बेरोज़गार दिवस: जब युवाओं ने प्रधानमंत्री का जन्मदिन विरोध के रूप में मनाया

लहर डेस्क

17 सितम्बर 2025। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन। आमतौर पर इस दिन भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक बड़े पैमाने पर उत्सव मनाते हैं। कहीं सेवा कार्य होते हैं, कहीं रक्तदान शिविर, तो कहीं केक काटकर बधाइयाँ दी जाती हैं। लेकिन इस बार कुछ अलग था। देश के एक बड़े हिस्से में युवाओं के समूहों ने इस दिन को “बेरोज़गारी दिवस” के रूप में मनाया। यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि देश की बढ़ती बेरोज़गारी की समस्या पर ध्यान खींचने का एक सशक्त प्रतीक था।

विरोध का स्वरूप।

सुबह से ही ट्विटर, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर #NationalUnemploymentDay और #बेरोजगार_दिवस जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। हजारों युवाओं ने अपनी कहानियाँ साझा कीं कि किस तरह वर्षों की पढ़ाई और तैयारी के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिल रही, कैसे परिवार का दबाव बढ़ता जा रहा है, और किस तरह बेरोज़गारी ने उनके सपनों को अधूरा छोड़ दिया। कई जगह छोटे-छोटे समूहों ने प्रतीकात्मक धरने भी किए। कुछ ने खाली प्लेट लेकर तस्वीरें डालीं, तो कुछ ने हाथ में डिग्री लेकर पोस्ट किया। “डिग्री है, नौकरी नहीं।” यह विरोध पूरी तरह से डिजिटल और शांतिपूर्ण था, लेकिन इसका असर व्यापक था।

युवाओं की आवाज़।

जयपुर के 25 वर्षीय अभिषेक शर्मा, जिन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है, कहते हैं कि “हमारे माता-पिता ने लाखों रुपए खर्च किए, उम्मीद थी कि नौकरी मिलेगी। लेकिन चार साल से घर पर बैठे हैं। सरकारी नौकरी के विज्ञापन आते ही नहीं, और प्राइवेट सेक्टर में इतनी कम सैलरी मिलती है कि उससे जीवनयापन मुश्किल है।” दिल्ली की रहने वाली सुनीता कुमारी, जिन्होंने शिक्षक भर्ती की तैयारी की थी, बताती हैं कि “हर साल भर्ती परीक्षा की तारीख बदल जाती है। कई बार तो परीक्षा ही नहीं होती। इस बीच हमारी उम्र निकल रही है। हम युवा जाएँ तो कहाँ जाएँ?” ऐसी हजारों आवाज़ें सोशल मीडिया पर गूँज रही थीं। विरोध केवल एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि पीड़ा का सामूहिक इज़हार था।

बेरोज़गारी का संकट।

भारत की पहचान अक्सर “युवा देश” के रूप में की जाती है। यहाँ की आबादी का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा 35 वर्ष से कम आयु का है। यह जनसांख्यिकीय लाभ यदि रोज़गार में न बदले तो वही वरदान अभिशाप बन जाता है। पिछले कुछ वर्षों में बेरोज़गारी दर लगातार चर्चा का विषय रही है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में देश की बेरोज़गारी दर औसतन 8% के आसपास रही, जबकि युवाओं (15-29 आयु वर्ग) में यह दर और भी ज़्यादा थी। ग्रामीण इलाकों में खेती पर निर्भरता अब भी बनी हुई है, लेकिन वहाँ भी मशीनों और बदलते मौसम के कारण रोज़गार सीमित होता जा रहा है।

सरकार की पहलें और सवाल।

प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने युवाओं के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टार्ट-अप इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, और ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’। इनका मक़सद था युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करना और आत्मनिर्भरता बढ़ाना। लेकिन युवाओं का सवाल है कि इन योजनाओं से वास्तविक लाभ कहाँ है? कागज़ पर योजनाएँ बड़ी लगती हैं, लेकिन ज़मीन पर उतनी नौकरियाँ पैदा होती दिखाई नहीं देतीं। स्टार्टअप्स के लिए पूँजी जुटाना कठिन है, और स्किल ट्रेनिंग के बाद भी कंपनियाँ नौकरियों की गारंटी नहीं देतीं।

एक युवा ने सोशल मीडिया पर लिखा: “हमने ‘स्किल इंडिया’ से ट्रेनिंग ली। लेकिन नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं। आखिर कब तक हम सिर्फ़ ट्रेनिंग ही लेते रहेंगे?”

