पंजाब की बाढ़: पाँच कारणों से उपजा अभूतपूर्व संकट

अनीस आर खान, नई दिल्ली
साल 2025 के मानसून ने पंजाब के लिए एक भयावह आपदा का रूप ले लिया। कृषि प्रधान राज्य, जो भारत की खाद्य सुरक्षा का आधार माना जाता है, अचानक आई बाढ़ से कराह उठा। खेत पानी में डूब गए, गाँव उजड़ गए और लाखों लोग बेघर हो गए। आँकड़े बताते हैं कि लगभग 1,400 गाँव और साढ़े तीन लाख एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गई। यह सिर्फ एक प्राकृतिक त्रासदी नहीं थी, बल्कि हमारी विकास नीतियों और अव्यवस्थित शहरीकरण की पोल खोलने वाली एक मानवीय विफलता भी साबित हुई।
इस लेख में हम समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर किन पाँच बड़े कारणों ने इस बाढ़ को इतना विकराल रूप दिया। साथ ही यह भी देखेंगे कि इससे क्या सबक लिए जा सकते हैं।
- हिमालयी क्षेत्र में असामान्य और अत्यधिक वर्षा
पंजाब की नदियों का उद्गम हिमालय से होता है। इस बार मानसून ने सामान्य से कई गुना अधिक वर्षा हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में की। अचानक हुई इस भारी बारिश ने नदियों का जलस्तर बढ़ा दिया। सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम जैसी नदियाँ उफान पर आ गईं। पहाड़ी क्षेत्रों में जब बारिश अपेक्षा से अधिक होती है, तो निचले मैदानों में बसे राज्य सबसे पहले प्रभावित होते हैं। पंजाब का भौगोलिक ढांचा समतल है, इसलिए यहाँ पानी ठहर जाता है और बाढ़ की तबाही को और गहरा कर देता है।
- हिमनदों और बर्फ का पिघलना
भारी बारिश के साथ-साथ इस बार हिमनदों से पिघलता पानी भी बाढ़ में सहायक बना। जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ पिघलने की दर तेज़ हुई है। जब बर्फ पिघलने और बारिश—दोनों का असर एक साथ हुआ, तो नदियों पर अचानक भार बढ़ गया। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र किस तरह बदल रहा है। अगर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले सालों में ऐसी आपदाएँ और भी बार-बार देखने को मिल सकती हैं।

- डैमों से अतिरिक्त पानी छोड़ा जाना
पंजाब में बहने वाली नदियों पर बड़े-बड़े बांध बने हुए हैं। भाखड़ा, पोंग और रंजीत सागर जैसे डैम पूरे उत्तर भारत के लिए ऊर्जा और सिंचाई का आधार हैं। लेकिन इस बार ये डैम अपनी क्षमता से ज़्यादा भर गए। मजबूरी में इनके गेट खोलकर अतिरिक्त पानी छोड़ा गया। समस्या यह रही कि पानी छोड़ने की पूर्व चेतावनी और प्रबंधन पर्याप्त नहीं था। अचानक छोड़े गए पानी ने निचले इलाकों को डुबो दिया। इससे यह साफ़ हो जाता है कि डैम आपदा प्रबंधन के लिए जितने समाधान हैं, उतने ही जोखिम भी हैं अगर योजना और पूर्वानुमान कमजोर हो।
- जल निकासी की कमी और नदियों का अतिक्रमण
पंजाब जैसे राज्य में जहाँ खेती मुख्य आजीविका है, वहाँ खेतों से पानी निकालने के लिए मजबूत ड्रेनेज सिस्टम होना चाहिए। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। नदियों के किनारे अवैध निर्माण और अतिक्रमण ने पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किया। कई जगह नालियाँ जाम पड़ी थीं, जिनकी सफाई समय पर नहीं की गई। ड्रेनेज कॉलोनियों और गाँवों तक पहुँचने से पहले ही टूट गईं। परिणाम यह हुआ कि पानी निकलने की बजाय और जमा हो गया, जिससे गाँव तालाब में बदल गए। यह स्थिति दिखाती है कि बाढ़ सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि हमारी लापरवाह नीतियों का नतीजा भी है।
- अव्यवस्थित शहरीकरण और कमजोर बुनियादी ढाँचा
पंजाब का चेहरा अब सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। पिछले दो दशकों में यहाँ शहरीकरण तेजी से बढ़ा है। कस्बों और शहरों में अनियोजित कॉलोनियाँ खड़ी हो गईं, लेकिन सीवेज और नालियों का ढांचा वैसा ही पुराना रहा। जब इस बार बारिश का पानी शहरों में घुसा, तो निकलने का कोई रास्ता नहीं था। गलियाँ झील बन गईं और घरों में पानी भर गया। यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि विकास का मतलब सिर्फ इमारतें खड़ी करना नहीं, बल्कि टिकाऊ और सुरक्षित बुनियादी ढाँचा तैयार करना है।

बाढ़ के परिणाम
इस बाढ़ ने पंजाब को कई स्तरों पर चोट पहुँचाई है।
कृषि संकट: लाखों एकड़ धान और कपास की फसल नष्ट हो गई।
आवासीय नुकसान: हजारों घरों में दरारें आ गईं या वे पूरी तरह ढह गए।
सड़क और पुलों की तबाही: परिवहन ठप हो गया, जिससे राहत पहुँचाना मुश्किल हुआ।
मानवीय संकट: लाखों लोग विस्थापित होकर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए।
आर्थिक आघात: किसानों का कर्ज बढ़ा, छोटे व्यापार ठप हो गए और राज्य की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा।
प्राकृतिक आपदा या मानवीय विफलता?
अगर गहराई से देखा जाए, तो यह बाढ़ केवल “प्राकृतिक आपदा” नहीं थी। भारी वर्षा और हिमनदों के पिघलने जैसे कारण प्रकृति से जुड़े हैं। लेकिन डैम प्रबंधन, जल निकासी की विफलता और अतिक्रमण सीधे तौर पर हमारी प्रशासनिक और नीतिगत लापरवाही का परिणाम हैं। इसलिए इस आपदा को केवल प्रकृति पर दोष मढ़कर टाला नहीं जा सकता। यह हमारे विकास मॉडल की खामियों का आईना भी है।

निष्कर्ष और सबक
पंजाब की बाढ़ हमें चेतावनी देती है कि हमें अब आपदा प्रबंधन को “आपातकालीन काम” मानकर छोड़ना बंद करना होगा। यह एक दीर्घकालिक नीति का हिस्सा होना चाहिए।
कुछ आवश्यक कदम
नदियों और ड्रेनेज की नियमित सफाई व रखरखाव।
डैम प्रबंधन में तकनीकी सुधार और समय पर चेतावनी।
शहरीकरण की योजनाओं में जल निकासी और वर्षा प्रबंधन को प्राथमिकता।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए टिकाऊ कृषि और ऊर्जा नीतियाँ।
स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन में शामिल करना।
अंतिम शब्द
पंजाब की धरती ने हमेशा भारत को अन्न दिया है। लेकिन इस बार वही धरती पानी में डूबकर हमें यह सिखा गई कि अगर हम प्रकृति और विकास के बीच संतुलन नहीं बना पाए, तो आने वाले साल और भी भयावह हो सकते हैं। बाढ़ हमें केवल नुकसान ही नहीं देती, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि हमें अपनी नीतियों, योजनाओं और जीवनशैली को प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर ढालना होगा।