आरएसएस के 100 साल और सत्ता का संगम

सिक्के-डाक टिकट से लेकर सत्ता की वैचारिक पकड़ तक
लहर डेस्क
2025 का साल भारतीय राजनीति और समाज के लिए एक खास मुकाम लेकर आया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस वर्ष अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। लेकिन यह महज एक संगठन का “जन्मदिन” नहीं है, बल्कि उस वैचारिक और राजनीतिक परियोजना का उत्सव है जिसने बीते सौ वर्षों में धीरे-धीरे भारतीय लोकतंत्र के ढांचे को अपने हिसाब से गढ़ा है।
आरएसएस खुद को सांस्कृतिक संस्था कहता है, मगर आलोचकों का आरोप है कि यह भारतीय राजनीति की असली धुरी है—एक ऐसा संगठन जो सत्ता के गलियारों पर नियंत्रण रखता है, लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रभावित करता है और भारत की धर्मनिरपेक्षता को चुनौती देता है।
इतिहास के आईने में संघ।

स्वतंत्रता संग्राम से दूरी
आरएसएस की स्थापना 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। घोषित उद्देश्य था—हिंदू समाज का संगठन। लेकिन जब पूरा देश आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था, तब संघ की भूमिका पर सवाल उठते रहे।
- 1942 के “भारत छोड़ो आंदोलन” में जब लाखों लोग जेल गए, शहीद हुए, तब संघ ने खुद को संगठनात्मक कार्यों तक सीमित रखा।
- गांधीजी की हत्या (1948) के बाद लगे प्रतिबंध ने यह स्पष्ट कर दिया कि संघ को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान तक में गहरी शंका थी।
संविधान से असहमति
संघ के दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर की किताब “बंच ऑफ थॉट्स” में धर्मनिरपेक्ष संविधान को “विदेशी विचार” कहकर खारिज किया गया। गोलवलकर ने मनुस्मृति को आदर्श कानून बताने तक की बात कही। यह वैचारिक असहमति आज भी संघ की राजनीति का मूल है।
प्रतिबंध और विवाद
आरएसएस पर तीन बड़े प्रतिबंध लगे:
- 1948 – गांधी हत्या के बाद।
- 1975 – इमरजेंसी के दौरान।
- 1992 – बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद।
हर बार यह सवाल उभरा कि क्या संघ का काम “सांस्कृतिक” है या राजनीतिक-सांप्रदायिक?
सत्ता के साथ सहजीवी रिश्ता।

प्रचारक से प्रधानमंत्री तक
आज की भाजपा का शीर्ष नेतृत्व—नरेंद्र मोदी, अमित शाह और दर्जनों मंत्री—संघ की “प्रचारक फैक्ट्री” से निकले हैं। यह रिश्ता सिर्फ वैचारिक नहीं, बल्कि संगठनात्मक और व्यक्तिगत निष्ठा से जुड़ा हुआ है।
नीति और पाठ्यपुस्तक
- शिक्षा: नई शिक्षा नीति (NEP) और पाठ्यपुस्तकों में बदलाव संघ की “भारतीय दृष्टिकोण” थोपने की परियोजना का हिस्सा है। इतिहास से मुगल काल और आलोचनात्मक प्रसंगों को हटाने पर विवाद गहरा है।
- अर्थव्यवस्था: भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच सरकार पर बार-बार दबाव बनाते रहे हैं, कभी समर्थन में, कभी विरोध में।
हिंदुत्व एजेंडे की सरकारी अमलदारी
- राम मंदिर: दशकों की मुहिम का कानूनी और राजनीतिक नतीजा मोदी सरकार ने मूर्त रूप दिया।
- अनुच्छेद 370: जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करना संघ की पुरानी माँग थी।
- समान नागरिक संहिता: सरकार इसका मसौदा लाने की तैयारी कर रही है, जिसे अल्पसंख्यक समुदाय अपनी पहचान पर हमला मानते हैं।
सत्ता की मुहर: सिक्का और डाक टिकट।

शताब्दी वर्ष पर मोदी सरकार ने आरएसएस की स्मृति में विशेष सिक्का और डाक टिकट जारी किया।
- सिक्का जारी करना केवल “सम्मान” नहीं बल्कि इतिहास की पुनर्लेखन की कोशिश है। संघ जिसने स्वतंत्रता संग्राम से दूरी बनाई, उसे अब “राष्ट्र निर्माता” की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।
- डाक टिकट, जो अब तक स्वतंत्रता सेनानियों, समाज सुधारकों और राष्ट्रीय धरोहरों को समर्पित होता था, अब एक वैचारिक संगठन को समर्पित कर दिया गया है। यह कदम आलोचकों के मुताबिक संघ और सत्ता के बीच के गठजोड़ का खुला ऐलान है—जैसे राज्य और संगठन अब अलग नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
लोकतंत्र पर असर और आलोचना।
असहमति = देशद्रोह
संघ-प्रभावित राजनीतिक माहौल में असहमति को “राष्ट्र विरोध” से जोड़ दिया जाता है।
- पत्रकारों पर मुकदमे
- छात्रों और कार्यकर्ताओं पर “देशद्रोह” के आरोप
- न्यायपालिका और मीडिया पर दबाव
यह सब एक ऐसी संस्कृति गढ़ता है जहाँ आलोचना और स्वतंत्र सोच का गला घोंटा जा रहा है।
सामाजिक ढांचा
संघ “हिंदू एकता” की बात करता है, लेकिन उसका ढांचा अब भी जाति और पितृसत्ता से बंधा दिखता है।
- महिला शाखा “राष्ट्र सेविका समिति” अलग संचालित होती है।
- नेतृत्व अब भी मुख्यतः उच्च जातियों के पास है।
सौ साल का आलोचनात्मक आकलन।
| पहलू | आलोचना | उदाहरण |
|---|---|---|
| धर्मनिरपेक्षता | “हिंदू राष्ट्र” की अवधारणा संविधान-विरोधी | CAA, UCC |
| पारदर्शिता | संगठन की वित्तीय/आंतरिक जानकारी सार्वजनिक नहीं | “सांस्कृतिक संस्था” का दावा |
| सामाजिक न्याय | जाति-पितृसत्ता पर ढीला रुख | महिला शाखा अलग, दलित-आदिवासियों पर संघ का “समावेशीकरण” |
लोकतंत्र के सामने चुनौती।
आरएसएस का शताब्दी वर्ष उस “दीर्घकालिक परियोजना” की परिणति है जिसमें एक गैर-राजनीतिक संस्था ने राजनीतिक सत्ता पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। सिक्का और डाक टिकट केवल प्रतीक नहीं, बल्कि इस गठजोड़ के “राजकीय प्रमाणपत्र” हैं।
सवाल यह है—क्या भारत का संविधान, उसका बहुलवाद और लोकतांत्रिक ढांचा इस संग ठित वैचारिक आक्रमण के सामने टिक पाएगा? या फिर 100 साल पुराने “हिंदू राष्ट्र” के सपने के सामने भारतीय गणराज्य की आत्मा कमजोर पड़ जाएगी???