‘11 नंबर की गाड़ी’ बनाम करोड़ों का काफिला, बिहार चुनाव 2025 में लोकतंत्र का सबसे भावुक चेहरा।

अनीस आर खान

बिहार चुनाव में कयामुद्दीन अंसारी एक ऐसा नाम है जो दौलत की राजनीति को चुनौती दे रहा है। पटना से मीलों दूर, बिहार के ग्रामीण अंचल में इस बार का विधानसभा चुनाव एक ऐसी कहानी लिख रहा है जो सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है। यह कहानी है आरा सदर विधानसभा सीट से CPI(ML) लिबरेशन के उम्मीदवार कयामुद्दीन अंसारी की — एक ऐसे प्रत्याशी की जो धनबल और बाहुबल के दौर में सिर्फ अपने पसीने और जनसमर्थन से लोकतंत्र को नया अर्थ दे रहे हैं।

उनके पास न करोड़ों की संपत्ति है, न गाड़ियों का काफिला, न चमकते पोस्टर-बैनर। फिर भी वे इस चुनाव में एक बड़ा प्रतीक बन गए हैं — “गरीब का उम्मीदवार” और “ईमान की राजनीति” का दूसरा नाम।

पत्रकार जब उन्हें खोजते हुए बिहार की पगडंडियों पर निकलते हैं, तो यह यात्रा सिर्फ एक रिपोर्टर की नहीं रहती, बल्कि उस भारतीय मतदाता की यात्रा बन जाती है जो अब भी यह सवाल पूछना चाहता है — “क्या भारत में बिना पैसे के चुनाव लड़ा जा सकता है?”

कयामुद्दीन अंसारी कहते हैं कि “हमारी सबसे बड़ी गाड़ी है हमारी ‘11 नंबर की गाड़ी’। ये दो पैर हैं!
यही हमें जनता तक पहुँचाते हैं।
ये किसी भी कार या SUV से तेज़ हैं, क्योंकि ये सीधे दिल तक पहुँचते हैं।”

यह बयान जितना सादा है, उतना ही गूंजदार भी — एक ऐसी चुनावी व्यवस्था पर चोट करता हुआ जहाँ टिकट पाने की ‘एंट्री फीस’ ही लाखों में होती है।

गरीबी की गवाही।

कयामुद्दीन अंसारी का चुनावी हलफ़नामा (affidavit) भारत के लोकतंत्र के लिए एक आईना है।
चुनाव आयोग को दिए गए दस्तावेज़ बताते हैं कि उनके पास कुल संपत्ति ₹37,000 की है।

  • चल संपत्ति: मात्र ₹20,000 नकद और ₹17,000 बैंक खाते में।
  • अचल संपत्ति: शून्य — न ज़मीन, न घर, न कोई व्यावसायिक निवेश।

[Live Hindustan, 28 अक्टूबर 2025] की रिपोर्ट के अनुसार, इस बार के चुनाव में पहले चरण में ही 73% उम्मीदवार करोड़पति हैं।
जेडीयू के एक उम्मीदवार के पास ₹71 करोड़ की संपत्ति है।
ऐसे में अंसारी जी का यह ‘शून्य अचल संपत्ति’ वाला हलफ़नामा उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिसे राजनीति अक्सर हाशिए पर छोड़ देती है।

तथ्य बाइट: 2020 के विधानसभा चुनाव में अंसारी जी ने भाजपा के अमरेंद्र प्रताप सिंह से मात्र 3002 वोटों के अंतर से हार का सामना किया था। {जनसत्ता, 7 अक्टूबर 2025}
यह हार नहीं, बल्कि विचारधारा की जीत थी — उस गरीब मतदाता की जीत, जिसने पहली बार देखा कि पैसा हार सकता है, लेकिन विश्वास नहीं।

