अमीर खान मुत्ताकी की ऐतिहासिक भारत यात्रा

अनीस आर खान

नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस के प्रांगण में जब अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्ताकी भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हाथ मिला रहे थे, तब इतिहास एक और करवट ले रहा था।
यह दृश्य सिर्फ दो देशों के बीच मुलाकात का नहीं था। यह उस संवाद की पुनःस्थापना थी, जो बीते चार वर्षों से अधर में लटकी हुई थी।

तालिबान युग के बाद पहली मंत्री-स्तरीय यात्रा।

9 से 16 अक्टूबर तक चलने वाली यह यात्रा, तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद भारत की धरती पर किसी अफगान मंत्री की पहली आधिकारिक मौजूदगी थी। मुत्ताकी, जो अभी भी संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में हैं, को इस यात्रा के लिए विशेष अनुमति मिली थी।
उनकी यह यात्रा मॉस्को फॉर्मेट कंसल्टेशन ऑन अफगानिस्तान के तुरंत बाद हुई। संकेत यह था कि अफगानिस्तान को लेकर क्षेत्रीय राजनीति में नई हलचल है।

भारत के लिए यह मुलाकात किसी औपचारिक मान्यता से कहीं अधिक व्यावहारिक कूटनीति (pragmatic diplomacy) का हिस्सा थी।
तीन अरब डॉलर से अधिक के विकास निवेश, मानवीय जुड़ाव और सुरक्षा चिंताओं ने भारत को यह सोचने पर मजबूर किया है कि तालिबान शासन से संवाद जरूरी है, भले ही उसे मान्यता न दी जाए।

भारत की तीन प्राथमिकताएं।

जयशंकर और मुत्ताकी की मुलाकात का एजेंडा स्पष्ट था।

  1. आतंकवाद पर नियंत्रण: भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अफगान धरती का इस्तेमाल किसी भी रूप में भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए न हो।
  2. भू-राजनीतिक संतुलन: पाकिस्तान और तालिबान के बीच हालिया तनाव भारत के लिए एक अवसर है कि वह अपनी कूटनीतिक पकड़ मजबूत करे और चीन जैसी शक्तियों के प्रभाव को सीमित रखे।
  3. मानवीय पहुंच: अफगानिस्तान के भीतर भारत की सहायता परियोजनाएं और राहत कार्य बिना रुकावट जारी रहें।

हैदराबाद हाउस की निर्णायक मुलाकात।

नई दिल्ली में हुई इस मुलाकात में कई अहम निर्णय लिए गए। सबसे बड़ा फैसला था। कि भारत अपने काबुल स्थित तकनीकी मिशन को पूर्ण दूतावास के स्तर पर उन्नत करेगा।
यह कदम तालिबान शासन को मान्यता नहीं देता, लेकिन यह एक स्पष्ट संकेत है कि भारत अब मौजूदगी और संवाद के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।

इसके जवाब में मुत्ताकी ने भी कहा कि अफगानिस्तान नई दिल्ली में अपना राजनयिक मिशन फिर से सक्रिय करेगा, भले ही शुरुआती स्तर पर राजदूत न भेजे जाएं।

सुरक्षा और साझा खतरे।

जयशंकर ने इस बैठक में सीमापार आतंकवाद पर कड़ा रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि भारत और अफगानिस्तान “संलग्न पड़ोसी” हैं — यह कथन कूटनीतिक रूप से बहुत मायने रखता है, क्योंकि यह पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर (PoK) पर भारत के दावे को अप्रत्यक्ष रूप से पुष्ट करता है।
मुत्ताकी ने भी भरोसा दिलाया कि अफगानिस्तान की धरती किसी अन्य देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने दी जाएगी।

बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि “दोनों देशों ने क्षेत्रीय देशों से उत्पन्न सभी आतंकी कार्रवाइयों की स्पष्ट निंदा की।”
यह बयान बिना नाम लिए पाकिस्तान को लेकर भारत की चिंता को दर्शाता है।

विकास, व्यापार और विश्वास।

भारत ने अफगानिस्तान के स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसंरचना क्षेत्रों में सहयोग जारी रखने का वादा किया। मुत्ताकी ने भारतीय कंपनियों को अफगानिस्तान के खनिज और खनन क्षेत्रों में निवेश के लिए आमंत्रित किया।

भारत की नई घोषणाएं:

  • अफगानिस्तान में छह नई विकास परियोजनाएं शुरू की जाएंगी।
  • 20 एम्बुलेंस, MRI और CT स्कैन मशीनें, टीके और कैंसर दवाइयां उपहार में दी जाएंगी।
  • भूकंप से प्रभावित इलाकों में आवासीय भवनों का पुनर्निर्माण कराया जाएगा।
  • अफगान शरणार्थियों के लिए मानवीय सहायता और खाद्यान्न वितरण जारी रहेगा।

मुत्ताकी ने भारत से ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना को तेज़ करने का आग्रह भी किया, ताकि पाकिस्तान को बाईपास कर भारत-अफगान व्यापार को नई दिशा दी जा सके।

संस्कृति और प्रतीकात्मक मुलाकातें।

राजनयिक वार्ताओं के अलावा मुत्ताकी ने भारत में कुछ सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों का भी दौरा किया। उन्होंने आगरा का ताजमहल देखा और उत्तर प्रदेश के दारुल उलूम देवबंद का भ्रमण किया।

देवबंद की यात्रा को कई विशेषज्ञों ने तालिबान की छवि सुधारने की कोशिश के रूप में देखा। मुत्ताकी ने इस दौरान कहा कि “भारत और अफगानिस्तान के संबंधों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।”

महिलाएं और प्रतिबंधित आवाज़ें।

हालांकि मुत्ताकी की यात्रा ऐतिहासिक कही जा रही है, पर यह विवाद से अछूती नहीं रही।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अफगान प्रतिनिधिमंडल द्वारा आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को प्रवेश नहीं दिया गया, जिससे भारत में तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं।
यह घटना यह याद दिलाती है कि तालिबान शासन में महिलाओं के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अब भी गहरी चिंता बनी हुई है।

भारत की व्यावहारिक नीति का नया अध्याय।

अमीर खान मुत्ताकी की यह यात्रा भारत की उस नई नीति का हिस्सा है जिसमें मानवीय कर्तव्य और रणनीतिक हितों को औपचारिक मान्यता से अलग रखा गया है।
भारत समझता है कि अफगानिस्तान को अलग-थलग छोड़ना किसी के हित में नहीं है — न अफगान जनता के, न क्षेत्रीय स्थिरता के।

यह यात्रा भारत के लिए सिर्फ एक कूटनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह संकेत थी कि “संवाद के बिना समाधान संभव नहीं।”

अंतिम विचार।

काबुल और नई दिल्ली के बीच यह नई बातचीत न तो आसान होगी और न ही शीघ्र परिणाम देगी।
परन्तु मुत्ताकी की यह यात्रा यह दिखाती है कि राजनय की डोर कितनी नाजुक होते हुए भी टिकाऊ हो सकती है।
भारत ने एक बार फिर यह साबित किया है कि दक्षिण एशिया की जटिल राजनीति में उसका रास्ता टकराव नहीं, बल्कि संवाद और विकास से होकर गुजरता है।