वोटर अधिकार यात्रा से बदलती उम्मीदें।

बिहार की जनता का मूड।
पटना से अनीस आर खान की विशेष रिपोर्ट।
बिहार का राजनीतिक इतिहास उतना ही समृद्ध है जितना इसकी सांस्कृतिक धरोहर। यह वही भूमि है जहाँ बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया और जहाँ से जेपी आंदोलन जैसी ऐतिहासिक क्रांतियाँ उठीं। लेकिन आज के बिहार को देखकर एक ही सवाल उभरता है कि क्या यहाँ की जनता को वह विकास और सम्मान मिला, जिसका वे दशकों से इंतज़ार कर रहे हैं? चुनावी माहौल में यह सवाल और भी तेज़ी से उठ रहा है। इस बार जनता के मूड का केंद्र है बेरोज़गारी, शिक्षा और रोज़गार। गाँव से लेकर शहर तक हर जगह यही मुद्दे लोगों की ज़ुबान पर हैं।
बदलता जनमत
2005 में जब नीतीश कुमार सत्ता में आए, तो जनता ने राहत की सांस ली। जंगलराज से निकलकर ‘सुशासन बाबू’ की छवि बनी। सड़कें बनीं, बिजली आई और पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण मिला।
लेकिन बीते एक दशक में तस्वीर बदली है।
विकास की गति ठहर-सी गई।
भ्रष्टाचार और तंत्र की धीमी कार्यप्रणाली से जनता निराश है।
शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में ठोस बदलाव नहीं दिखा।
आज हालात यह हैं कि लोग कहते हैं कि “सड़क और बिजली मिली, लेकिन नौकरी कहाँ है?”
बेरोज़गारी की त्रासदी।

बेरोज़गारी बिहार की सबसे बड़ी समस्या है। आँकड़े बताते हैं कि यहाँ की बेरोज़गारी दर राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है। CMIE की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में बेरोज़गारी दर 2023 में करीब 12% थी, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 8% के आस-पास रही। हर साल लाखों युवा ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन पूरी करते हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त नौकरियाँ नहीं हैं।
गाँव से उदाहरण।
सीवान जिले का रंजीत कुमार, जिसने बी.एड. किया है, पिछले पाँच साल से शिक्षक भर्ती की प्रतीक्षा कर रहा है। वह कहता है कि “मेरे पास डिग्री है, पर नौकरी नहीं। मैं दिल्ली जाकर ट्यूशन पढ़ाता हूँ। गाँव में रहकर गुज़ारा ही नहीं हो सकता।” ऐसी कहानियाँ हर गाँव में मिल जाती हैं।
शिक्षा की जर्जर स्थिति।
बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा में आज भी कई स्कूल बिना पर्याप्त शिक्षकों के चल रहे हैं। कई जगह बच्चों को मिट्टी के फर्श पर बैठना पड़ता है। उच्च शिक्षा संस्थानों की हालत और भी खराब है सेशन लेट, परीक्षा में देरी और रिज़ल्ट आने में सालों लगना आम बात है।
एक माँ की कहानी।
दरभंगा की रहने वाली उषा देवी बताती हैं कि “मैंने अपनी बेटी को गाँव के सरकारी स्कूल से निकालकर शहर के प्राइवेट स्कूल में डाल दिया। फीस बहुत ज़्यादा है, लेकिन वहाँ कम से कम पढ़ाई तो होती है। सरकारी स्कूल में न शिक्षक आते थे, न पढ़ाई।” यह स्थिति केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे रोज़गार और भविष्य की संभावनाओं पर असर डालती है।
रोज़गार और पलायन।

बिहार से पलायन कोई नई बात नहीं है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में यह और बढ़ गया है। अनुमान है कि हर साल लगभग 20 लाख लोग बिहार से अन्य राज्यों में रोज़गार के लिए जाते हैं। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र बिहारियों की मज़दूरी के बिना अधूरे हैं।
मुंबई का अनुभव।
मुंबई की एक निर्माण कंपनी में काम करने वाले मोतिहारी के शिवकुमार कहते हैं कि “हम यहाँ मजदूरी करके परिवार चलाते हैं। गाँव में काम नहीं है। बच्चों को पढ़ाना है तो बाहर आना ही पड़ता है। लेकिन दिल तो हमेशा गाँव में ही रहता है।” पलायन बिहार की सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करता है। गाँवों में बुजुर्ग और महिलाएँ अकेली रह जाती हैं, जबकि युवा पुरुष रोज़गार के लिए बाहर भटकते रहते हैं।
महिलाएँ: बदलाव की धुरी।

