वर्ष 2020 से 2025 तक राजनीति के झूलों में झूलता बिहार

अनीस आर खान
बिहार—भारत के सबसे राजनीतिक रूप से सजग और सजीव राज्यों में से एक है।
यहाँ की राजनीति में एक खास बात है: कुछ भी स्थायी नहीं होता।
यहाँ गठबंधन बदलते हैं, नेता अपने पाले, और जनता अपनी उम्मीदें।
2020 के विधानसभा चुनावों से लेकर 2025 के आगामी चुनावों की तैयारी तक, बिहार की राजनीति एक ऐसे सफ़र से गुज़री है जहाँ जनादेश भी अस्थिर रहा और जनभावनाएँ भी बेचैन।
2020 का चुनाव, जहाँ हर सीट का मतलब था सत्ता।
243 सीटों वाली बिहार विधानसभा का 2020 का चुनाव असल में दो गठबंधनों की टक्कर था।
एक तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA), दूसरी ओर महागठबंधन (Grand Alliance)।
परिणाम ऐसे आए कि हर वोट का वजन महसूस हुआ।
| गठबंधन | प्रमुख दल | सीटें | मत प्रतिशत |
|---|---|---|---|
| राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) | भाजपा, जदयू, हम, वीआईपी | 125 | 37.26% |
| महागठबंधन | राजद, कांग्रेस, वाम दल | 110 | 37.23% |
| अन्य | लोजपा, एआईएमआईएम, निर्दलीय | 8 | 25.51% |
मुख्य बातें:
- राजद 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी,
- भाजपा 74 सीटों पर काबिज हुई,
- जबकि नीतीश कुमार की जदयू घटकर 43 सीटों पर सिमट गई।
फिर भी NDA ने 125 सीटों के साथ बहुमत जुटा लिया, और नीतीश कुमार ने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
यह वही क्षण था जिसने बिहार की राजनीति में गठबंधन गणित की गहराई को फिर से साबित कर दिया।
नीतीश कुमार का एक और पलटाव।
अगर बिहार की राजनीति को एक वाक्य में समेटना हो तो शायद यह कहा जा सकता है। कि “यहाँ स्थायित्व केवल बदलाव में है।”

2024 की शुरुआत में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर सबको चौंकाया।
उन्होंने महागठबंधन छोड़कर भाजपा-नेतृत्व वाले NDA में वापसी कर ली। ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने 2017 में किया था।
इससे राज्य में सत्ता समीकरण फिर बदल गए:
- मुख्यमंत्री: नीतीश कुमार (जदयू)
- सत्तारूढ़ गठबंधन: NDA
- मुख्य विपक्ष: राजद, कांग्रेस और वाम दलों वाला INDIA ब्लॉक
इस राजनीतिक वापसी ने बिहार को फिर उसी बिंदु पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ वह 2020 के चुनाव के बाद था। बस इस बार समीकरणों में थोड़ी थकान और जनता में थोड़ा संदेह ज़रूर है।
जनभावना का ताज़ा संकेत।
बिहार की राजनीति को समझने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजे एक आईना हैं।
राज्य की 40 सीटों में से 30 से अधिक NDA के खाते में गईं।
| गठबंधन | प्रमुख दल | सीटें (40 में से) | अनुमानित वोट प्रतिशत |
|---|---|---|---|
| NDA | भाजपा, जदयू, लोजपा (रामविलास), हम | 30–33 | 75–82% |
| INDIA ब्लॉक | राजद, कांग्रेस, वाम दल | 7–10 | 18–25% |
यह परिणाम यह बताता है कि राष्ट्रीय स्तर पर NDA की पकड़ अभी भी मजबूत है।
लेकिन बिहार में विधानसभा चुनाव की राजनीति अलग होती है — यहाँ जाति, विकास और नेतृत्व तीनों ही चुनावी हवा की दिशा तय करते हैं।

2025 की जंग, तीन मुद्दे जो तय करेंगे बिहार का भविष्य।
1. जाति जनगणना और सामाजिक न्याय का नया अध्याय
2023 में बिहार सरकार ने जो जाति आधारित सर्वेक्षण जारी किया, उसने राज्य की राजनीति की धुरी बदल दी।
सर्वे के अनुसार, EBC और OBC समुदाय राज्य की आबादी का 63% से ज़्यादा हिस्सा हैं।
इससे राजनीति में एक नई मांग उभरी — “जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व।”
अब दलों के लिए यह सिर्फ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुका है।
कौन कितना “पिछड़ा” है, और कौन कितना “प्रतिनिधि” — यही सवाल अब बिहार की हर पंचायत से पटना तक गूंज रहा है।
2. विकास बनाम बेरोज़गारी: पुराना वादा, नई उम्मीद
बिहार अब भी देश के उन राज्यों में है जहाँ पलायन और बेरोज़गारी लगातार बड़ी चुनौतियाँ हैं।
नीतीश कुमार ने सड़कों और पुलों के ज़रिए विकास की तस्वीर तो बदली है, लेकिन
उद्योग, स्थायी रोजगार और बाढ़ प्रबंधन जैसे मुद्दे अभी भी अधूरे वादों की सूची में हैं।
सरकार द्वारा घोषित सरकारी भर्तियों और योजनाओं पर जनता की नज़र है।
लेकिन “रोजगार” और “राहत” के बीच का अंतर अब भी राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है।
3. युवा मतदाता: उम्मीद और असंतोष के बीच

बिहार की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है।
यही वो वर्ग है जो तेजस्वी यादव की भाषा और वादों में खुद को पहचानता है।
रोजगार, शिक्षा और सम्मान — ये तीन शब्द बिहार के युवा वोटरों की राजनीति को परिभाषित कर रहे हैं।
वहीं नीतीश कुमार की राजनीति अनुभव और स्थिरता का प्रतीक मानी जाती है,
पर अब सवाल यह है कि क्या यह स्थिरता युवा पीढ़ी को प्रेरित कर पाएगी, या
तेजस्वी जैसे नए चेहरों को नई राजनीति की ज़मीन तैयार करने का मौका मिलेगा?
बिहार, जहाँ राजनीति कभी स्थिर नहीं होती।
2020 से 2025 के बीच बिहार ने फिर दिखाया है कि यहाँ राजनीति केवल सत्ता की लड़ाई नहीं,
बल्कि सामाजिक पहचान, विकास की चाह और नेतृत्व के संघर्ष की कहानी है।
आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि क्या नीतीश कुमार एक बार फिर जनादेश के भरोसे पर टिके रहेंगे,
या तेजस्वी यादव की नई पीढ़ी बिहार को किसी नए राजनीतिक युग की ओर ले जाएगी।
एक बात तो तय है। कि बिहार की राजनीति अब सिर्फ पटना की गलियों में नहीं, बल्कि गाँवों और युवाओं के मन में लिखी जा रही है।