एम्स की धड़कन: हृदय रोग विभाग और उम्मीद की कतारें

लहर डेस्क, नई दिल्ली

दिल्ली की धूप से तपती सुबह। एम्स (AIIMS) के गेट नंबर एक के बाहर जब सूरज पूरी तरह नहीं निकला होता, तब भी भीड़ जुट चुकी होती है। कोई अपने कंधे पर बैग लटकाए है, कोई फाइलों का पुलिंदा पकड़े हुए, तो कोई स्ट्रेचर पर लेटे मरीज़ को धकेल रहा है। हर किसी की मंज़िल एक ही है—हृदय रोग विभाग की ओपीडी (Out Patient Department)।

भारत में जहाँ हर साल लाखों लोग दिल की बीमारियों से जूझ रहे हैं, वहाँ यह ओपीडी लाखों मरीजों के लिए उम्मीद की धड़कन बनी हुई है। लेकिन इस उम्मीद के साथ इंतज़ार, थकान और चुनौतियों की लंबी सूची भी जुड़ी है।

ओपीडी की व्यवस्था और भीड़ का मंजर

एम्स का हृदय रोग विभाग सप्ताह में दो से तीन दिन ओपीडी लगाता है। सुबह आठ बजे से शुरू होने वाली ओपीडी में मरीजों की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया भोर होते ही शुरू हो जाती है। दूर-दराज़ से आए लोग रातभर स्टेशन या अस्पताल परिसर में ही गुज़ारते हैं ताकि सुबह सबसे पहले उनकी बारी लग सके।

काउंटर पर लंबी कतारें और भीड़ का शोर किसी मेले की तरह लगता है। लेकिन यहाँ न संगीत है, न उल्लास—यहाँ है तो सिर्फ धड़कनों की चिंता। कोई बुज़ुर्ग कांपते हाथों से अपनी रिपोर्ट डॉक्टर को दिखा रहा है, कोई नौजवान अपने पिता को व्हीलचेयर पर धकेलते हुए पूछ रहा है कि और कितना इंतज़ार करना होगा।

दैनिक फुटफॉल का अंदाज़ा लगाइए: एम्स की कार्डियोलॉजी ओपीडी में रोज़ाना 1,000 से 1,500 मरीज आते हैं। इतनी भीड़ के बीच हर डॉक्टर पर कई सौ मरीज देखने का दबाव होता है।

मरीजों की कहानियाँ: संघर्ष और उम्मीद

बक्सर (बिहार) से आए रामनाथ यादव, जिनकी उम्र करीब 55 साल है, बताते हैं कि उन्हें पिछले महीने सीने में तेज़ दर्द हुआ था। स्थानीय अस्पताल ने उन्हें दिल्ली रेफर किया। यादव कहते हैं:
“गाँव में डॉक्टर ने कहा कि एंजियोग्राफी करनी होगी, लेकिन खर्च दो लाख बताया। यहाँ एम्स में वही जांच कुछ हज़ार में हो जाएगी। इसलिए चाहे जितना इंतज़ार करना पड़े, यहाँ आना ही पड़ा।”

राजस्थान के नागौर से आईं 40 वर्षीय सुमित्रा देवी बताती हैं कि उन्हें ब्लड प्रेशर और शुगर दोनों हैं। प्राइवेट क्लिनिक में दवाइयों का खर्च ही 2-3 हज़ार महीने का हो रहा था। एम्स में न सिर्फ इलाज सस्ता है, बल्कि डॉक्टर समय लेकर उनकी हर रिपोर्ट देखते हैं। “भीड़ तो बहुत है, लेकिन यहाँ भरोसा है कि सही इलाज मिलेगा।” इन कहानियों से साफ है कि एम्स सिर्फ दिल्ली या शहरी मरीजों का नहीं, बल्कि पूरे देश का अस्पताल है।

भारत में हृदय रोग अब एक राष्ट्रीय संकट बन चुका है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत में कुल मौतों में से लगभग 27% मौतें हृदय रोग (CVD) के कारण होती हैं। अनुमान है कि यह संख्या 2030 तक 36% तक पहुँच जाएगी।

विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, देश में लगभग 5.45 करोड़ लोग हृदय रोगों से पीड़ित हैं।

इंडियन हार्ट एसोसिएशन बताता है कि 50% से अधिक हार्ट अटैक मरीज 50 वर्ष से कम उम्र के होते हैं। पश्चिमी देशों में यह अनुपात बहुत कम है।

शहरी क्षेत्रों में यह बीमारी अधिक है, लेकिन अब यह तेजी से ग्रामीण इलाकों में भी पैर पसार रही है।

यह तस्वीर दिखाती है कि क्यों एम्स जैसे संस्थानों पर इतना दबाव है?

