“सनातन का अपमान नहीं सहेंगे” जब सुप्रीम कोर्ट में गूंजा आक्रोश और जूता

लहर डेस्क / 7 अक्टूबर 2025
वह सुबह जब अदालत थम गई।
6 अक्टूबर 2025 की सुबह सुप्रीम कोर्ट की कोर्ट नंबर 1 में सब कुछ सामान्य था। वकील केस लिस्ट देख रहे थे, न्यायमूर्ति अपनी बेंच पर बैठे थे, और मामूली फुसफुसाहटों के बीच “mentioning of cases” शुरू था।
लेकिन अचानक — एक जूता हवा में लहराया।
71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर, दिल्ली बार काउंसिल में पंजीकृत, अपनी सीट से उठे और चिल्लाते हुए बोले कि “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे!”
उन्होंने अपनी जूता उतारा और सीधा मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की ओर फेंकने की कोशिश की।
सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत हस्तक्षेप किया — और कोर्टरूम में एक क्षण के लिए ऐसा सन्नाटा छा गया जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
एक अधिवक्ता ने बाद में कहा कि “सब कुछ इतना अचानक हुआ कि कोई समझ ही नहीं पाया। यह सुप्रीम कोर्ट था, कोई राजनीतिक मंच नहीं।”
वकील की आवाज़ “मैं पछतावा नहीं करता”

राकेश किशोर को उसी समय हिरासत में ले लिया गया। लेकिन कुछ ही घंटों में उनका वीडियो और बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
वे न तो घबराए हुए दिखे, न ही शर्मिंदा। उल्टा उन्होंने कहा कि “मैं पछतावा नहीं करता। मैंने यह देश, धर्म और न्याय की भावना के लिए किया।” उन्होंने आगे कहा — कि “जब सीजेआई ने कहा कि ‘जाओ, भगवान से कहो कि कुछ करें’, तो वह बात मेरे दिल में तीर की तरह लगी। अगर कोई भगवान विष्णु की मूर्ति की बहाली के लिए याचिका देता है, तो यह उसका विश्वास है, मज़ाक नहीं।”
उनके अनुसार यह कदम उन्होंने “धर्म के अपमान” के विरोध में उठाया।
वे कहते हैं कि “मेरा कोई संगठन नहीं है, कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है। मैं बस एक नागरिक हूँ जिसे महसूस हुआ कि अदालत भी पक्षपाती हो सकती है।”
उनकी इस टिप्पणी ने सोशल मीडिया में नई बहस छेड़ दी —
क्या धार्मिक आहत भावनाएँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ऊपर जा सकती हैं?
मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया, “इसे नज़रअंदाज़ करें”

इस हंगामे के बीच, सीजेआई गवई ने अद्भुत संयम दिखाया।
उन्होंने कोर्ट स्टाफ से कहा —कि “इसे नज़रअंदाज़ करें। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। सुनवाई जारी रखें।”
बाद में उन्होंने मीडिया से कहा कि उन्हें जूता “छू भी नहीं पाया”। “मैंने केवल आवाज सुनी। कुछ मेरे पास नहीं पहुंचा। शायद वह बीच में गिर गया।”
और उन्होंने यह निर्णय लिया कि राकेश किशोर के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जाएगा।
उनके इस निर्णय ने अदालत की गरिमा को बचाया — लेकिन साथ ही इस पर भी बहस शुरू हुई कि क्या “शांत रहना” ही पर्याप्त जवाब था?
बार काउंसिल और कानूनी कार्रवाई।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने त्वरित कार्रवाई करते हुए राकेश किशोर का लाइसेंस निलंबित कर दिया।
BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने बयान जारी किया। कि “उनका आचरण न्यायालय की गरिमा के विपरीत है। उन्हें तत्काल प्रभाव से वकालत से निलंबित किया जाता है।”
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने इसे “न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला” कहा और कहा कि “वकील समाज का सबसे शिक्षित वर्ग है। अगर वे भी हिंसा का रास्ता चुनेंगे, तो जनता को क्या संदेश जाएगा?”
खजुराहो विवाद की चिंगारी।

