जब बच्चों की खांसी बनी मौत का कारण, भारत सरकार की सख्त चेतावनी

अनीस आर खान

छिंदवाड़ा की सुबह थी। बुखार और खांसी से जूझ रहे तीन साल के बच्चे की माँ ने पड़ोस की दवा दुकान से वही सिरप खरीदा जो हर कोई बताता है — “अच्छा है, जल्दी ठीक करेगा।”
लेकिन अगले ही दिन अस्पताल की इमरजेंसी में वह सिरप एक ज़हर साबित हुआ।

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चेतावनी बन गई है।

मौतों के बाद सख्त कार्रवाई।

भारत सरकार ने 3 अक्टूबर 2025 को स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के माध्यम से बच्चों के लिए खांसी की दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग पर नई सलाह जारी की है।
मध्यप्रदेश और राजस्थान में हुई 11 बच्चों की मौतों के बाद यह कदम एक आपात हस्तक्षेप के रूप में लिया गया।

इन मौतों ने यह कठोर सच्चाई उजागर की कि छोटे बच्चों को दी जाने वाली सामान्य खांसी-जुकाम की दवाएं कभी-कभी उपचार नहीं, बल्कि खतरा बन जाती हैं।

क्या कहती है नई सलाह?

DGHS की नई गाइडलाइन साफ़ और सख्त है कि बच्चों की उम्र के अनुसार खांसी-जुकाम की दवाओं के उपयोग पर स्पष्ट पाबंदियां तय की गई हैं।

आयु वर्गनिर्देशकारण
2 वर्ष से कमबिल्कुल भी न दी जाएगंभीर दुष्प्रभाव और कोई ठोस लाभ नहीं
5 वर्ष से कमसामान्यतः न देंसंभावित नुकसान अधिक, फायदा कम
5 वर्ष से अधिकडॉक्टर की कड़ी निगरानी में सीमित अवधि तकदवा तभी, जब एकदम ज़रूरी हो

सरकार ने कहा है कि पहला उपचार हमेशा गैर-औषधीय होना चाहिए। जैसे पर्याप्त पानी, आराम और घरेलू देखभाल

क्या हुआ था मध्यप्रदेश और राजस्थान में?

अक्टूबर के पहले हफ्ते में दो राज्यों से दुखद खबरें आईं —

  • छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश) में 9 बच्चों की मौतें,
  • और राजस्थान के सीकर व भरतपुर जिलों में 2 मौतें

जांच में पाया गया कि Coldrif Syrup (बैच नंबर SR-13) में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) की मात्रा अत्यधिक थी।
यह वही रासायनिक तत्व है जो एंटीफ्रीज़ और औद्योगिक सॉल्वेंट में उपयोग होता है, और गुर्दे फेल होने से मौत तक का कारण बन सकता है।

इसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने तुरंत उस कंपनी के सभी उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया।

वहीं राजस्थान में मौतें Dextromethorphan आधारित सिरप से जुड़ी थीं — जो छोटे बच्चों के लिए कभी अनुशंसित नहीं।
कुछ उत्पाद जैसे Nextro-DS और Dextromethorphan Hydrobromide Syrup IP के बैच अब जांच के दायरे में हैं।

बच्चों में लक्षण कैसे बिगड़े?

मृत बच्चे शुरू में बस सर्दी, खांसी या हल्के बुखार से पीड़ित थे।
लेकिन दवा लेने के बाद उनकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। उल्टी, पेशाब कम होना और अंततः गुर्दे की विफलता
डॉक्टरों के मुताबिक यह डाइएथिलीन ग्लाइकॉल विषाक्तता का क्लासिक लक्षण है।

यह स्थानीय त्रासदी नहीं, वैश्विक चेतावनी।

भारत में यह घटना भले दो राज्यों तक सीमित दिखे, लेकिन दवा प्रदूषण का यह संकट वैश्विक स्तर पर बार-बार सामने आया है।
डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकॉल (EG) से दूषित दवाओं के कारण
पिछले कुछ वर्षों में अफ्रीका, इंडोनेशिया, गांबिया और उज्बेकिस्तान जैसे देशों में सैकड़ों बच्चों की मौतें हुईं।

दूसरी ओर, Dextromethorphan जैसे तत्व भी जोखिम भरे साबित हुए हैं —
इनसे छोटे बच्चों में अत्यधिक नींद, उल्टी, सांस की रुकावट और कोमा तक के मामले दर्ज हुए हैं।

DGHS का सख्त आदेश।

सरकार ने अब दवा निर्माण और वितरण से जुड़ी हर संस्था को कठोर दिशा-निर्देश दिए हैं। जैसे

  • सिर्फ GMP मानक पर बनी दवाएं ही खरीदें और वितरित करें।
  • डॉक्टर और फार्मासिस्ट बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के दवा न लिखें।
  • सभी राज्य सरकारें और स्वास्थ्य केंद्र इस परामर्श को तत्काल लागू करें और जनजागरण करें।

विशेषज्ञों की राय।

बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम देर से जरूर आया, लेकिन जरूरी था।
डॉ. अनुराधा मेहता (जयपुर) कहती हैं कि “माता-पिता को यह समझना होगा कि हर खांसी का इलाज दवा नहीं होती। कई बार शरीर खुद ठीक हो जाता है। लेकिन बाजार की खांसी की सिरप बच्चों के लिए ज़हर साबित हो सकती हैं।”

सवाल जो बाकी हैं।

क्या हम अपने बच्चों को अब भी “सर्दी-जुकाम की साधारण दवा” के नाम पर खतरे में डाल रहे हैं?
क्या ग्रामीण और छोटे कस्बों के मेडिकल स्टोर्स पर इन सलाहों का पालन होगा?
और क्या दवा कंपनियां अब गुणवत्ता को मुनाफे से ऊपर रख पाएंगी?

आखिर में…

DGHS की यह नई सलाह हमें एक बुनियादी बात याद दिलाती है कि
“बच्चों के स्वास्थ्य में जल्दबाज़ी नहीं, सावधानी सबसे बड़ी दवा है।”

खांसी-जुकाम में तुरंत सिरप देने से बेहतर है
थोड़ा इंतज़ार, थोड़ा आराम और थोड़ी समझदारी।