण के अनुकूल कपड़े, ऑर्गेनिक कॉटन और रिसाइकल्ड फैब्रिक पर खरीदार ज़ोर दे रहे हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकता है, क्योंकि यहाँ पहले से ही ऑर्गेनिक कॉटन और प्राकृतिक रंगों की परंपरा मौजूद है।

धागों के इस युद्ध में भारत कहाँ खड़ा होगा?

भारत का कपड़ा उद्योग आज सचमुच एक दोराहे पर है। एक ओर अमेरिकी टैरिफ जैसी चुनौती है, तो दूसरी ओर नए बाज़ार, नवाचार और टिकाऊ फैशन जैसे अवसर भी मौजूद हैं।

सवाल यही है। कि क्या भारत आने वाले वर्षों में केवल “आपूर्तिकर्ता” बनकर रह जाएगा या “वैश्विक नेता” के रूप में उभरेगा?

यह निर्णय केवल सरकारी नीतियों या उद्योगपतियों की रणनीति पर नहीं, बल्कि उन हाशिम जैसे बुनकरों और पूजा जैसी महिला मज़दूरों के भविष्य पर भी टिका हुआ है।

करघों से लेकर फैक्ट्रियों तक, हर धागा अब वैश्विक राजनीति, बाज़ार की प्रतिस्पर्धा और नवाचार की कसौटी पर है। अगर भारत सही दिशा में कदम बढ़ाता है, तो यह उद्योग न केवल करोड़ों लोगों की आजीविका बचाएगा, बल्कि “ब्रांड इंडिया” को विश्व के कपड़ा मानचित्र पर पहले से कहीं अधिक मज़बूत बनाएगा।