मनरेगा पर संकट और ग्रामीण भारत की अनदेखी

लेखक- असमा खान दिल्ली -दिल्ली एन सी आर से विशेष
केंद्र सरकार और राज्य की सरकार के बीच भीषण तनाव कम होने की सभी युक्तियां निहितार्थ रहीं। मनरेगा चोर गद्दी छोड़, मोदी सरकार हाय हाय, मनरेगा वापस लाओ, महात्मा गांधी अमर रहें, मनरेगा वापस लाओ, महात्मा गांधी अमर रहे। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बसती जनसंख्या को प्रबंधन का आभाव फिर डरा रहा है। देश का आधार ग्रामीण भारत जहां देशवासियों का जीवन सभी स्तर पर स्वतंत्र सुलभ सरल समृद्ध मांग के अनुसार न्यायिक व्यवस्था कायम रखने के लिए बनाया गया। ख़ुशहाली की कामनाएं सदैव की गई। दो दशक पूर्व सभी भेदभाव भुलाकर समानता के अधिकार को प्रयोग कर महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम सदन के माध्यम से लाया गया। मनरेगा उदास चेहरे पर खुशहाली के समान नतीजे साझा कर रहा था। दूरदराज़ के इलाकों में सृजन को बल मिला सेवाओं किया गया जिसका आधार नहीं था उसे भी लाभकारी हितकारी योजनाओं से सिद्धी प्राप्त हुई।

विशेष प्रकरण – शांति मार्च 30 जनवरी 2026। 24 अकबर रोड काँग्रेस मुख्यालय से राजघाट मार्च
मनरेगा के माध्यम से बंद विभागो के तालों को खोला गया। नई ईकाईयों में मनरेगा ने नियंत्रण प्रदान किया। वर्तमान में मनरेगा बचाओ संग्राम ऐसा रुप धारण कर चुका है जहां कांग्रेस पार्टी जन आकांक्षाओं के पथ पर आगे बढ़ते हुए जनता के लिए लाभकारी हितकारी सिद्ध मनरेगा कानूनी अधिकार को पुनः बहाल कराए जाने की दिशा में दुर्गम पथ पर चलते हुए जान हथेली पर लिए 24अकबर रोड से जनक्रांति का नेतृत्व कर रही है। 30 जनवरी 2026 के दिन शांति मार्च का आयोजन किया गया जिसमें कांग्रेस कोषाध्यक्ष, श्री अजय माकन, कांग्रेस महासचिव श्री जयराम रमेश, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष श्री देवेन्द्र यादव, अ0भा0क0कमेटी के दिल्ली प्रभारी काजी निज़ामुद्दीन, मीडिया और प्रचार कमेटी के चेयरमैंन पवन खेड़ा, एससी विभाग के अध्यक्ष राजिंदर पाल गौतम, पूर्व सैनिक कर्नल रोहित चौधरी, वरुण चौधरी, अ0भा0क0कमेटी सचिव अभिषेक दत्त, दिल्ली कांग्रेस प्रशासनिक प्रभारी जतिन शर्मा, दिल्ली कांग्रेस कम्युनिकेशन विभाग के चेयरमैन एवं पूर्व विधायक अनिल भारद्वाज, दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री डॉ. योगानंद शास्त्री, डॉ. नरेंद्र नाथ, प्रो. किरण वालिया, पूर्व विधायक भीष्म शर्मा, विजय लोचव, सुरेंद्र कुमार, कुंवर करण सिंह, प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष पुष्पा सिंह, युवा कांग्रेस अध्यक्ष अक्षय लाकरा, सेवादल के मुख्य संगठक सुनील कुमार, पूर्व उपाध्यक्ष मुदित अग्रवाल, लोकसभा एवं जिला आर्ब्जवर जितेंद्र कुमार कोचर, सीपी मित्तल, जगजीवन शर्मा, तसवीर सोलंकी, एडवोकेट सुनील कुमार, लक्ष्मण रावत, डॉ. पी.के. मिश्रा, पूर्व उपमेयर परवीन राणा, जिला अध्यक्ष वीरेंद्र शर्मा, मोहम्मद उस्मान, इंद्रजीत सिंह, सिद्धार्थ राव, राजकुमार जैन, धर्मपाल चंदेला, हर्ष चौधरी, राजेश यादव, महेंद्र भास्कर,दिनेश कुमार एडवोकेट, महेंद्र मंगला, प्रदेश कांग्रेस एससी विभाग चेयरमैन संजय नीरज, ओबीसी विभाग चेयरमैन राजीव वर्मा, अल्पसंख्यक विभाग चेयरमैन अब्दुल वाहिद, महिला कांग्रेस जिला अध्यक्ष श्रीमती प्रिया जयन्त, त्रिलोक चौधरी और प्रमोद जयन्त सहित हजारां कांग्रेस कार्यकर्ता शामिल थे।
