फूट डालो, राज करो: एक सोसाइटी के बहाने पूंजीवाद की सच्चाई

By-लहर डेस्क

कहते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था का मूल स्वभाव ही इतना व्यक्तिकेंद्रित होता है कि वह हर स्तर पर ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति को आत्मसात कर लेती है। यह नीति सिर्फ राजनीतिक दलों, सरकारें या बड़ी कंपीनियों तक सीमित नहीं है, यह अब हमारे रहन-सहन की जगहों — हमारे घरों और मोहल्लों तक भी पहुँच चुकी है।

एक ताज़ा उदाहरण  उत्तर भारत ग़जीबाद जिले की एक प्रतिष्ठित हाउसिंग सोसायटी दिव्यांश ओनिक्स’ में देखने को मिला। यहाँ सबसे पहले बिल्डर ने निवासियों को टावर-वार समूहों में बाँट दिया -जैसे ही एकता की जगह वर्गीकरण आया, विवाद और अविश्वास का बीज बो दिया गया।

इसके बाद ‘मेंटेनेंस शुल्क’ के नाम पर, जिन्होंने अग्रिम भुगतान कर दिया और जिन्होंने नहीं किया, उनके बीच एक व्यवस्थित तनाव पैदा किया गया। जो पैसा चुका चुके थे, वे खुद को “जिम्मेदार” और दूसरों को “फ्री-राइडर” समझने लगे — और जो नहीं दे सके थे, उन्हें अपराधबोध और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का काम शुरू हुआ।

बिल्डर ने खुद को ‘पीड़ित’ के रूप में पेश किया — मानो उसके साथ ही अन्याय हो रहा हो — और बाकियों पर बकाया राशि वसूलने का दबाव बनाया। जब इससे भी बात नहीं बनी, तो अगला कदम और भी खतरनाक था: मेंटेनेंस स्टाफ को मनोवैज्ञानिक रूप से उकसाना।

उन्हें यह कहा गया — “तुम्हारी तनख्वाह नहीं आ रही, क्योंकि जिनके लिए तुम काम करते हो वही भुगतान नहीं कर रहे।”
अब इस वेतन कटौती और विलंब की आड़ में, गरीब स्टाफ और मिडिल क्लास रेज़िडेंट्स को आपस में भिड़ाया जा रहा है। यह ‘नीचले तबके को ऊपरी तबके से लड़ाने’ का वह तरीका है, जिससे पूंजीपति खुद को बचा लेता है और असली दोषियों से ध्यान भटक जाता है।

क्या बिल्डर की जिम्मेदारी नहीं बनती?

बिल्डर ने ‘दिव्यांश ओनिक्स’ के तरीबन 80 फीसदी फलेट्स बेच चुका है , जो नहीं बिका है उसके मूल्य में बेतहासा मूल्य बृद्धि कर चुका है — और अब दावा करता है कि यदि मेंटेनेंस की राशि समय पर नहीं मिली, तो वह आर्थिक रूप से दिवालिया हो जाएगा। सवाल यह है???

  • क्या उसने कभी खाली फ्लैटों, अनबिके यूनिट्स का मेंटेनेंस शुल्क खुद अदा किया?
  • क्या उसने उस राशि का हिसाब दिया, जो निवासियों से पहले ही वसूली जा चुकी है?
  • जिन सुविधाओं के लिए पैसा पहले ही लिया गया है, उनकी गुणवत्ता कैसी है?
  • क्या वह ग्राहक के प्रति जवाबदेह है या खुद को भगवान मान बैठा है?

आज हालत यह है कि पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर लगे STP प्लांट से गंदा, बदबूदार पानी निकलता है; क्लब हाउस, सुरक्षा और सफाई की व्यवस्था लचर है; और सुरक्षा के नाम पर ली गई भारी रकम के बावजूद गार्ड या तो नदारद हैं या 12 घंटे की थकाऊ ड्यूटी के बाद अर्ध-निद्रित अवस्था में जिन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती?

बिजली हो या लिफ्ट — हर जगह बदहाली

बिजली की मोटी रकम हर महीने वसूली जाती है, पर 24×7 आपूर्ति एक सपना बनी हुई है। लिफ्टें रोज़ाना खराब हो जाती हैं। सुबह के ऑफिस टाइम में लोग 22वीं मंज़िल से पैदल उतरने को मजबूर हैं। बुजुर्गों के घुटनों में दर्द है, बच्चों के माता-पिता घबराते हैं, और कई निवासियों ने सांस फूलने जैसी स्वास्थ्य समस्याएं बताई हैं।

इसका असर सिर्फ स्वास्थ्य पर नहीं, सामाजिक संवाद और सामूहिकता पर भी पड़ता है। जब आप नीचे ही नहीं आ सकते, तो पड़ोसी से मिलना, किसी की मदद लेना या देना — सब बाधित हो जाता है।

यह सिर्फ एक सोसाइटी की बात नहीं है

ऐसी कहानियाँ केवल ‘दिव्यांश ओनिक्स’ की नहीं हैं। नोएडा, गुरुग्राम, दिल्ली और अन्य शहरों की तमाम हाउसिंग सोसाइटीज़ में यही मॉडल लागू है — ग्राहक से सेवा के नाम पर पैसा वसूलो, लेकिन जब सेवा देने की बारी आए, तो ‘घाटे’ का रोना रोकर बच निकलो। और बीच में फंसी रहती है वह मध्यमवर्गीय जनता — जिसने अपनी ज़िन्दगी की कमाई लगाई होती है।

और सरकार? क्या उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं?

जो सरकार रियल एस्टेट को नियंत्रित करने का दावा करती है — RERA कानून, नगर निगम, बिजली वितरण कंपनियाँ — वे इन बिल्डरों की जवाबदेही तय क्यों नहीं करतीं? कैसे इन बिल्डरों को सभी कागजात, सभी विभाग गुणवत्ता की सर्टिफिकेट दे देती है?

क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं कि वह नागरिकों को सुरक्षित, गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार सुनिश्चित करे?
क्या ऐसे बिल्डरों पर गुणवत्ताविहीन सेवाओं, अवैध वसूली और मनमानी के खिलाफ जांच और दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

अब भी देर नहीं हुई है?

जब पूंजीवाद की मार खा रहे लोग एक-दूसरे पर ही दोष मढ़ने लगें, नैतिक policing करने लगें, तो असली दोषी बच निकलता है।
जरूरत इस बात की है कि निवासी, मेंटेनेंस स्टाफ और अन्य कर्मचारी आपस में टकराने की बजाय मूल जवाबदेह व्यक्ति — बिल्डर और प्रबंध समिति — को कठघरे में खड़ा करें।

अगर आज यहाँ रह रही जनता आवाज़ उठाएं, तो यह सिर्फ ‘दिव्यांश ओनिक्स’ की लड़ाई नहीं होगी — यह एक सिस्टम को बदलने की शुरुआत हो सकती है।