“आई लव मोहम्मद” का नारा, कानपुर से उठा मुद्दा, पूरे देश में गूँजी बहस।

लहर डेस्क

एक साधारण-सा नारा, “आई लव मोहम्मद”, इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। यह नारा, जो पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्रति प्रेम और श्रद्धा का इज़हार भर था, अचानक इतना विवादास्पद हो जाएगा, शायद जुलूस निकालने वाले लोगों ने भी नहीं सोचा था।

घटना उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर से शुरू हुई। 12 रबीउल अव्वल, यानी पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जन्मदिन पर हर साल यहाँ जुलूस निकलता है। लेकिन इस बार जुलूस में लगे एक बैनर ने पूरे माहौल को बदल दिया। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—“आई लव मोहम्मद”

पहला टकराव, श्रद्धा और आपत्ति।

जुलूस में शामिल 21 वर्षीय इमरान ने बताया कि “हमने तो बस मोहब्बत जताई थी। हर साल जुलूस निकालते हैं, इस बार सोचा कि नए अंदाज़ में अपने नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इश्क़ जाहिर करें। बैनर बनवाया और सब मिलकर नारे लगाए।”

लेकिन जुलूस के कुछ ही घंटों में विवाद खड़ा हो गया। स्थानीय हिंदू संगठनों ने इसे “नई परंपरा” कहकर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यह धार्मिक दिखावा है और समाज में तनाव पैदा करने वाला कदम।

कानपुर के ही एक व्यापारी, सुनील अग्रवाल, ने कहा कि “हमारे शहर में दशकों से मोहर्रम और बारावफात के जुलूस निकलते आए हैं। कभी दिक़्क़त नहीं हुई। लेकिन जब नए-नए नारे और बैनर लाए जाते हैं, तो माहौल बिगड़ता है। प्रशासन को ध्यान रखना चाहिए।”

तनाव बढ़ा और पुलिस को बीच में आना पड़ा। मामला इतना बढ़ा कि आयोजकों पर एफआईआर दर्ज कर दी गई।

एफआईआर और गुस्से की लहर।

पुलिस का कहना था कि एफआईआर नारे के खिलाफ नहीं, बल्कि इसलिए है क्योंकि आयोजकों ने पारंपरिक मार्ग से हटकर जुलूस निकाला और बिना अनुमति के टेंट लगाए। कानपुर के डीसीपी दिनेश त्रिपाठी ने बयान दिया कि “आई लव मोहम्मद लिखे जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। कार्रवाई इसलिए हुई क्योंकि नई परंपराएँ शुरू की जा रही थीं। यह कानून-व्यवस्था के खिलाफ है।”

लेकिन मुस्लिम समुदाय इसे इस तरह नहीं देख रहा था। सोशल मीडिया पर हैशटैग #ILoveMuhammad ट्रेंड करने लगा। बरेली, लखनऊ, उन्नाओ से लेकर काशीपुर (उत्तराखंड) और हैदराबाद तक लोग सड़कों पर उतर आए।

बरेली के एक बुज़ुर्ग मौलाना ने कहा कि “पैग़ंबर से मोहब्बत जताना अगर गुनाह है तो फिर आस्था का मतलब ही क्या रह गया? पुलिस को सोचना चाहिए कि वह किसके दबाव में काम कर रही है।”

प्रदर्शन और टकराव।

देशभर में निकलते इन प्रदर्शनों ने कई जगह हिंसक रूप ले लिया। उन्नाव में पत्थरबाज़ी हुई, पुलिस की गाड़ियाँ तोड़ी गईं। वहीं लखनऊ और हैदराबाद में प्रदर्शन ज़्यादातर शांतिपूर्ण रहे, लेकिन पुलिस की कड़ी तैनाती ने माहौल को तनावपूर्ण बनाए रखा।

कानपुर के जुलूस में शामिल रही 22 वर्षीय छात्रा सायरा ने कहा कि “मैं पहली बार ऐसे माहौल में उतरी। हमने सोचा था कि नबी के लिए मोहब्बत का नारा लगाने में कौन-सी परेशानी होगी? लेकिन जब पुलिस आई और केस दर्ज किया, तो लगा जैसे हमारे अधिकार ही छीन लिए गए हों।”

संविधान बनाम ज़मीनी हकीकत।

भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। अनुच्छेद 19 और 25 इसकी गारंटी करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब कोई समुदाय खुलेआम अपनी आस्था जताता है, तो क्या उसे “नई परंपरा” कहकर रोका जा सकता है?