जनता का चंदा, जनता का चुनाव।

जहाँ बड़े दल करोड़ों के चंदे पर चुनाव लड़ते हैं, वहीं कयामुद्दीन अंसारी का पूरा अभियान ‘माइक्रो-डोनेशन’ पर टिका है।
उनका लक्ष्य है — लगभग ₹10 लाख का चुनाव खर्च, जिसे वे आम जनता से जुटा रहे हैं।

वे कहते हैं —कि “हम किसी सेठ या मंत्री से चंदा नहीं लेते।
हमारा अभियान मजदूर, किसान, छात्र और नौजवानों के सहयोग से चलता है।
कोई दस रुपया देता है, कोई पचास, कोई सौ — हर एक दान का हिसाब है, हर एक चंदे की रसीद है।”

समर्थक (प्रचार टीम का सदस्य): कहते हैं कि
“हम घर-घर जाकर लोगों से एक रुपया तक लेते हैं।
ये उनका चुनाव है, हमारा नहीं।
जब जनता खुद अपने पैसे से नेता बनाती है, तब वह नेता जनता के सामने जवाबदेह बनता है।”

यह दृश्य बिहार की मिट्टी में एक नई परंपरा जन्म दे रहा है —
जहाँ लोग पैसे लेकर प्रचार नहीं करते, बल्कि पैसे देकर उम्मीद बनाते हैं।
यह मॉडल न सिर्फ पारदर्शी है, बल्कि लोकतंत्र को उस दिशा में लौटा रहा है जहाँ राजनीति ‘जनसेवा’ थी, ‘सेल्स प्रोजेक्ट’ नहीं।

‘माले जी’ और भूमिहीन परिवार की विरासत।

आरा की गलियों में जब कोई “माले जी आ रहे हैं” कहता है, तो बच्चे दौड़कर देखने लगते हैं।
कयामुद्दीन अंसारी अब नाम से ज़्यादा पहचान से जाने जाते हैं — “गरीब का नेता”, “मजदूरों का बेटा”

उनकी ज़िंदगी किसी राजनीतिक ड्रामे की नहीं, बल्कि संघर्ष की जीवंत स्क्रिप्ट है।
वे एक भूमिहीन परिवार से आते हैं।
उनकी माँ बीड़ी बनाकर घर चलाती थीं, पिता आज भी मजदूरी करते हैं।
अंसारी ने MA तक की पढ़ाई की, लेकिन वह डिग्री उनकी गरीबी नहीं बदल सकी — शायद इसी ने उन्हें राजनीति की सच्ची दिशा दी।

कौन हैं कयामुद्दीन अंसारी?
“मेरी माँ ने बीड़ी बनाकर मुझे पढ़ाया।
मेरा संघर्ष मेरा नहीं है — उन लाखों भूमिहीनों, मजदूरों और किसानों का है जो आज भी उसी दशा में हैं।
मैं उन सबकी आवाज़ हूँ, जिनकी सुनवाई कहीं नहीं होती।” उनका यह सादा सच उन्हें करोड़ों खर्च करने वाले प्रतिद्वंद्वियों के सामने और मज़बूत बनाता है।
BJP उम्मीदवार संजय सिंह टाइगर जहाँ विशाल काफिले के साथ निकलते हैं, वहीं अंसारी जी अपने दो पैरों से गाँव-गाँव जाते हैं वह भी अपनी “11 नंबर की गाड़ी” में सवार होकर।

असली मुद्दे कौन उठाएगा?

