स्मार्ट मीटर बनाम किसान: यह अस्तित्व का सवाल है।

लहर संवाददाता की विशेष रिपोर्ट

सुबह दस बजे का वक्त था। बीकानेर ज़िले के प्रखंड बज्जू का कार्यालय आज सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ से भरा हुआ था। किसानों के हाथों में तख्तियाँ थीं, जिन पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था। “स्मार्ट मीटर वापस लो”, “महंगी बिजली नहीं चलेगी”, “किसानों का शोषण बंद करो”। भीड़ में महिलाएँ, बुज़ुर्ग और बच्चे भी थे।

नारे गूंज रहे थे, माहौल ग़ुस्से और आक्रोश से भरा था। यह धरना-प्रदर्शन बिजली उपभोक्ता संघर्ष समिति बज्जू की ओर से आयोजित किया गया था, जिसके पीछे महीनों से पनपता असंतोष था।

हमारी खेती बिजली पर टिकी है।

धरने में मौजूद किसान रामकुमार भादू ने संवाददाता को बताया कि “बज्जू में खेती बारिश पर नहीं, ट्यूबवेलों की बिजली पर चलती है। जब बिजली समय पर नहीं मिलेगी, तो फसल कैसे बचेगी? ऊपर से स्मार्ट मीटर लगाकर जेब पर सीधा बोझ डाल दिया गया है।”

इसी तरह लालाराम सारण, जो 65 वर्षीय किसान हैं, बोले कि “स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिल तीन गुना बढ़ गया है। न तो हमें यह समझ आता है कि मीटर कैसे चलता है और न ही कोई विभागीय अधिकारी हमारी सुनता है।”

धरना-स्थल पर मौजूद महिलाओं ने भी अपने दुख साझा किए। अनिता बेनीवाल बोलीं,
“घर का खर्चा कैसे चले? दो दिन बल्ब जलाओ तो भी बैलेंस खत्म। बच्चों की पढ़ाई तक बाधित हो रही है। यह स्मार्ट मीटर नहीं, स्मार्ट लूट है।”

सरकार का तर्क और हकीकत

राजस्थान सरकार ने 2023 में पूरे प्रदेश में स्मार्ट मीटर लगाने की योजना शुरू की थी। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, अब तक 45 लाख से अधिक स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं। सरकार का कहना है कि इससे

बिजली चोरी रुकेगी।

बिलिंग पारदर्शी होगी।

उपभोक्ता अपने उपभोग पर नियंत्रण रख पाएँगे।

लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। राजस्थान विद्युत वितरण निगम (JVVNL) की एक आंतरिक रिपोर्ट, जो 2024 में लीक हुई थी, के अनुसार स्मार्ट मीटर लगने के बाद 70% उपभोक्ताओं ने बिल बढ़ने की शिकायत दर्ज की।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्ट मीटर की तकनीक तो सही है, लेकिन इसे बिना पर्याप्त समझाए और ग्रामीण उपभोक्ताओं की क्षमता देखे बिना लागू करना सबसे बड़ी भूल है।

पुरानी नाराज़गी, नए रूप में

यह पहला मौका नहीं है जब बज्जू और आसपास के इलाकों में बिजली को लेकर विरोध हुआ है।

2019: किसानों ने बिजली कटौती के खिलाफ 7 दिन तक धरना दिया था।

2022: उपभोक्ताओं ने गलत बिलों के खिलाफ मोर्चा खोला था।

तब सरकार ने 24 घंटे बिजली और बिल सुधारने का वादा किया था, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि वादे हवा हो गए।

किसान गणपत मेहरड़ा ने कहा “2022 में भी कहा गया था कि समस्या हल करेंगे। अब तो और बढ़ गई है। सरकार की नीतियाँ किसान विरोधी हैं।”

नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका

धरने में शामिल नेताओं ने इसे सिर्फ बिजली का मुद्दा नहीं, बल्कि किसान और आम आदमी के अस्तित्व से जुड़ा सवाल बताया।