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस पूरे मामले की कड़ी निंदा की। उनका कहना था कि “आई लव मोहम्मद कहना अपराध नहीं हो सकता। यह हमारे संविधान के तहत हमारी आज़ादी का हिस्सा है। पुलिस बताये कि किस कानून के तहत यह केस दर्ज किया गया है।”

कानपुर के एक वकील, अदनान हुसैन, ने कहा कि “पुलिस की एफआईआर कमजोर है। अगर कोर्ट में चुनौती दी जाए तो यह टिकेगी नहीं। यहाँ मुद्दा कानून से ज़्यादा राजनीतिक है।”

राजनीति की बिसात।

उत्तर प्रदेश जैसे संवेदनशील राज्य में कोई भी धार्मिक विवाद राजनीतिक रंग ले लेता है। इस मामले में भी सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी समाजवादी पार्टी आमने-सामने आ गईं। भाजपा ने कहा कि प्रशासन केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए काम कर रहा है, जबकि सपा ने आरोप लगाया कि सरकार मुस्लिम विरोधी एजेंडा चला रही है।

लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर नीरज मिश्रा कहते हैं कि “ऐसे मुद्दे चुनावी राजनीति में तुरुप का पत्ता बन जाते हैं। एक तरफ बहुसंख्यक समुदाय को साधा जाता है, दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों की नाराज़गी से विपक्ष को सहानुभूति मिलती है। असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।”

ज़मीन की आवाज़ें।

तिलहर, कानपुर में एक स्थानीय चायवाले, रामनाथ, से जब पूछा गया कि वे इस विवाद को कैसे देखते हैं, तो उन्होंने कहा कि “भाई, मोहब्बत जताने में दिक़्क़त ही क्या है? लेकिन अगर उससे दंगा-फसाद होता है तो दोनों तरफ के लोगों को सोच-समझकर चलना चाहिए। हम तो चाहते हैं कि मोहब्बत ही फैले।”

वहीं कानपुर में रहने वाली 60 वर्षीय शकीला बेगम बोलीं कि “हमारे बुज़ुर्गों के ज़माने में भी जुलूस निकलते थे। कभी कोई लड़ाई नहीं हुई। अब हर बात पर राजनीति हो रही है। गरीब आदमी तो रोज़गार की सोचता है, नेताओं को सिर्फ धर्म चाहिए।”

सोशल मीडिया और नई पीढ़ी।

इस विवाद में सोशल मीडिया ने भी आग में घी डालने का काम किया। ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब पर “आई लव मोहम्मद” को लेकर वीडियो और पोस्ट वायरल हुए। जहाँ एक तरफ मुस्लिम नौजवान इसे ट्रेंड बनाकर अपनी आस्था जताने लगे, वहीं दूसरी ओर कुछ संगठनों के समर्थक इसे “धर्मांतरण एजेंडा” कहकर प्रस्तुत करने लगे।

कानपुर के कॉलेज छात्र रिज़वान कहते हैं कि “हमारे लिए यह सिर्फ एक इज़हार था। लेकिन जब हमने देखा कि पूरे देश में लोग इस पर बहस कर रहे हैं, तो लगा कि कहीं यह हमारी पीढ़ी की आवाज़ दबाने की कोशिश तो नहीं है?”

बड़ा सवाल।

“आई लव मोहम्मद” विवाद केवल एक बैनर का मामला नहीं है। यह सवाल है कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में लोग अपनी आस्था किस हद तक खुलेआम व्यक्त कर सकते हैं। क्या प्रशासन का काम लोगों की अभिव्यक्ति पर रोक लगाना है, या माहौल को सौहार्दपूर्ण बनाए रखते हुए सभी को जगह देना है?

सामाजिक कार्यकर्ता कविता जोशी कहती हैं कि “धार्मिक आस्थाओं की इज़्ज़त होनी चाहिए, लेकिन उन्हें राजनीति का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। अगर हर अभिव्यक्ति को ‘नई परंपरा’ कहकर रोका जाएगा, तो हमारे लोकतंत्र का भविष्य खतरे में है।”

एक नारा और एक सवाल।

कानपुर से शुरू हुआ यह विवाद आज पूरे देश में गूंज रहा है। “आई लव मोहम्मद” का नारा अब केवल श्रद्धा का इज़हार नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की एक बड़ी बहस का प्रतीक बन चुका है। एक ओर सरकार और प्रशासन हैं, जो कहते हैं कि कानून-व्यवस्था सबसे ज़रूरी है। दूसरी ओर वो लोग हैं जो मानते हैं कि अगर अपनी आस्था जताना भी अपराध बन गया, तो फिर संविधान का मतलब क्या रह जाएगा?

आख़िरकार, यह विवाद भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और सामाजिक ताने-बाने की परीक्षा है। क्या हमारा समाज इतनी विविधताओं के बावजूद एक-दूसरे की आस्थाओं को सम्मान देने का साहस रखता है? या फिर हर भावनात्मक अभिव्यक्ति राजनीतिक दंगल में बदल जाएगी?

कानपुर के एक युवा इमरान के शब्दों में “हमारा मक़सद सिर्फ मोहब्बत दिखाना था। लेकिन लगता है कि इस मुल्क में मोहब्बत जताना भी अब सियासत बन चुका है।”