तकनीक और जांच की सुविधा

एम्स हृदय रोग विभाग में आधुनिकतम जांच और उपचार की सुविधा मौजूद है।

ईसीजी (ECG): दिल की धड़कन की लय मापने के लिए।

ईकोकार्डियोग्राफी: दिल की संरचना और पंपिंग क्षमता देखने के लिए।

स्ट्रेस टेस्ट: व्यायाम के दौरान दिल पर दबाव की जांच।

एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी: ब्लॉकेज की पहचान और इलाज।

यहीं नहीं, कई मामलों में मरीजों को तुरंत भर्ती कर लिया जाता है और गंभीर स्थिति में मुफ्त या रियायती दरों पर ओपन-हार्ट सर्जरी भी की जाती है।

तुलना कीजिए: जहाँ निजी अस्पतालों में एक ओपन-हार्ट सर्जरी का खर्च 2-5 लाख तक होता है, वहीं एम्स में यही प्रक्रिया कुछ हज़ार रुपये में हो जाती है।

लेकिन इस सारी व्यवस्था के बावजूद, सबसे बड़ी चुनौती है—भीड़ और इंतज़ार।

एम्स में एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी जैसी प्रक्रियाओं के लिए मरीजों को कई बार कई महीनों से लेकर एक साल तक इंतज़ार करना पड़ता है।

ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले मरीजों को यह समझना मुश्किल होता है कि पर्ची कहाँ बनेगी, कौन-सी कतार में लगना है और कौन-सी जांच कब होगी।

डॉक्टरों पर अत्यधिक दबाव है, और कभी-कभी मरीज़ों को बुनियादी जानकारी तक के लिए भटकना पड़ता है।

यही वजह है कि कई लोग इलाज से पहले ही थकान और असहाय महसूस करते हैं।

सरकारी नीतियाँ और हकीकत

भारत सरकार ने पिछले दशक में आयुष्मान भारत योजना और राष्ट्रीय हृदय रोग नियंत्रण कार्यक्रम जैसे प्रयास किए हैं। इन योजनाओं ने गरीबों को निजी अस्पतालों में भी इलाज का अवसर दिया है। लेकिन यह सच है कि समस्या कहीं गहरी है।

भारत में आज भी सिर्फ 4000 कार्डियोलॉजिस्ट हैं, जबकि जरूरत कम-से-कम 80,000 की है।

भारत में प्रति 10,000 की आबादी पर सिर्फ 0.23 कार्डियोलॉजिस्ट हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 20 गुना अधिक है।

करीब 70% डॉक्टर शहरी क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि देश की 65% आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है।

नतीजा यह है कि ग्रामीण भारत में शुरुआती जांच और रोकथाम की सुविधा लगभग न के बराबर है।

ऐसे में एम्स और कुछ अन्य प्रमुख संस्थान पूरे देश का बोझ उठा रहे हैं।

रोकथाम और जागरूकता: सबसे बड़ी दवा

एम्स के डॉक्टरों का मानना है कि अगर भारत में लोगों की जीवनशैली बदली जाए तो 50% से ज्यादा मौतें टाली जा सकती हैं।

नियमित व्यायाम और पैदल चलना

नमक, चीनी और तेल का सेवन सीमित करना

धूम्रपान और शराब से दूरी

समय-समय पर ब्लड प्रेशर और शुगर की जांच

सीने में दर्द या सांस फूलने जैसे शुरुआती लक्षणों को अनदेखा न करना

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) बताता है कि भारत में 15% से अधिक पुरुष और 18% महिलाएँ उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। यह आँकड़ा आने वाले खतरे की घंटी है।

धड़कनों का अस्पताल

दिल्ली एम्स का हृदय रोग विभाग सिर्फ एक अस्पताल नहीं, बल्कि यह पूरे देश की धड़कनों का केंद्र है। यहाँ हर कतार एक कहानी है—किसी किसान की, किसी मज़दूर की, किसी माँ की या किसी नौजवान की।

यहाँ भीड़ है, इंतज़ार है, थकान है- लेकिन इसके बावजूद यहाँ सबसे बड़ी चीज़ है उम्मीद। एम्स हमें यह याद दिलाता है कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में अभी भी असमानता और गंभीर चुनौतियाँ हैं। लेकिन जब तक ऐसे संस्थान मौजूद हैं, तब तक लाखों धड़कनें चलती रहेंगी।