जहां हजारों हज़ार कांग्रेस कार्यकर्ता, देशभर का मज़दूर किसान वर्ग साल के 365 दिन रोज़गार के आभाव में संघर्ष करता रहा है। आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर महान मानवीय सिद्धांतों के आधार व सम्मान को शांति मार्च के माध्यम से पुनः स्थापित किया है। षड्यंत्रकारी बी-वी (जीरामजी) स्कीम जो एक प्रस्तुत छलावा है संसद से उठे तीव्र स्वर जनसंरक्षण के लिए 24 अकबर रोड़ को ललकार रहा हैं। फलस्वरूप मनरेगा संग्राम के अंतर्गत आयोजित शांति मार्च देश के राष्ट्रपति भवन की बुनियाद और भारतीय जनता पार्टी का मुख्यालय जिसका कोई संरक्षक ही नहीं इसके अस्तित्व को मिटा चुका है। निष्ठुर कठोर कार्रवाई कर रहा पुलिस प्रशासन जिसने जिस थाली में खाया आज देशहित के हवाले से जनता पर नहीं माता-पिता बच्चों सहित भविष्य पर निर्भर है। बीजेपी जो मानवतावादी दृष्टिकोण को नष्ट कर विनाशकारी षड्यंत्रों की गुत्थी से सरल समृद्ध भारत की संस्कृति व सभ्यता को तहस नहस कर स्वयं के लिए ज़मीन तलाश रही है। मानवीय मूल्यों को भुलाकर सदन के ग़लत प्रयोग पर गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। सत्ता सदन क्लिष्ट राजनीतिक समीकरणों के माध्यम से और नाज़ीवादी विचारों को व्यक्त कर सामंतवादी व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रही है। विपरीत परिस्थितियों में देश की कर व्यवस्था प्रशासनिक विफलताएं परिणामस्वरुप समस्याओं का हल पराजय एक बार फिर दिल्ली व महानगरों का प्रदूषण नियंत्रण देश का वित्तीय प्रबंधन सभी सवालिया है। दिल्ली की जनता को प्रदान किए जाने वाली सुविधाएं हर स्तर पर नाकाम सिद्ध रही हैं। कांग्रेस लीडर व सैद्धांतिक परंपरागत प्रभावित वर्ग हर कदम पर मांग करते हुए “मनरेगा चोर गद्दी छोड़” के गुंजायमान नारे से चलते हुए गांधी स्मृति तीस जनवरी मार्ग की ओर शांति मार्च के आरंभ पर पग-पग चल पड़े। पुलिस की हैकड़ी प्रशासन व कानून व्यवस्था के हवाले से सभी संघर्षशील प्रदर्शनकारियों मार्च में शामिल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को डिटेन कर पुलिसिया कार्यवाही करते हुए मनुष्यता, कानून व्यवस्था और चरमराई देश की अर्थव्यवस्था, आधुनिक नियमों और तकनीकों से गुंथी हुई भारतीय राजनीति की पृष्ठभूमि का भौतिक सत्यापन किया है। पूर्व में सफलता का परचम लहरा चुकी मनरेगा योजना पुनः बहाल कराए जाने हेतु हर वर्ग हर घर की लड़ाई लड़ रहा है। मोदी सरकार को करोड़ों ग्रामीणों को रोजगार सुनिश्चित करने वाली योजना मनरेगा को दोबारा लागू करना होगा यह मांग की जा रही है।
हज़ारों हज़ार नहीं लाखों लाख जनता सभी भेद भुलाकर समानता के अधिकार की मांग कर रही है। 30 जनवरी 2026 के दिन काँग्रेस पार्टी ने मनरेगा को भारत में ग्रामीणों को रोजगार देने की गारंटी के लिए लागू किया था, ताकि भारत का हर गरीब नागरिक आर्थिक रुप से मजबूत बन सके। मोदी सरकार ने मनरेगा को खत्म करने के दर्दनाक निर्णय के खिलाफ दिल्ली कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ता महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धाजंलि देने के लिए उपस्थित हुए है क्योंकि महात्मा गांधी ने करोड़ो ग्रामीणों की उनके अधिकारों के लिए अहिंसा पूर्वक एक लंबी लड़ाई लड़ी थी, जिसके कारण