चुनावी बांड: सत्ता, पारदर्शिता और प्रोफेसर जगदीप ए. छोकर की ईमानदारी।

राकेश कायस्थ
लोकतंत्र में चुनाव महज़ सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता और उसके प्रतिनिधियों के बीच भरोसे का रिश्ता होता है। इस भरोसे की सबसे अहम शर्त है पारदर्शिता। लेकिन जब चुनावी फंडिंग ही अपारदर्शी हो जाए, तो लोकतंत्र का आईना धुंधला हो जाता है। चुनावी बांड का मामला इसी धुंधलेपन का प्रतीक था। यह वह उपकरण था जिसने सत्ता और पूँजीपतियों के रिश्तों को पर्दे के पीछे छिपाने की कोशिश की। लेकिन इस व्यवस्था को चुनौती देने वाले भी सामने आए। उनमें सबसे अग्रणी नाम था प्रोफेसर जगदीप ए. छोकर और उनकी संस्था एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स)।
एक विवादास्पद योजना की कहानी।
साल 2017 में केंद्र सरकार ने चुनावी बांड योजना की घोषणा की। आधिकारिक तर्क यह दिया गया कि इससे चुनावी चंदे की व्यवस्था “साफ़-सुथरी” हो जाएगी क्योंकि पैसा नकद की बजाय बैंकिंग चैनल से आएगा। लेकिन असली पेंच था गोपनीयता का कवच। चंदा देने वाली कंपनी या व्यक्ति का नाम आम जनता को कभी नहीं पता चलना था। केवल सरकार और बैंक को यह जानकारी रहती कि किसने किस पार्टी को कितना पैसा दिया। यानी जनता, जिसके नाम पर लोकतंत्र चलता है, उससे यह सबसे ज़रूरी जानकारी छिपा ली गई। धीरे-धीरे खुलासे हुए कि इस योजना से सबसे बड़ा लाभ सत्ताधारी पार्टी को मिल रहा है। विपक्ष ने इसे “वैधानिक घोटाला” कहा। राजनीतिक विश्लेषकों ने साफ़ कहा कि चुनावी बांड ने सत्ता और पूँजी के गठजोड़ को और मज़बूत कर दिया।

अदालत की चौखट तक पहुँचा मामला।
जब लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत पर चोट हो रही हो, तो अदालत ही अंतिम उम्मीद होती है। एडीआर ने सात साल पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। सवाल था सीधा कि क्या जनता से राजनीतिक चंदे की जानकारी छिपाना संविधान के अनुरूप है? सुनवाई लंबी चली। सरकार ने हर बार यही दलील दी कि यह योजना पारदर्शिता लाने के लिए है और नकद चंदे की प्रवृत्ति खत्म करेगी। लेकिन सच्चाई यह थी कि चुनावी बांड ने केवल एक नई किस्म का “ग़ैर-कानूनी वैध चंदा” पैदा कर दिया।
सत्ता का प्रतिरोध और डर का माहौल।
मामले की सुनवाई के दौरान माहौल बेहद तनावपूर्ण रहा। सरकार पर सवाल उठाने वालों को आईटी सेल और समर्थक मीडिया की ओर से “विदेशी हाथ”, “एंटी-नेशनल टूलकिट” जैसे पुराने आरोपों से घेरा गया। सीबीआई और ईडी की छापेमारी की ख़बरें आम होने लगीं। यह माहौल विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं में डर पैदा करने के लिए पर्याप्त था। लेकिन प्रोफेसर छोकर जैसे लोग डर के आगे झुकने वाले नहीं थे।
प्रो. छोकर का सहज आत्मविश्वास।
इन्हीं दिनों एक यूट्यूबर ने उनसे सवाल किया कि “क्या आपको डर नहीं लगता कि ईडी आपके घर भी आ सकती है?” प्रो. छोकर मुस्कराए और बोले कि “आएंगे तो मैं उन्हें चाय पिलाकर भेज दूंगा। और मेरे घर से वे ले भी क्या जाएंगे?”
यह वाक्य सुनने में हल्का-फुल्का मज़ाक लग सकता है, लेकिन इसमें गहरी ताक़त छिपी थी। यह उस व्यक्ति की आवाज़ थी जिसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला।
आख़िरकार फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। अदालत ने चुनावी बांड को लोकतंत्र के लिए घातक बताते हुए रद्द कर दिया। साथ ही, उसने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को आदेश दिया कि बांड खरीदने वाली कंपनियों और व्यक्तियों के नाम सार्वजनिक किए जाएं। यह फ़ैसला केवल कानूनी जीत नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि लोकतंत्र में पारदर्शिता छिपाई नहीं जा सकती।
किस पार्टी को कितना चंदा मिला?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एसबीआई ने जिन आँकड़ों को सार्वजनिक किया, उनसे साफ़ हुआ कि चुनावी बांड योजना का सबसे बड़ा लाभ सत्ताधारी दल को मिला।
| पार्टी का नाम | कुल चंदा (चुनावी बांड से) |
|---|---|
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | ₹6,986.5 करोड़ |
| त्रिणमूल कांग्रेस (TMC) | ₹1,397 करोड़ |
| कांग्रेस (INC) | ₹1,334.35 करोड़ |
| भारत राष्ट्र समिति (BRS) | ₹1,322 करोड़ |
| बीजू जनता दल (BJD) | ₹944.5 करोड़ |
| डीएमके | ₹656.5 करोड़ |
| वाईएसआर कांग्रेस पार्टी | ₹442.8 करोड़ |
| तेलुगु देशम पार्टी (TDP) | ₹181.35 करोड़ |
| समाजवादी पार्टी (SP) | ₹14.05 करोड़ |
| लेफ्ट दल, बीएसपी, एआईएमआईएम | लगभग शून्य |
इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि चुनावी बांड योजना का लाभ असमान रूप से सत्ताधारी दल को मिला और विपक्षी दल कहीं पीछे रह गए।

