वोटर लिस्ट से गायब होते नाम: बिहार की लोकतांत्रिक पीड़ा

अनीस आर खान, नई दिल्ली
सुबह की हल्की धुंध अभी पूरी तरह छँटी नहीं है। गाँव की पगडंडी पर लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। हाथों में छोटी-छोटी पर्चियाँ, आँखों में उम्मीद की चमक। यह वह चमक है जो लोकतंत्र के नाम पर हर पाँच साल में जगती है। लेकिन जैसे ही फुलवारी शरीफ के मतदान केंद्र पर लोग दीवार पर चस्पा हुई नई वोटर लिस्ट देखते हैं, उनकी आँखों की चमक बुझ जाती है।
“नाम नहीं है… हमारा नाम कहाँ गया?”
यह सवाल वहाँ मौजूद भीड़ में गूँजता है। लोग पन्ने पलटते हैं, उँगलियाँ बार-बार चलाते हैं, लेकिन उनके नाम जैसे हवा में घुल गए हों। इस बार प्रकाशित हुई वोटर लिस्ट ने पूरे बिहार में हलचल मचा दी है। केवल फुलवारी शरीफ के दो मतदान केंद्रों की बात करें, तो 1213 नामों में से 214 काट दिए गए। निर्वाचन आयोग कहता है— इनमें मृतक, स्थानांतरित और डुप्लीकेट मतदाता शामिल हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि उन 214 में से बहुत-से लोग ज़िंदा हैं, अपने ही घर में हैं, और सालों से उसी गाँव की मिट्टी में साँस ले रहे हैं।
खेतों में हल चलाने वाले सत्यदेव प्रसाद कहते हैं कि “हमारा पूरा परिवार यहीं है। हम तो आज भी इसी घर की छत के नीचे रहते हैं। लेकिन वोटर लिस्ट में हम सबको गायब कर दिया गया। किसके भरोसे रहेंगे अब?” उनकी आवाज़ में ग़ुस्से से ज़्यादा बेबसी है। जैसे कोई किसान अपने खेत में खड़ी फसल को ओलावृष्टि से उजड़ते देखे। गाँव के ही उपेंद्र प्रसाद सवाल करते हैं कि “हम तो गाँव से कहीं गए नहीं। ज़मीन-घर सब यहीं है। फिर हम ‘स्थानांतरित’ कैसे हो गए? ये हमारी ज़िंदगी की सच्चाई से खिलवाड़ है।” उनकी आँखों में अजीब-सी थकान है। मानो वह प्रशासन से नहीं, बल्कि लोकतंत्र से जवाब माँग रहे हों।
85 वर्षीय चंद्रिका राय, जो लकवाग्रस्त हैं, का नाम भी इस सूची से काट दिया गया। उनके बेटे की आँखें नम हो जाती हैं जब वह कहते हैं— “पिता जी ने आज़ादी के बाद से हर चुनाव में वोट दिया। लेकिन इस बार उन्हें कह दिया गया कि उनका नाम ही नहीं है। यह सिर्फ़ अधिकार नहीं छीनना है, यह बुज़ुर्ग की इज़्ज़त पर चोट है।” सोचिए, एक ऐसा आदमी जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी देश की राजनीति को वोट देकर आकार दिया, अब उसी लोकतंत्र ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया।
शगुफ़्ता बेग़म हताश होकर कहती हैं कि “मेरे पति का नाम लिस्ट में है, मेरा नहीं। मैं 30 साल से इसी गाँव में रह रही हूँ। अगर मुझे ही वोट का हक़ नहीं मिला तो और किसे मिलेगा?”
रमेश कुमार, रिक्शा चालक, की पीड़ा और गहरी है “हम गरीबों के पास न ज़मीन है, न नौकरी। हमारे लिए वोट ही बराबरी का सहारा है। अगर वो भी छीन लिया जाए, तो हम इंसान कैसे रहेंगे?” ये आवाज़ें आँकड़ों से ज़्यादा ताक़तवर हैं। क्योंकि ये सिर्फ़ वोटर लिस्ट से कटे नाम नहीं, बल्कि इंसानी अस्तित्व से कटे सपने हैं।
विशेषज्ञ कहते हैं कि वोटर लिस्ट लोकतंत्र का आधार है। यह वही दस्तावेज़ है, जो एक मज़दूर को मंत्री के बराबर खड़ा करता है, जो एक महिला को पंचायत से संसद तक आवाज़ उठाने का अवसर देता है। लेकिन जब यही सूची भरोसे के काबिल न रहे, तो लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुँचती है। डॉ. नवल किशोर चौधरी, चुनाव विश्लेषक, कहते हैं कि “वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता लोकतंत्र की रीढ़ है। अगर यह ग़लत होगी तो पूरा चुनाव ही संदिग्ध लगेगा।” मनीषा त्रिपाठी, सामाजिक कार्यकर्ता, जोड़ती हैं कि “सबसे ज़्यादा नुक़सान गरीबों और महिलाओं का होता है। वे न तो शिकायत कर पाते हैं, न कोर्ट-चौखट के चक्कर लगा पाते हैं। उनका मौन सत्ता के लिए सबसे आसान साधन बन जाता है।”
गाँवों में लोग कहते हैं कि कहीं यह जानबूझकर की गई चाल तो नहीं? कौन से समुदाय का नाम अधिक कटा, कौन-सा इलाका प्रभावित हुआ—इन सवालों से राजनीति की बू आती है। हालाँकि प्रमाण जुटाना कठिन है, पर अविश्वास की आग सुलग उठी है।
समाधान सरल नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं—
नाम काटने से पहले नागरिक को नोटिस मिले।
हर गाँव में सार्वजनिक सत्यापन हो।
शिकायत दर्ज करना आसान बनाया जाए।
निगरानी में नागरिक संगठनों की भूमिका तय हो।
बिहार की ये कहानियाँ सिर्फ़ चुनावी तकनीकी ग़लतियों की दास्तान नहीं हैं। ये उस लोकतंत्र की दरारें हैं, जहाँ इंसान को उसकी पहचान से ही वंचित किया जा रहा है। और जब लोकतंत्र अपने नागरिक को पहचानने से इंकार कर दे, तो उससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है?