अखिल भारतीय किसान सभा के जेठाराम लाखुसर ने कहा कि “यह नीति निजी कंपनियों के दबाव में लाई गई है। सरकार ने किसानों से बिना पूछे फैसले किए। हम तब तक संघर्ष करेंगे जब तक स्मार्ट मीटर वापस नहीं लिए जाते।”

कांग्रेस मंडल अध्यक्ष सुनील गोदारा बोले कि “किसान के घर की रोशनी छीनकर कंपनियों की तिजोरी भरना लोकतंत्र के खिलाफ है। अगर विभाग ने ध्यान नहीं दिया, तो सड़क से सदन तक संघर्ष होगा।”

युवाओं का गुस्सा भी साफ दिखा। एसएफआई के पूर्व जिलाध्यक्ष कैलाश बेनीवाल ने कहा कि “गाँव का युवा खेती छोड़कर कोई भी काम करना चाहे, बिजली उसकी रीढ़ है। कटौती और महंगे मीटर से रोज़गार खत्म हो रहे हैं।”

प्रशासन और बिजली विभाग की चुप्पी

धरने की कवरेज के दौरान संवाददाता ने बिजली विभाग के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की। उपखंड स्तर पर किसी भी अधिकारी ने बयान देने से इनकार किया।

हालाँकि, जयपुर स्थित ऊर्जा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि “स्मार्ट मीटर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार लगाए जा रहे हैं। शुरुआती समय में कुछ तकनीकी दिक्कतें आई हैं, लेकिन उपभोक्ताओं को घबराने की ज़रूरत नहीं। शिकायतों का निस्तारण किया जा रहा है।”

लेकिन यह बयान धरना-स्थल पर मौजूद लोगों के गुस्से के सामने बेमानी लगता था।

विशेषज्ञों की राय: “तकनीक से पहले भरोसा चाहिए”

ऊर्जा मामलों के जानकार जयपुर स्थित प्रोफेसर अरुण माथुर का कहना है कि “स्मार्ट मीटर तकनीकी रूप से सही हैं। लेकिन समस्या यह है कि सरकार ने इन्हें जनता की सहमति और विश्वास बनाए बिना थोप दिया। ग्रामीण उपभोक्ताओं को डिजिटल भुगतान और प्रीपेड सिस्टम की आदत नहीं है। परिणामस्वरूप उन्हें यह लूट जैसा लगता है। यह नीतिगत असफलता है।”

आंदोलन की आगे की रूपरेखा

धरने के अंत में बिजली उपभोक्ता संघर्ष समिति ने साफ चेतावनी दी:

गाँव-गाँव जाकर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।

बड़े पैमाने पर “स्मार्ट मीटर विरोधी हस्ताक्षर अभियान” शुरू होगा।

अगर माँगें पूरी नहीं हुईं, तो बीकानेर ज़िला मुख्यालय और जयपुर तक रैली निकाली जाएगी।

सभा में कॉमरेड अशोक शर्मा, मुकेश सिद्ध, गिरधारी जाखड़, रमेश बेनीवाल, विकास बेनीवाल, अनिल गोदारा, अंकित बेनीवाल, कॉमरेड ओमप्रकाश पवार सहित अनेक नेताओं ने भाषण दिए।

सवाल बिजली का, या लोकतंत्र का?

बज्जू का यह आंदोलन सिर्फ बिजली का सवाल नहीं, बल्कि शासन और जनता के रिश्ते का आईना है। किसान और उपभोक्ता कह रहे हैं कि उनसे पूछे बिना उनके जीवन पर असर डालने वाले फैसले लिए जा रहे हैं।

जब संवाददाता धरना-स्थल से लौट रहा था, तब भीड़ गा रही थी।
“जब तक स्मार्ट मीटर वापस नहीं, आंदोलन जारी रहेगा।”

यह आवाज़ केवल बज्जू की नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान और शायद भारत के लाखों ग्रामीणों की है। सवाल वही है। कि क्या बिजली कंपनियों का मुनाफा जनता के हक से बड़ा है?