ग्रामीणों को 365 दिनों में तय दिनों का रोजगार सुनिश्चित करने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम लागू किया जहां मनरेगा आने वाले कल के लिए आशा की किरण सिद्ध हुआ और सफल स्वस्थ समाज का निर्माण किया गया। प्रदर्शनकारियों सहित अ0भा0क0कमेटी के सदस्य सीनियर लीडर सहित मज़दूरों को संरक्षण प्रदान कर रहे संस्थान सभी को पुलिस ने गांधी स्मृति, तीस जनवरी मार्ग जाने से रोका और आगे बढ़ने पर पुलिस ने श्री देवेन्द्र यादव सहित भारी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। आक्रोषित कांग्रेस कार्यकर्ता मनरेगा चोर गद्दी छोड़, मोदी सरकार हाय हाय, मनरेगा वापस लाओ, महात्मा गांधी अमर रहे आदि नारे लगा रहे थे।
शांति मार्च का लक्ष्य और दिशा देवेन्द्र यादव ने शब्दों में बोलकर समझाया “मनरेगा बचाओ संग्राम में कांग्रेस कार्यकर्ता मनरेगा को वापस लाने के लिए एकजुट होकर संघर्ष कर रहे है” क्योंकि मोदी सरकार ने मजदूरों से दिहाड़ी के मोल भाव का हक छीन लिया है, पंचायतों की शक्ति और राज्यों के अधिकार छीनकर दिल्ली में केन्द्रित करके देश के करोड़ो लोगों की न्यूनतम मजदूरी, साल भर काम की गारंटी, आजादी और स्वाभीमान के साथ काम करने के अधिकार को छीन लिया है। मोदी सरकार मजदूरों को गुलाम बनाने वाली सरकार है। भाजपा ने हमेशा ही विपक्ष को कमजोर करने का काम किया है। कांग्रेस देश के करोड़ों देशवासियों की अजीविका और उनके अधिकारों को संरक्षित और सुरक्षित बनाने के लिए सड़क से संसद तक लड़ाई लड़ रही है। मनरेगा की वापसी के लिए एकजुटता से लम्बी लड़ाई लड़नी होगी। मोदी सरकार को करोड़ों ग्रामीणों को रोजगार सुनिश्चित करने वाली योजना मनरेगा को दोबारा लागू करना होगा। सैकड़ों किसानों के जान गंवाने के बाद तीन काले कृषि कानूनों को किसानों कड़े संघर्ष के बाद मोदी जी ने सार्वजनिक रुप से वापस लेने की घोषणा की थी।
जहां नीतिगत फेल सरकार पूर्व में मुहखी खाएं बैठी है। पूर्व की भांति कुठाराघात को समझते हुए सैद्धांतिक परंपरागत मूल्यों पर आधारित निर्णय स्वयं के संरक्षण के लिए न्यायसंगत वातावरण का निर्माण कर मनरेगा जो सिर्फ एक योजना नही बल्कि ग्रामीण लोगों को इज्जत और सम्मान से रोटी देने का अधिकार है जिसे कांग्रेस की सरकार ने लागू किया था। सफलता प्राप्त करने के लिए विध्वंसकारी बी-वी (जीरामजी) घृणित कृत्य के पाप को गंगा स्नान कर पुनः मनरेगा सरीखे शुद्ध लाभकारी हितकारी कानून स्थापित करेगी। देशहित में लाभकारी कानून को खत्म करना निश्चित ही देश विरोधी और निम्न वर्ग विरोधी है, गुणात्मक सुधार की बांट जो रही सत्ताधारी सरकार संविधान में बदलाव करके लगातार देश के गरीबों स्तर को भुलाकर सभी वर्गों को कमजोर करने का काम कर रही है।
एक प्रश्न का जवाब देते हुए श्री देवेन्द्र यादव ने कहा कि मनरेगा को खत्म करके मोदी सरकार काम के अधिकार को खत्म कर रही है। ग्राम पंचायतों को काम देने का अधिकार खत्म करके यह सरकार के अधिकार क्षेत्र होगा। अब मजदूरी मनमाने ढ़ंग से तय होगी और इसमें हर साल बढ़ोत्तरी की गारंटी भी खत्म कर दी है और योजना फसल कटाई के मौसम में नही चलेगी, जिससे मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी के लिए किसी भी का काम को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। भारत पंचायती राज प्रणाली का द्योतक है। ग्राम पंचायत से काम मांगने पर ग्राम परिवार को 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध कराना कानूनी अनिवार्य था। मनरेगा के अंतर्गत प्रदान की जाने वाली सुविधाएं 365 दिन कार्य प्रदान करने की गारंटी इसका मुख्य आकर्षण है।