भारत के मुख्य न्यायाधीश का ‘बुलडोज़र न्याय’ के ख़िलाफ़ रुख़।

उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र का डर, राजनीति और संविधान की लड़ाई।

लहर डेस्क

“हमारा घर तोड़ दिया, लेकिन हमें कभी बताया ही नहीं कि हमारा अपराध क्या था…” प्रयागराज की आफरीन फ़ातिमा का यह कथन न केवल उनके परिवार की कहानी है, बल्कि उन हजारों नागरिकों की ज़ुबानी है, जिनके घर और जीवन ‘बुलडोज़र न्याय’ के नाम पर पल भर में मलबे में तब्दील हो गए।

बुलडोज़र: प्रशासन का उपकरण या राजनीति का प्रतीक?

उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र अब सिर्फ मशीन नहीं है। यह राज्य की सख़्ती, डर और राजनीति का प्रतीक बन चुका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि इससे जुड़ी, रैलियों में इसके चित्र और “बुलडोज़र बाबा” के स्लोगन इसे एक ब्रांड बना चुके हैं।

लेकिन सवाल यही है कि क्या यह कानून का पालन है, या प्रतिशोध का शासन?

CJI का स्पष्ट रुख़: ‘Rule of Law’ बनाम ‘Rule of Bulldozer’

‘बुलडोज़र न्याय’ — यानी बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए संपत्ति या घर तोड़ना — के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख़ अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने कहा कि “हमारा देश Rule of Law से चलता है, न कि Rule of Bulldozer से।”

एक प्रमुख निर्णय में न्यायमूर्ति गवई ने स्पष्ट किया कि कार्यपालिका एक साथ “जज, ज्यूरी और जल्लाद” नहीं बन सकती। यह आचरण शासन की शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन है।

न्यायपालिका ने जो प्रमुख आपत्तियाँ उठाई हैं, वे हैं:

  • न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन: संपत्ति को बिना नोटिस, सुनवाई या अदालत की प्रक्रिया के तोड़ना अनुच्छेद 300A और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है।
  • मौलिक अधिकारों का हनन: यह पूरे परिवार पर प्रभाव डालता है, जो प्रायः अभियुक्त नहीं होते, और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।
  • मनमानी कार्रवाई: केवल कुछ व्यक्तियों की संपत्ति को निशाना बनाना, जबकि अन्य अवैध संरचनाएँ जस की तस रहती हैं, यह कानून का पालन नहीं बल्कि चयनात्मक सज़ा है।

मनमानी को रोकने का प्रयास।

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे भारत में कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिन्हें राज्य और नगर निकायों को पालन करना अनिवार्य है।

मुख्य निर्देश:

  • अनिवार्य नोटिस: संपत्ति मालिक/निवासी को 15-60 दिन का कारण बताओ नोटिस देना अनिवार्य है।
  • उल्लंघन का स्पष्ट विवरण: नोटिस में केवल अपराध के आरोप का उपयोग नहीं, बल्कि वास्तविक उल्लंघन (जैसे अवैध निर्माण) स्पष्ट होना चाहिए।
  • अंतिम उपाय: तोड़फोड़ केवल अंतिम विकल्प हो, जब मिलान/आंशिक समाधान संभव न हो।
  • जवाबदेही: मनमानी कार्रवाई करने वाले अधिकारी व्यक्तिगत रूप से न्यायालय की अवमानना के दोषी ठहराए जा सकते हैं और मुआवज़ा या पुनर्स्थापन का दायित्व होगा।

डर और नागरिकता पर असर।

प्रयागराज, कानपुर, बहराइच और सहारनपुर की घटनाएँ बताती हैं कि बुलडोज़र कार्रवाई का असर केवल भवनों पर नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है

  • प्रयागराज: जावेद मोहम्मद के घर को बिना नोटिस तोड़ दिया गया। बेटियों ने कहा, “यह अदालत से नहीं, सरकार से सज़ा है।”
  • कानपुर: हिंसा के बाद कई घरों को गिरा दिया गया; लोग शिकायत करते हैं कि किसी ने कानूनी प्रक्रिया दिखाई ही नहीं।
  • सहारनपुर: दुकानदारों की मेहनत से बनी दुकानें मलबे में बदल गई।
  • बहराइच: परिवारों ने बताया कि उनके बच्चे उस दिन बाहर थे, लेकिन घरों पर बुलडोज़र चला।

इस तरह के मामलों ने पूरे समुदाय में डर और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है।

राजनीतिक ब्रांडिंग और डर का मिश्रण।

योगी सरकार ने बुलडोज़र को कठोर प्रशासन और अपराध निवारण का प्रतीक बना दिया है।
चुनावी रैलियों, पोस्टरों और सोशल मीडिया पोस्ट में इसे एक शक्तिशाली संदेश के रूप में पेश किया गया है।

लेकिन आलोचक कहते हैं कि “असली मकसद अपराध निवारण नहीं, कमजोर नागरिकों पर नियंत्रण और डर का माहौल बनाना है।”

मीडिया की भूमिका और सवाल।

मुख्यधारा मीडिया ने इसे अक्सर “कानून की कार्रवाई” के रूप में दिखाया।
लेकिन सवाल उठते हैं:

  • क्या हर व्यक्ति वास्तव में दोषी था?
  • क्या अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था?
  • क्या पूरे परिवार को सज़ा देना न्याय संगत है?

लहर ब्लॉग इस सवाल को प्रमुखता से उठाता है कि जब ताकत और मशीन कानून की जगह लें, तो जनता किसके पास न्याय के लिए जाएगी?

संविधान और लोकतंत्र का संदेश।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कानून का पालन अनिवार्य है। प्रशासन को कभी भी प्रतिशोध या चयनात्मक सज़ा का औज़ार नहीं बनना चाहिए। CJI बी.आर. गवई ने कहा कि

“राज्य को न्याय करने का अधिकार नहीं, प्रक्रिया का पालन करने की ज़िम्मेदारी है।”

उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र केवल मकानों को नहीं गिराता, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर भी सवाल उठाता है।
यह याद रखना ज़रूरी है कि लोकतंत्र डर से नहीं, न्याय और संविधान से चलता है।