दरअसल, राकेश किशोर की यह प्रतिक्रिया खजुराहो मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की टूटी मूर्ति की पुनर्स्थापना पर दायर एक जनहित याचिका से जुड़ी थी।
उस याचिका को खारिज करते हुए CJI गवई ने टिप्पणी की थी — कि “अगर आप इतने बड़े भक्त हैं तो भगवान से कहिए, वे खुद कुछ कर देंगे।”
यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना का विषय बनी।
बहुतों ने कहा कि न्यायपालिका को धार्मिक मामलों पर “संवेदनशील” भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
किशोर के अनुसार — “वह वाक्य मेरे लिए अपमान था। न्यायाधीश धर्म का मज़ाक नहीं उड़ा सकते।”
उनकी यह भावना आक्रोश में बदली — और वह सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गए।
देशभर में प्रतिक्रिया की बाढ़।
यह खबर सोशल मीडिया पर मिनटों में फैल गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया — “यह हर भारतीय को आहत करने वाला कृत्य है। यह केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि देश की न्याय प्रणाली पर हमला है।”
विपक्षी नेताओं ने भी इस पर निंदा की, लेकिन कई ने यह भी कहा कि धार्मिक आहत भावनाओं को संवेदनशीलता से संभालना चाहिए।
केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने टिप्पणी की —कि “यह सांप्रदायिक उन्माद का नतीजा है, जिसकी जड़ें सोशल मीडिया की ज़हरीली राजनीति में हैं।”
सोशल मीडिया और जनता की राय।
ट्विटर (अब X) पर #CJI #SanatanDharma और #SupremeCourt जैसे हैशटैग घंटों ट्रेंड करते रहे।
कुछ लोगों ने कहा — “जूता नहीं, यह निराशा थी।”
दूसरों ने लिखा — “अगर वकील भी कानून तोड़ें, तो फिर आम आदमी से क्या उम्मीद?”
फेसबुक पर कई पोस्ट्स में “Sanatan ka Apmaan” शीर्षक से बहस छिड़ी रही।
एक उपयोगकर्ता ने लिखा — कि “वो जूता नहीं, बल्कि मौन न्यायपालिका पर फेंका गया प्रश्न था।”
जूता विरोध की परंपरा।
यह पहली बार नहीं जब भारत में “जूता फेंकना” विरोध का प्रतीक बना।
2009 में पत्रकार जरनैल सिंह ने गृह मंत्री पी. चिदंबरम पर जूता फेंका था।
फिर नरेंद्र मोदी, ओम प्रकाश चौटाला, और अन्य नेताओं पर भी ऐसे प्रयास हुए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने का प्रयास — यह पहली और अभूतपूर्व घटना थी।
कानूनी विशेषज्ञों ने इसे “Judicial Contempt” का स्पष्ट मामला बताया।
न्यायपालिका बनाम भावनाएँ।

यह घटना सिर्फ एक असंतोष की चीख नहीं थी, बल्कि एक गहरी चेतावनी थी —
कि समाज का एक वर्ग न्यायिक निर्णयों को “अपमान” की तरह देखने लगा है।
क्या अदालतें धार्मिक मामलों में और सावधान भाषा अपनाएं?
क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अदालत की मर्यादा से ऊपर हो सकती है?
क्या सोशल मीडिया के दौर में हर टिप्पणी विकृत होकर “धर्म बनाम न्याय” का युद्ध बन जाएगी?
ये प्रश्न अब केवल अदालतों के नहीं, बल्कि पूरे समाज के हैं।
लहर की नज़र से तीन परतों वाला सच।
- भावनात्मक परत:
यह घटना बताती है कि धर्म और न्याय के बीच संवाद कितना नाजुक है।
एक शब्द, एक टिप्पणी — और पूरा विमर्श विस्फोटक हो सकता है। - संस्थागत परत:
सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था की सुरक्षा और मर्यादा पर गंभीर सवाल उठे हैं।
क्या एक वरिष्ठ वकील इतनी आसानी से कोर्ट हॉल में जूता उठा सकता है?
यह सुरक्षा नहीं, बल्कि विश्वास की विफलता का संकेत है। - लोकतांत्रिक परत:
लोकतंत्र असहमति की अनुमति देता है, हिंसा की नहीं।
जूता फेंकने से न तो धर्म की रक्षा होती है, न न्याय की।
असहमति संवाद से मजबूत होती है, उग्रता से नहीं।
यह सिर्फ जूता नहीं था।
राकेश किशोर का जूता अदालत तक नहीं पहुंचा, लेकिन उसने हमारी न्यायिक चेतना को जरूर झकझोर दिया।
सीजेआई गवई का संयम याद दिलाता है कि ताकत शांति में है।
और राकेश का आक्रोश यह दिखाता है कि समाज के भीतर असंतोष किस तरह उबल रहा है।
यह घटना आने वाले समय में बार-बार उद्धृत की जाएगी —
एक न्याय और धर्म की टकराहट की कहानी के रूप में।
न्याय की गरिमा और आस्था का संतुलन आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है।
जब शब्दों का ताप बढ़े, तो कानून और संवेदना — दोनों ठंडे दिमाग से सोचें।