कामगारों और स्थानीय बाशिंदों का अनोखा आन्दोलन-शाहीन बाग़

शाहीन बाग़ की ओर से… एक अपील…
नापैद तिरे बहर – ए -तखय्युल के किनारे
पहुंचेंगे फलक तक तिरी आहों के सहारे
पिछले नौ दिनों से शाहीन बाग़ दिल्ली में CAA-NRC के विरोध में आुंदोलन का सबसे प्रभाशाली गढ़ बना हुआ है. समय की मांग है की हम अपने इस गढ़ को न केवल बनाये रखें बल्कि दिल्ली के हर इलाक़े में एक शाहीन बाग़ उठ खड़ा हो. सत्ता चाहती है हमें डराना, तोड़ना, कमज़ोर करना. हम चाहते हैं सारी ददल्ली में फ़ैल जाएँ. हर जगह हज़ारों रुंग के फूलों की तरह खिल उठें. हर गुन्चें शाहीन बाग़ बन कर.
जिस दिन जामिया में पुलिस का नंगा नाच हुआ उसी ददन से शाहीन बाग़- शाहीन बाग़ बन गया. कालिंदी कुंज मेट्रो से लेकर नोयडा, फरीदाबाद और दिल्ली को जोड़ने वाली सड़क का 3 किलोमीटर का फैलाव बैरेकेडों से घेर दिया गया. सड़क पूरी तरह ठप्प कर दी गयी. जो बैरेकड पुलिस ने आन्दोलन कारियों को रोकने के लिए लगा रखी थी उस पर लोगों ने कब्ज़ा किया और पुलिस को रोकने के लिए मजन-घेरेबंदी के इसका इस्तेमाल में लिया. यह शरुआती आन्दोलन के नए चरण की, नए रूप की. केवल प्रदर्शन और जुलूस से आगे निकल कर शहर पर कब्जे की तरफ. पुलिस और सत्ता की रणनीति को ध्वस्त करते हुए सच मुच नए जनतंत्र का क्रियान्वयन की ओर! सचमुच का कश्मीर दिल्ली के दिल में, सीने में धड़कने लगा. इलाक़े के नौजिानों के साथ आ खड़ी हुईं औरतें . औरतों ने सुंभाल ली कमान. मंच बना और मंच के इर्दगिर्द इलाक़े के कामगार-बाशिंदों ने डेरा डाल दल दिया. शिफ्टों में लोग पहरेदारी करने लगे. सामूहिक सहयोग का अपनाना लोगों को बाँधने लगा. रत और दिन मिल कर एक हो गए. हरेक बैरीकेड पर नौजिानों के हिरावल दस्ते हर किस्म के दमन अफवाह और RSS के गुंडों से शाहीन बाग़ की हिफाज़त के लिए जमे हुए हैं. बड़े-बड़े शो-रूम बंद हैं. लोग कहते हैं की यह सडक दिल्ली की किडनी है फिलहाल फ़ैल है.गुडगाँव और फरीदाबाद की कम्पनियां रूक गयी हैं. मगर चुप्पी साधे है. पर हड़ताल जारी है. खाना-पीना, सोना-जागना, हँसना-गाना,बात बहस जारी है. आज़ादी के तराने हवा में गूंज रहे हैं . नेता और पार्टी हलकान हैं. लोग स्वयं संगठित हैं , कोई नेता नहीं लोग स्वयं संगठित है केवल कामगार और बाशिंदे हैं. तैयार हैं लोग लाखों की संख्या में कभी भी इकठ्ठा होने के लिए. शाहीन बाग़ की जुझारू औरतें को सलाम- जब तक ये हैं ये हैं हमारा आन्दोलन कमज़ोर नहीं हो सकता.
दिल्ली के कामगार-बाशिंदे जहाँ कहीं भी भी हैं- चाहे वो सीलमपुर में हों, चाहे गोपिन्दपुरी में, चाहे पुरानी दिल्ली में या वजीरपुर में, चाहे जामिया नगर में हो या मुनिरका में, चाहे बदरपुर हो या कापसहेड़ा या निजामुद्दीन- अपनी-अपनी जगह पर कब्जे की लडाई को तेज करें. शाहीन बाग़ को मज़बूत करें. कब्ज़ा और सामूहिक हड़ताल. चक्का जाम और आपसी सहयोग. शहर रुकेगा नहीं तो मोदी -शाह झुकेगा नहीं! लडाई की रणनीति बनाए. आप सब का खैर-मकदम करने को, अपने अनुभव बांटने के लिए शाहीन बाग़ तैयार है….एक नयी सुबह की आशा में- शुक्रिया.