व्यक्तिगत संघर्ष की कहानियाँ।

बुंदेलखंड की रुखसाना, जिसने स्नातकोत्तर तक पढ़ाई की है, बताती हैं कि “परिवार उम्मीद करता है कि मैं पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी करूँ। लेकिन पिछले पाँच साल से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अलावा कुछ नहीं कर पा रही। घरवालों का भी धैर्य टूट रहा है।” पटना के रमेश कुमार, जिन्होंने ITI से डिप्लोमा किया, कहते हैं कि “सरकार कहती है कि ITI पास छात्रों की बहुत डिमांड है। लेकिन हमें न फैक्ट्री में काम मिल रहा है, न किसी प्राइवेट कंपनी में। छोटी-मोटी दिहाड़ी करके जीवन चलाना पड़ रहा है।” इन कहानियों से साफ़ है कि समस्या केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि करोड़ों युवाओं के जीवन की हकीकत है।

सोशल मीडिया की ताक़त।

विरोध की सबसे बड़ी विशेषता थी कि यह पूरी तरह सोशल मीडिया पर केंद्रित था। युवाओं ने वीडियो, मीम्स, कार्टून और नारे बनाकर साझा किए। कहीं प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ ‘Happy Unemployment Day’ लिखा गया, तो कहीं युवाओं ने अपनी डिग्री की कॉपी दिखाते हुए ‘बेकार हूँ, दोषी कौन?’ जैसे सवाल उठाए।

युवाओं की यह नाराज़गी मुख्यधारा मीडिया तक भी पहुँची। कई अख़बारों और न्यूज़ चैनलों ने इस पर विशेष कवरेज किया। यह साबित करता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक हस्तक्षेप का भी ज़रिया है।

राजनीति और बेरोज़गारी।

बेरोज़गारी का मुद्दा हमेशा से चुनावी राजनीति में बड़ा रहा है। विपक्षी दलों ने इस आंदोलन का समर्थन किया और सरकार पर निशाना साधा। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने ट्वीट किया कि “प्रधानमंत्री का जन्मदिन अब बेरोज़गारी दिवस बन गया है। यह युवाओं की हताशा का प्रतीक है।”

हालाँकि, भाजपा के नेताओं ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया और कहा कि सरकार लगातार रोजगार सृजन के लिए काम कर रही है। उन्होंने मेक इन इंडिया के तहत निवेश बढ़ने और स्टार्ट-अप इंडिया से नए अवसर पैदा होने का दावा किया। लेकिन युवाओं की नाराज़गी को नकारना आसान नहीं है।

विशेषज्ञों की राय।

आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि बेरोज़गारी की समस्या केवल सरकारी योजनाओं से हल नहीं हो सकती। इसके लिए औद्योगिक निवेश, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने और शिक्षा प्रणाली में सुधार की ज़रूरत है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कहते हैं कि “हमारे देश में शिक्षा और रोज़गार के बीच गहरी खाई है। छात्र डिग्री तो ले रहे हैं, लेकिन उद्योग की ज़रूरत के हिसाब से कौशल नहीं है। साथ ही, पर्याप्त औद्योगिक अवसर भी नहीं हैं। जब तक यह संतुलन नहीं बनेगा, बेरोज़गारी बनी रहेगी।”

मानसिक स्वास्थ्य पर असर।

बेरोज़गारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य को भी गहराई से प्रभावित करती है। कई सर्वे बताते हैं कि लंबे समय तक बेरोज़गार रहने वाले युवाओं में अवसाद, चिंता और आत्मविश्वास की कमी बढ़ जाती है। सोशल मीडिया पर साझा की गई कई पोस्टों में युवाओं ने लिखा कि वे हताशा और निराशा से जूझ रहे हैं।

आगे की राह।

बेरोज़गारी दिवस मनाने का यह कदम एक प्रतीक है, लेकिन इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि नीति-निर्माता इस संदेश को गंभीरता से लें।

शिक्षा प्रणाली में सुधार: डिग्री आधारित शिक्षा के बजाय कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा।

औद्योगिक निवेश: छोटे और मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन, जिससे बड़े पैमाने पर नौकरियाँ पैदा हों।

ग्रामीण रोजगार: कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में वैकल्पिक रोज़गार।

पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया: सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में देरी और भ्रष्टाचार पर रोक।

17 सितम्बर 2025 का दिन भारत की राजनीति और समाज में लंबे समय तक याद किया जाएगा। जब प्रधानमंत्री का जन्मदिन उत्सव और सेवा कार्यों से अधिक, युवाओं की नाराज़गी का प्रतीक बन गया। यह विरोध केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि उस गहरी बेचैनी का संकेत है जो भारत के युवाओं के दिलों में पल रही है।

अगर इस बेचैनी को अनसुना किया गया तो यह केवल डिजिटल नाराज़गी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सड़कों तक भी पहुँचेगी। और अगर सरकार ने इसे अवसर मानकर ठोस कदम उठाए, तो यही ऊर्जा देश को नई दिशा भी दे सकती है।

भारत का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में है। लेकिन जब वही युवा बेरोज़गारी के बोझ तले दबे हों, तो भविष्य अधूरा ही लगता है। बेरोज़गारी दिवस हमें यही याद दिलाता है कि विकास के वादों की असली कसौटी रोज़गार है।