अमेरिकी टैरिफ का भारतीय हीरा व चमड़ा उद्योगों पर संकट

अनीस आर खान, नई दिल्ली
जब भी दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अमेरिका और भारत व्यापारिक टकराव में आती हैं, तो उसके गहरे असर ज़मीनी स्तर पर महसूस होते हैं। हाल ही में अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ ने भारतीय उद्योगों की रीढ़ माने जाने वाले हीरा और चमड़ा उद्योग को हिला दिया है। यह सिर्फ एक व्यापारिक विवाद नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी और भारत की औद्योगिक स्थिरता से जुड़ा हुआ मुद्दा है। इस रिपोर्ट में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि इन टैरिफ़ों ने वर्तमान स्थिति को कैसे प्रभावित किया है, और यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो भविष्य किस दिशा में जा सकता है।
चमकते सपनों का धुंधला वर्तमान।
सूरत, जिसे दुनिया की हीरा पॉलिशिंग राजधानी कहा जाता है, इन दिनों गहरे संकट में है। यहाँ के वर्कशॉप्स में मशीनों की आवाज़ धीमी हो चुकी है और गलियों में बेरोज़गार मज़दूरों का सन्नाटा पसरा हुआ है। लगभग 25 लाख लोग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से हीरे के इस कारोबार से जुड़े हैं। लेकिन अमेरिकी टैरिफ लगने के बाद से लगभग 1 लाख लोगों की नौकरी जा चुकी है और पाँच लाख और लोगों की नौकरी पर खतरे की तलवार लटक रही है।
मज़दूरों की आवाज़।

सूरत डायमंड वर्कर्स यूनियन के उपाध्यक्ष भावेश टंक का कहना है कि “यह सिर्फ एक व्यापारिक टकराव नहीं है। हमें लगता है कि यह हमारे पूरे उद्योग को खत्म करने की एक साजिश है। लाखों परिवार जो पीढ़ियों से हीरे की कटाई-पॉलिशिंग के काम में लगे थे, अब उनके सामने रोज़ी-रोटी का संकट है। यह मानवता के खिलाफ एक कदम है।”
भविष्य की चुनौती।
अगर यही हालात बने रहे तो अगले पाँच वर्षों में सूरत का वह वैश्विक दबदबा, जिसने उसे हीरा उद्योग की धड़कन बनाया था, धुंधला पड़ सकता है। कई वर्कशॉप बंद होने की कगार पर हैं और युवा मज़दूर अब वैकल्पिक काम की तलाश में पलायन कर रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था, बल्कि वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति कमजोर हो सकती है।
चमड़ा उद्योग की पीड़ा।
कानपुर और आगरा का नाम सुनते ही चमड़े के जूते, बैग और बेल्ट की याद आती है। लेकिन अमेरिकी टैरिफ के बाद इन उद्योगों में गहरी दरार पड़ गई है। कानपुर में अकेले इस उद्योग को 2000 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हो चुका है। हजारों कारीगर, जो पीढ़ियों से चमड़े पर अपनी कारीगरी दिखाते थे, अब बेरोज़गार हो चुके हैं।
कारीगरों की स्थिति।

लेदर इंडस्ट्री से जुड़े जावेद इकबाल बताते हैं कि “पहले से ही मंदी की मार झेल रहे उद्योग को यह टैरिफ पूरी तरह से खत्म कर रहा है। हमारी फैक्ट्रियाँ बंद हो रही हैं। जिन कारीगरों के हाथों में हुनर था, उनके पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है। उनका भविष्य अंधकार में है।”
आगरा, जो कभी विदेशी पर्यटकों के लिए लेदर गुड्स का सबसे बड़ा केंद्र था, अब वहां दर्जनों फैक्ट्रियाँ ताले में जकड़ी खड़ी हैं। छोटे-छोटे वर्कशॉप्स बंद हो रहे हैं और कारीगर दिहाड़ी मज़दूरी करने को मजबूर हो रहे हैं।
भविष्य का खतरा।
यदि यह स्थिति जारी रही तो आने वाले दशक में भारत की लेदर इंडस्ट्री का ग्लोबल मार्केट शेयर 40% तक घट सकता है। इससे न केवल निर्यात पर असर पड़ेगा, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक अहम हिस्सा भी खो सकता है।
यह रोज़गार और समाज का संकट है।
इन उद्योगों के संकट को सिर्फ आंकड़ों में नहीं समझा जा सकता। यह उन लाखों परिवारों की कहानी है जिनकी पीढ़ियाँ इन उद्योगों पर निर्भर रही हैं। जब एक मज़दूर की नौकरी जाती है, तो उसका असर उसके बच्चों की पढ़ाई, परिवार के स्वास्थ्य और पूरे समाज पर पड़ता है। सूरत के हीरा मज़दूर और कानपुर के लेदर कारीगर दोनों की कहानी में एक समानता है। गहरी अनिश्चितता और टूटी हुई उम्मीदें। और यह स्थिति सिर्फ वर्तमान तक सीमित नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों पर भी असर डालेगी।
वैश्विक राजनीति और उद्योग की जंग।

अमेरिका के इन टैरिफ़ों को आर्थिक कदम माना जा सकता है, लेकिन कई विशेषज्ञ इसे भारत जैसे देशों की बढ़ती औद्योगिक ताकत को नियंत्रित करने का प्रयास भी मानते हैं।
भारत की प्रतिक्रिया।
भारत सरकार ने अभी तक कूटनीतिक रास्ते से समाधान निकालने की कोशिश की है, लेकिन वास्तविकता यह है कि जब तक वैकल्पिक बाजार नहीं खोजे जाते, तब तक नुकसान की भरपाई संभव नहीं होगी।
भविष्य की राजनीति।
आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि भारत अपने पारंपरिक उद्योगों को बचाने के लिए किस तरह के अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाता है। चीन, यूरोप और अफ्रीकी देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों को मज़बूत करना शायद इसका एक रास्ता हो।
संभावित समाधान और रास्ते।
नए बाजारों की खोज: हीरा और लेदर उद्योग को सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय यूरोप, अफ्रीका और मिडल ईस्ट में नए बाजार खोजने होंगे।
पारंपरिक हुनर को आधुनिक टेक्नोलॉजी से जोड़कर प्रतिस्पर्धा बढ़ाई जा सकती है।
केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे उद्योगों को सब्सिडी और प्रोत्साहन देना होगा ताकि संकट से जूझ रहे मज़दूरों को सहारा मिल सके।
कारीगरों का पुनः कौशल विकास: जो कारीगर बेरोज़गार हो चुके हैं, उन्हें नए कौशल सिखाकर वैकल्पिक उद्योगों में खपाया जा सकता है।
अमेरिकी टैरिफ ने भारत के दो अहम उद्योगों की जड़ें हिला दी हैं। लेकिन हर संकट एक अवसर भी लेकर आता है। सवाल यह है कि क्या भारत इस चुनौती को अवसर में बदल पाएगा? क्या सूरत के हीरे फिर से चमक पाएँगे और क्या कानपुर-आगरा का चमड़ा उद्योग अपनी पहचान बचा पाएगा?
यह भविष्य पर निर्भर करता है कि भारत की नीतियों पर, कारीगरों की जिजीविषा पर और वैश्विक राजनीति के उतार-चढ़ाव पर। अभी तस्वीर धुंधली है, लेकिन अगर सही कदम उठाए गए तो यह धुंधलापन एक नई रोशनी में बदल सकता है।