मनरेगा में बदलाव से पहले मजदूरी का 100 प्रतिशत भुगतान केन्द्र सरकार करती थी, जिससे राज्य सरकारें बिना किसी कठिनाई के काम उपलब्ध कराती थी। विवाद और कठिनाई जिस कारण बीजेपी के द्वारा सदन के माध्यम से लाई गई विवादित योजना बी-वी (जीरामजी) गणना के आधार पर आंकलन और विद्वेष पैदा कर रही है। भांति भांति के बखान जुमलेबाज़ी और मजदूरी के भुगतान का 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकारों को वहन करना होगा ऐसे विभत्स और अहितकारी निर्णय प्रस्तुत कर रही है। मनरेगा कानून पुनः बहाल करने कि हट और करोड़ों ग्रामीण परिवारों को काम मिलने और काम का भुगतान में अधिक विलंब न हो इसके लिए सभी स्तर पर और कांग्रेस के शीर्ष से राज्यवार सभी प्रांतों पर कुठाराघात का अंत किए जाने की मांग की जा रही है।ज़मीनी स्तर पर जारी मांग की प्राप्ति और कठिनाइयों से उबरने के लिए दशकों से जूझ रहा वर्ग वित्तीय प्रधानता नहीं, दस्तावेज़ीकरण नहीं, बी-वी (जीरामजी) योजना के पहिए के नीचे पिस रहा है। न्यायसंगत वातावरण जहां मनरेगा को ग्रामीण अंचलों में बस रही जनता दिये के भांति सिद्धकारी मानती रही उसके लाभकारी पक्ष साझा हैं। आगे समझिए मनरेगा कैसे मासूम चेहरे की मुस्कान बना। मनरेगा केवल काम का अधिकार नहीं यह ग्राम सभा को और ग्रामीणों को शक्ति प्रदान करता रहा है। मनरेगा अंधेरों से आगे बढ़ते हुए सफलता का परचम लहरा रहा है।
मनरेगा के माध्यम से महिला सशक्तिकरण को बल प्रदान किया गया। मनरेगा अन्याय पर न्याय और विवश मनुष्य जिसने कड़ा संघर्ष कर संतुलन बरकरार रखते हुए पग-पग सफल भविष्य की दिशा में सफलता का सफर जारी रखा। मनरेगा कानून को ध्वस्त करना भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को क्षीण करना है। सरकार ने राज्य और केंद्र के विवाद की सभी सीमाओं को लांघकर ग़रीब आदिवासी पिछड़े वर्ग पर कुठाराघात किया है। मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ग़रीब पिछड़े आदिवासी वर्ग समुदाय को गरिमामय उपस्थिति दर्ज करने के अधिकार स्वरूप लाया गया उसकी विवशता विविधता सफलता की कूंजी है। राष्ट्रपिता के नाम पर आधारित यूपिए निर्देशित मनमोहन सरकार यह प्रयास राज्यों सहित ग्राम सभाओं को शासन के स्वतंत्र निर्णय का पक्षधर रहा है। जीवन में लालसा मानवीय चेतना और संवेदनशील मुक्त निर्णय प्रांतों से उठ रहे स्वर पंचायतों, ग्राम सभाओं और राज्य केंद्र निर्मित निर्गमन से सशक्तिकरण और भिन्न विध्वंसकारी विचारों का प्रकटीकरण है। सत्य से अलग उद्यमिता और नवाचार संस्थागत निवेशकों के रूप में प्रयोग ठगी की राह और सीधे सीधे अपराध किए जाने की आवश्यकता का संकेत जारी कर रहा है। ज़मीनी स्तर पर सृजन वर्तमान बीजेपी सरकार का विवादित निर्णय मज़दूर को पैतृक तनाव मुक्ति और कृषक के कल्याण से परे उद्यमिता विकास की धुरी पर थिरकने की सलाह दे रहा है। पाठक दर्शक व श्रोताओं को इस छलावे को गर्दन तोड़ गौरिल्ला तकनीक से प्रशंसनीय सिद्धी से जीत दर्ज करते हुए सत्य से परीचित कराना होगा। सचेत और जागरूक नीति ही शांति ख़ुशहाली की ।