जात की राजनीति नहीं हुई है!!!

1989 के भागलपुर दंगे. ज्यादातर मुख्य आरोपी यादव थे. एक था कामेश्वर यादव. दंगों में मारे गए लोगों की लिस्ट में एक नाम था- मुन्ना. उसको एक भीड़ ने मारा था. पहले खूब पीटा, फिर गोली मार दी. मुन्ना की लाश तक नहीं मिली किसी को. इस हत्या का मुख्य आरोपी था कामेश्वर यादव. केस के मुताबिक, जिस भीड़ ने मुन्ना को क़त्ल किया उसका लीडर कामेश्वर ही था.

लालू का किला खड़ा करने में सबसे ज्यादा ईंटें यादवों और मुसलमानों ने लगाई थीं. यादव इसलिए कि लालू उनके जातवाले थे. मुसलमान इसलिए कि कांग्रेस के राज में, उसकी देखरेख में भागलपुर दंगा हुआ था. लालू के साथ जाने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं था. चूंकि ज्यादातर बड़े आरोपी यादव थे, सो लालू के राज में उनपर कार्रवाई हुई नहीं. इसकी एक मिसाल कामेश्वर यादव है. बिहार पुलिस ने उसपर चल रहा केस बंद कर दिया. कहा, सबूत नहीं हैं. बल्कि 2004 में बिहार पुलिस ने उसको सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने में योगदान देने के लिए सम्मानित किया.

फिर बिहार में सत्ता बदली. नीतीश आए. भागलपुर दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने का जो भी थोड़ा-बहुत काम हुआ, नीतीश ने ही किया. 2007 में इन्हीं नीतीश के राज में कामेश्वर यादव को अदालत ने सश्रम उम्रकैद की सज़ा दी. मुसलमानों ने फिर भी नीतीश पर कभी भरोसा नहीं किया. वो लालू के पीछे चलते रहे. नीतीश की सबसे बड़ी निराशाओं में ये भी है.

लोग कह रहे हैं, बिहार की जनता ने जाति को अंगूठा दिखा दिया है. यादव सबसे बड़े उदाहरण बताए जा रहे हैं इस बदले हुए ट्रेंड का. जनता की बात बाद में, पहले पार्टी देखते हैं. विपक्ष तो हारा है. आप जीतने वाले एनडीए के उम्मीदवार देखिए. हर जगह जातिगत आंकड़े देखकर उम्मीदवार खड़े किए गए. गिरिराज को नवादा से उठाकर बेगूसराय ही क्यों भेजा गया? क्या उनका भूमिहार होना कोई कारण नहीं? 2014 में नीतीश और बीजेपी अलग थे. तब जेडीयू के लल्लन सिंह को लोजपा की वीणा देवी ने हराया था. वीणा पत्नी हैं सूरजभान की. इस बार नीतीश साथ थे. लल्लन को मुंगेर से ही लड़ना था. भूमिहार हैं, भूमिहारों का इलाका है. तो लोजपा के कोटे की ये सीट उनको नवादा देकर कंपनसेट की गई. नवादा इसलिए कि वहां भी भूमिहारों का खेल है. टिकट मिला वीणा के देवर चंदन को. क्या ये जाति का खेल नहीं? दरभंगा से गोपाल जी ठाकुर ही क्यों? क्योंकि राजद के मुस्लिम प्रत्याशी के खिलाफ मैथिल ब्राह्मण का ही खेल फिट है वहां. या तो मुस्लिम चुना जाता है वहां, या मैथिल ब्राह्मण. कीर्ति आज़ाद भी झा थे. जब पार्टी ने जाति देखकर प्रत्याशी तय किए, तो जाति की पॉलिटिक्स कैसे नहीं हुई?

जाति की राजनीति ख़त्म नहीं हुई. अभी बस जाति से बड़ा फैक्टर उग्र राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को बना दिया गया. एन्टी-मुस्लिम सेंटिमेंट भी है ही. यादवों की मिसाल के लिए 1989 याद रखिए. वो राम जन्मभूमि आंदोलन का टाइम था. गांवों-शहरों में जुलूस निकला करते थे. ऐसे ही एक जुलूस से तब भागलपुर का दंगा भड़का था. और इसके सबसे बड़े कॉन्ट्रिब्यूटरों में यादव थे. कोई न कोई आइडेंटिटी तो हावी रहती ही है अपने यहां.

बाकी सब कुछ यही नहीं था. कुछ और भी गेम-चेंजर्स थे. मसलन- मोदी की इमेज बिल्डिंग, मार्केटिंग. और सबसे बढ़कर, ऐलिस इन वंडरलैंड हमारा बेकार विपक्ष.

स्वाति मिश्रा