अल्पसंख्यकों का सामाजिक उत्थान, योजनाएँ, चुनौतियाँ और बदलती तस्वीर

लहर डेस्क

“मेरा नाम सायरा है। मैं कक्षा 10 में पढ़ती हूँ और मेरे अब्बा रिक्शा चलाते हैं। जब मुझे प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति मिली थी, तो पहली बार लगा कि पढ़ाई बोझ नहीं, सहारा है। लेकिन अब सुना है कि यह योजना छोटी कक्षाओं के लिए बंद हो गई है। मेरी छोटी बहन शायद यह मदद नहीं पा सकेगी।”

सायरा की कहानी सिर्फ़ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन लाखों अल्पसंख्यक घरों की है जो सरकारी छात्रवृत्तियों और रोज़गार योजनाओं के सहारे अपनी ज़िंदगी बदलने का सपना देखते हैं।

भारत सरकार का अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय (MoMA) लंबे समय से मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए योजनाएँ चला रहा है। पर सवाल यह है कि इन योजनाओं की पहुँच कितनी है और इनका असर कितना टिकाऊ?

शिक्षा, उम्मीदें और अनिश्चितताएँ।

  • प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति – कभी लाखों बच्चों की पढ़ाई का आधार रही, लेकिन अब कक्षा I–VIII के लिए बंद और IX–X के लिए घटते बजट की शिकार। 2020-21 में इसका बजट ₹1,330 करोड़ था, जो अब लगातार घटा।
  • पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति – उच्च शिक्षा तक पहुँच बनाने वाले लगभग 92 लाख छात्रों की मदद।
  • मेधावी-कम-आर्थिक स्थिति आधारित छात्रवृत्ति – व्यावसायिक शिक्षा में सहारा, जिसमें 30% आरक्षण लड़कियों के लिए है।
  • नया सवेरा – प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को कोचिंग की सुविधा।

सायरा जैसी छात्राएँ इन योजनाओं से उम्मीदें जोड़ती हैं, लेकिन कटौतियाँ और योजनाओं का पुनर्गठन उनके सपनों पर अनिश्चितता की छाया डालते हैं।

प्रशिक्षण से रोज़गार तक।

अहमद नाम का एक युवा बीकानेर से है। उसे PM VIKAS योजना के तहत सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण मिला और अब वह आत्मनिर्भर होकर काम कर रहा है।

  • PM VIKAS – कौशल विकास और आत्मरोज़गार की दिशा में एकीकृत योजना।
  • NMDFC ऋण योजनाएँ – अब तक 23 लाख से अधिक लोगों तक ₹8,700 करोड़ की मदद पहुँची।
  • नई रोशनी – महिलाओं को नेतृत्व और वित्तीय तंत्र से जोड़ने की पहल।

लेकिन गाँवों और कस्बों में जानकारी की कमी अभी भी सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है।

बदली तस्वीर, अधूरी राह।

कुछ कस्बों में PMJVK के तहत नए स्कूल और हॉस्टल बने हैं। लेकिन कई बार रिपोर्टें कहती हैं कि बजट का उपयोग कम हो पाता है और इमारतें अधूरी रह जाती हैं।
दूसरी ओर, जियो पारसी जैसी छोटी योजनाएँ भी दिखाती हैं कि मंत्रालय विशेष समुदायों की ज़रूरतों को ध्यान में रखता है।

आँकड़ों की ज़ुबानी।

  • शिक्षा – 2008-09 से 2022-23 तक 7.1 करोड़ विद्यार्थियों को प्री-मैट्रिक और 92 लाख को पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति मिली।
  • आर्थिक उत्थान – NMDFC ने 23 लाख लाभार्थियों को ₹8,700 करोड़ से अधिक वितरित किए।
  • चुनौतियाँ – हाल के वर्षों में कुछ छात्रवृत्तियों का उपयोग 10% से भी नीचे दर्ज किया गया।

योजनाएँ बनाम ज़मीन की हकीकत।

सायरा और अहमद की कहानियाँ दिखाती हैं कि योजनाएँ अगर सही ढंग से पहुँचें तो ज़िंदगी बदल सकती है। लेकिन बजट कटौती, योजनाओं का विलय और ग्रामीण क्षेत्रों में कम जानकारी – ये सब चुनौतियाँ आज भी सामने हैं।

जरूरत इस बात की है कि योजनाओं का पारदर्शी मूल्यांकन हो, उपयोग सुनिश्चित हो और सबसे ज़रूरी, लाभार्थियों तक समय पर जानकारी पहुँचे। तभी अल्पसंख्यक समुदाय विकास की दौड़ में बराबरी की रफ़्तार पकड़ पाएगा।