बिहार की महिलाएँ राजनीति और समाज दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। पंचायतों में 50% आरक्षण ने उन्हें नेतृत्व की नई पहचान दी है। लेकिन जब उनकी रोज़मर्रा की स्थिति पर ध्यान दिया जाए तो समस्याएँ साफ़ दिखती हैं कि स्वास्थ्य सुविधाएँ बहुत कमजोर हैं। मातृ मृत्यु दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है। शिक्षा के बावजूद रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी बेहद कम है।
महिलाओं की राय।
पटना जिले की मंजू देवी कहती हैं कि “हमने नेता को वोट दिया था कि गाँव में अस्पताल बनेगा। लेकिन आज भी प्रसव के लिए हमें जिला अस्पताल भागना पड़ता है। क्या यही विकास है?” फिर भी महिलाएँ अब ज्यादा मुखर हो गई हैं। वे साफ़ कह रही हैं कि वोट सिर्फ जाति या धर्म देखकर नहीं, बल्कि काम देखकर देंगे।
युवाओं की बेचैनी।
बिहार की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है। 15 से 35 साल के बीच की यह आबादी ही राज्य के भविष्य की धुरी है। लेकिन यही वर्ग सबसे ज्यादा निराश और नाराज़ है।
सरकारी नौकरियों की भर्तियों में देरी और रद्दीकरण युवाओं को मानसिक दबाव में डाल रहा है।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हज़ारों विद्यार्थी पटना जैसे शहरों में संघर्ष कर रहे हैं।
कई छात्रों ने आत्महत्या तक कर ली है क्योंकि उन्हें नौकरी की कोई आशा नहीं दिखी।
छात्र आंदोलन।
पिछले वर्षों में शिक्षक भर्ती और रेलवे परीक्षाओं को लेकर छात्रों का गुस्सा सड़कों पर दिखा। यह गुस्सा अब धीरे-धीरे चुनावी बहस में बदल रहा है।
गाँव की जमीनी हकीकत।

गाँवों में विकास की बातें अक्सर अधूरी रह जाती हैं।
कई जगह अब भी कच्ची सड़कें और टूटी पुलिया हैं।
बिजली आई है, पर कटौती आम है।
स्वास्थ्य केंद्र नाममात्र के बने हैं।
ग्रामीण शिकायत।
भागलपुर के एक किसान ने कहा कि “सड़क बनी तो है, लेकिन हर बारिश में टूट जाती है। नेता वादा करते हैं कि ‘डबल इंजन की सरकार’ है, लेकिन गाँव की हालत आज भी वही की वही है।”
विशेषज्ञों की राय।
- राजनीति विज्ञानियों का मानना है कि बिहार की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यहाँ शिक्षा और रोज़गार पर दीर्घकालिक नीति नहीं बनी।
2. अर्थशास्त्री कहते हैं कि जब तक निवेश और उद्योग नहीं आएँगे, तब तक बेरोज़गारी और पलायन रुकना मुश्किल है।
3. सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि महिलाओं और युवाओं की भूमिका इस बार निर्णायक होगी।
उम्मीद और आक्रोश के बीच बिहार।
राहुल गांधी की यात्रा के बाद बिहार की जनता आज एक दो राहे पर खड़ी है। एक तरफ बेरोज़गारी, शिक्षा, सुरक्षा और विकास की धीमी गति को लेकर नाराज़गी है। तो दूसरी तरफ उम्मीद है कि शायद इस बार बदलाव की लहर कुछ नया कर दिखाए। महिलाओं और युवाओं की राय इस बार निर्णायक भूमिका निभा सकती है। सवाल यही है कि क्या यह गुस्सा और बेचैनी वोट में बदल पाएगी, या फिर पुराने समीकरण ही कायम रहेंगे ???