एक और माँ की मौत या सिस्टम की बे‍हिसी

इजाज-उल-हक़ बुख़ारी, जम्मू

पुंछ — एक सरहदी इलाक़ा जो सालों से संसाधनों की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं की खामियों और प्रशासनिक लापरवाही का शिकार रहा है। यहाँ का सबसे बड़ा अस्पताल राजा सुखदेव सिंह ज़िला अस्पताल अब स्वास्थ्य तंत्र की कमज़ोरियों और बदहाली की एक बड़ी तस्वीर बन चुका है। मगर इस बार यहाँ गूंजने वाली चीखें सिर्फ भौगोलिक कठिनाइयों या गरीबी की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी की हैं।

हाल ही में हुए एक दर्दनाक हादसे में एक युवा माँ की ज़िला अस्पताल में प्रसव के दौरान कथित लापरवाही और रिश्वतखोरी की वजह से मौत हो गई। मृतका के परिजनों और स्थानीय समाज का कहना है कि इलाज के बदले में पैसे मांगे गए, इलाज में देरी की गई और जब स्थिति गंभीर हो गई, तब सिर्फ़ वादे रह गए।

यह त्रासदी सिर्फ़ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र का आईना है जो बरसों से ऐसे ही हादसों की फ़ाइलें बंद करता आया है।

यह पहला मौका नहीं है। इसी साल जून में इसी अस्पताल में दो और महिलाओं की मौत लगभग इसी तरह की परिस्थितियों में हुई थी। हर बार जांच के वादे हुए, लेकिन कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई, न ही समस्याओं की जड़ पर कार्रवाई की गई।

प्रभावित परिवारों और नागरिक संगठनों की लगातार मांग है कि —

  • जांच पारदर्शी तरीके से की जाए,
  • रिपोर्टें सार्वजनिक हों,
  • और लापरवाही रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

ज़िला अस्पताल राजा सुखदेव सिंह में डॉक्टरों की भारी कमी है।
पाकिस्तान सीमा से सटे और दूरदराज़ क्षेत्र होने के कारण यहाँ वरिष्ठ डॉक्टरों की पोस्टिंग बहुत कम होती है।
कम वेतन, सुविधाओं की कमी और करियर ग्रोथ की कमी के चलते डॉक्टर ज़्यादातर बेहतर जिलों की ओर चले जाते हैं।

वेंटिलेटर जैसे आधुनिक उपकरण मौजूद तो हैं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है।
कई वेंटिलेटर लंबे समय से ख़राब या निष्क्रिय हैं क्योंकि तकनीकी विशेषज्ञों की नियमित उपलब्धता नहीं है।

भारत में मातृ मृत्यु की चिंताजनक स्थिति।

पुंछ जैसे इलाकों में ये हादसे उस व्यापक राष्ट्रीय संकट से जुड़े हैं जो प्रसव के दौरान मातृ मृत्यु के रूप में हर दिन कई घरों को तबाह कर रहा है।

ताज़ा सरकारी और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार —

  • 2023 में भारत में लगभग 22,500 महिलाएं प्रसव या गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं में जान गंवा बैठीं।
  • मातृ मृत्यु दर (MMR) अब भी 88 प्रति एक लाख जीवित जन्म है।
  • हर दिन लगभग 52 महिलाएं गर्भ या प्रसव से संबंधित कारणों से मरती हैं।
  • दक्षिणी राज्यों (जैसे केरल) में यह दर 30 प्रति लाख तक कम है, लेकिन उत्तर और मध्य भारत में कई गुना अधिक।
  • सबसे ज़्यादा मौतें रक्तस्राव, संक्रमण, हाई ब्लड प्रेशर और समय पर उचित इलाज न मिलने के कारण होती हैं।

सरकार ने 2030 तक इस दर को 70 प्रति लाख से नीचे लाने का लक्ष्य रखा है।
पिछले दो दशकों में इस दर में गिरावट तो आई है —
1990 में 570 प्रति लाख से अब 88–97 प्रति लाख तक —
लेकिन ग्रामीण और सीमावर्ती ज़िलों, जैसे पुंछ, में हालात अब भी बेहद चिंताजनक हैं।

कानून और जवाबदेही।

भारतीय दंड संहिता और स्वास्थ्य अधिनियम के तहत,
अगर चिकित्सकीय लापरवाही या रिश्वत साबित होती है,
तो 2 से 5 साल की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है।

मरीज़ या परिवार को मुआवज़ा और अदालत में कार्रवाई का अधिकार भी प्राप्त है।
लोक अदालतें भी स्वास्थ्य संस्थानों को ‘लोक उपयोगी सेवा (Public Utility Service)’ मानकर कार्रवाई कर सकती हैं।

मगर व्यवहार में ज़्यादातर जांचें और रिपोर्टें सालों तक दबाई जाती हैं,
और पीड़ित परिवार न्याय से वंचित रह जाते हैं।

जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सवाल।

  • ज़िला स्वास्थ्य प्रशासन पुंछ के पास डॉक्टरों की कमी दूर करने की क्या योजना है?
  • अस्पताल में मौजूद वेंटिलेटर कब सक्रिय होंगे और क्या तकनीकी स्टाफ उपलब्ध कराया जाएगा?
  • ज़च्चगी वार्ड की निगरानी और ऑडिट किस प्रणाली से होंगे?
  • रिश्वतखोरी और लापरवाही की शिकायतों पर अब तक कितने मुकदमे या कार्रवाई हुई है?

हवेली, सुरनकोट, मंडी और मेंढर के विधानसभा सदस्यों — जिनमें कई मंत्री भी हैं — से यह उम्मीद की जाती है कि वे इस मुद्दे को विधानसभा में मजबूती से उठाएँगे और राजा सुखदेव सिंह अस्पताल सहित पूरे ज़िला स्वास्थ्य तंत्र में सुधार के लिए बजट और नीतिगत कदमों की सिफारिश करेंगे।

स्वास्थ्य मंत्री से अपील।

  • पुंछ ज़िला अस्पताल में डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की तुरंत नियुक्ति की जाए।
  • सभी जांच रिपोर्टें सार्वजनिक की जाएं।
  • प्रभावित परिवारों को कानूनी और मानसिक सहायता दी जाए।
  • एंटी-करप्शन सेल सक्रिय किया जाए।
  • अस्पतालों की नियमित निगरानी और स्टाफ मूल्यांकन का पारदर्शी सिस्टम बनाया जाए।

फ़र्ज़ाना अंजुम और अन्य प्रभावित महिलाओं की यह त्रासदी तब ही मायने रखेगी जब इस तंत्र में न्यायिक और सामाजिक जवाबदेही की नींव डाली जाएगी।

सवाल यही है
क्या इस बार भी फ़ाइलें बंद हो जाएँगी,
या यह हादसा बदलाव की शुरुआत बनेगा?