कयामुद्दीन अंसारी का प्रचार किसी शो या प्रदर्शन जैसा नहीं है।
उनके भाषणों में वादे कम, अनुभव ज़्यादा हैं।
वे बोलते नहीं — जीते हैं।

उनके चुनावी मुद्दे बिहार की उस ज़मीन से जुड़े हैं जो सालों से उपेक्षा झेल रही है।

  1. रोज़गार और पलायन:
    बिहार से लाखों लोगों का पलायन रोकना और स्थानीय स्तर पर रोज़गार सृजन करना।
  2. शिक्षा का अधिकार:
    सरकारी स्कूलों की बदहाली को सुधारना, शिक्षकों की भर्ती और स्कूलों में सुविधाएँ सुनिश्चित करना।
  3. भूमि और सम्मान:
    भूमिहीनों को ज़मीन का अधिकार दिलाना और शोषित वर्ग को सामाजिक न्याय देना।
  4. भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग:
    उनका नारा गूंजता है —
    “वोट चोरों को, नौकरी चोरों को, खजाना चोरों को और ज़मीन चोरों को सबक सिखाना है।”

आरा के स्थानीय ग्रामीण कहते हैं कि “हम जानते हैं कि उनके पास देने के लिए पैसा नहीं है,
पर हमारे पास उन्हें देने के लिए हमारा वोट है।
पिछली बार थोड़ा फर्क रह गया था,
इस बार गरीब का बेटा विधानसभा जाएगा,
तभी हमारी बात सुनी जाएगी।”

इन आवाज़ों में सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक भरोसा है —
कि लोकतंत्र अब भी ज़िंदा है, अगर लोग उसे ज़िंदा रखना चाहें।

बिहार की राजनीति का नया मोड़।

बिहार का यह चुनाव अब केवल दो गठबंधनों — एनडीए बनाम महागठबंधन — के बीच का संघर्ष नहीं है।
यह उस बुनियादी सवाल का चुनाव बन गया है —
क्या भारत का लोकतंत्र अब भी आम आदमी के लिए है?

कयामुद्दीन अंसारी का चुनाव अभियान दो तीखे सवाल उठाता है:

  • क्या लोकतंत्र धनतंत्र बन चुका है?
    क्या कोई गरीब व्यक्ति, बिना कॉर्पोरेट या आपराधिक फंडिंग के चुनाव जीत सकता है?
  • क्या विचारधारा को पैसा हरा सकता है?
    क्या वैचारिक प्रतिबद्धता, जनता से जुड़ाव और ज़मीनी ईमानदारी, करोड़ों रुपये के प्रचार को बेअसर कर सकती है?

अंसारी जी का संघर्ष इन सवालों का जवाब बनकर उभर रहा है।
उनके पीछे CPI(ML) का मजबूत ज़मीनी संगठन है, ‘INDIA’ गठबंधन का समर्थन है, और सबसे बढ़कर जनता की भरोसेमंद आवाज़ है।

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि
“कयामुद्दीन अंसारी एक व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं।
वे भारतीय राजनीति में एक बेंचमार्क सेट कर रहे हैं।
अगर वे जीतते हैं, तो यह सिर्फ एक सीट की जीत नहीं होगी —
यह उस व्यवस्था पर तमाचा होगा जो कहती है कि बिना पैसे के राजनीति असंभव है।”

जब ’11 नंबर की गाड़ी’ यात्रा करती है।

आज भी बिहार की धूल भरी सड़कों पर कयामुद्दीन अंसारी की ‘11 नंबर की गाड़ी’ चल रही है।
पैर थकते हैं, मगर रुकते नहीं।
वह जनता से मिलते हैं, हाथ जोड़ते हैं, सुनते हैं, और फिर आगे बढ़ जाते हैं।

उनकी चाल धीमी है, पर असर गहरा।
वे पीछे जो लहर छोड़ रहे हैं —
वह किसी SUV के काफिले से कहीं ज़्यादा सच्ची है।

वह ईमान की लहर है,
संघर्ष की लहर है,
जनता के भरोसे की लहर है।

बिहार चुनाव 2025 में जब इतिहास लिखा जाएगा, तो शायद यह पंक्ति ज़रूर दर्ज होगी।

“एक तरफ करोड़ों का काफिला था, दूसरी तरफ ‘11 नंबर की गाड़ी’।
पर सच्चा लोकतंत्र उसी के साथ चला, जो पैदल चला।”