प्रो. छोकर: एक सादा किंतु महान व्यक्तित्व।
प्रोफेसर जगदीप छोकर का जीवन किसी आंदोलनकारी नायक की तरह नहीं था। वे आईआईएम अहमदाबाद में प्राध्यापक रहे और शिक्षा जगत में उनकी पहचान मज़बूत थी। लेकिन उन्होंने अपनी ऊर्जा चुनाव सुधार जैसे कठिन और गैर-लोकप्रिय मुद्दे पर लगाई। एडीआर के ज़रिये उन्होंने चुनावी उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड, आय-व्यय और राजनीतिक दलों की फंडिंग की जानकारी जनता तक पहुँचाने का काम किया। उनका मानना था। कि “लोकतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार जनता का है। अगर जनता को सही जानकारी ही नहीं मिलेगी तो लोकतंत्र महज़ दिखावा बनकर रह जाएगा।”
ईमानदारी ही असली ताक़त।
प्रो. छोकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि भ्रष्टाचार से लड़ाई केवल अदालतों या संस्थाओं के दम पर नहीं जीती जा सकती।
यह लड़ाई तब असरदार होती है जब लड़ने वाला अपने निजी जीवन में पूरी तरह ईमानदार हो। उनकी सादगी, नैतिकता और निडरता ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी। यही वजह थी कि सत्ता के तमाम दबावों के बावजूद वे अपने रास्ते से नहीं हटे।
संयोग और प्रेरणा।
यह एक संयोग है कि प्रो. छोकर का निधन सीपीएम नेता सीताराम येचुरी की पहली पुण्यतिथि के दिन हुआ। येचुरी की तरह ही उन्होंने भी अपना शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए दान कर दिया। दोनों नेताओं ने अलग-अलग विचारधाराओं और क्षेत्रों से होकर भी समाज के प्रति वही संदेश छोड़ा “हमारा जीवन केवल हमारे लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और समाज के लिए है।”
लोकतंत्र की साँसें।
चुनावी बांड के ख़िलाफ़ आया सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला केवल एक योजना को रद्द करने का मामला नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की सांसों को ताज़गी देने वाला कदम है। और इस संघर्ष की पृष्ठभूमि में प्रो. छोकर जैसे लोग हैं, जिनकी ईमानदारी और समर्पण हमें यह भरोसा दिलाते हैं कि लोकतंत्र की जड़ें अब भी मज़बूत हैं।
प्रोफेसर जगदीप ए. छोकर और कामरेड सीताराम येचुरी को सादर नमन।