बुंदेलखंड में राशन कार्ड है, लेकिन राशन नहीं: तकनीक समाधान नहीं समस्या का कारण

पीडीएस में तकनीक की दीवार, न अंगूठा चले, न पेट भरे
लेखक: अनीस आर खान, न्यू दिल्ली
“मेरे पांच बच्चे हैं कमाने वाला कोई भी नहीं है। सरकारी राशन लेने जब भी जाओ तो मना कर दिया जाता है कभी कहा जाता है कि नेटवर्क नहीं आ रहा है, तो कभी कहते हैं कि तुम्हारा अंगूठा काम नहीं कर रहा है, कभी कहते हैं कि राशन अभी नहीं आया है। अब आप ही बताइए मैं क्या करूं? अपने बच्चों को कहां से खिलाऊँ? गरीबी में बुरा हाल है” यह शब्द हैं बुंदेलखंड के जिला पन्ना की एक महिला के। ध्यान रहे कि मध्य प्रदेश के 6 जिले बुंदेलखंड का हिस्सा हैं जिसमें से एक पन्ना भी है। पन्ना शहर के निवासी और पत्रकार श्री हिम्मत खान ने बताया कि “यह समस्या पन्ना के ग्रामीण क्षेतरों में आम है। कभी नेटवर्क नहीं आता, तो कभी लोगों का अंगूठा काम नहीं करता है जिसकी वजह से ग़रीब लोगों को उनके अधिकार का राशन नहीं मिल पाता है कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनका राशन कार्ड ही नहीं बन पाया है। जिसके कारण लोग बेहाल हैं। राशन भी दो प्रकार के मिलते हैं एक अंतोदय कहलाता है जिसमें एक व्यक्ति है तो भी 35 किलो अनाज मिलता है और दूसरे कार्ड पर प्रति व्यक्ति 5 किलो अनाज दिया जाता है जिसमें से भी अधिकतर पूरा 5 किलो अनाज नहीं दिया जाता। ऐसी हालत में लोगों को अपने बच्चों का सम्मान के साथ पेट भरने में काफी समस्याएं आती हैं।” स्थानीय पत्रकार अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि पहाड़ी क्षेत्र, कम आबादी, सवारी का कोई खास इंतेजाम नहीं होना और ऐसे मे राशन डिपो के दूर होने के कारण बहुत से बुजुर्ग अपने हिस्से का राशन भी नहीं ले पाते हैं।

आप जानते होंगे कि बुंदेलखंड लगभग 70,747 km² में फैला हुआ है, जिसमें मुख्यतः उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिले शामिल हैं। उत्तर प्रदेश मे बुंदेलखंड क्षेत्र के सात जिले इस प्रकार हैं झाँसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट हैं जबकि मध्य प्रदेश के 6 जिले इस प्रकार हैं टीकमगढ़, निवाड़ी (नया जिला, 2018 में बना, पहले टीकमगढ़ का हिस्सा था) छतरपुर, पन्ना, सागर और दतिया शामिल हैं।
गरीबी की स्थिति : उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दत्तिया, टीकमगढ़, पन्ना में गरीबी दर 50% है जबकि चित्रकोट, दमोह, जिले में भी यह 50 % से ऊपर है। जनसत्ता के अनुसार ग्रामीण बुंदेलखंड में 43% गांवों में ग्रामीण गरीबी व कुपोषण उच्च स्तर पर पाया गया; यह पश्चिमी यूपी (31 %) की तुलना में काफी अधिक है। क्षेत्र में औसतन 30% से अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है मध्य प्रदेश भाग में यह दर कमी के बाद भी औसतन इतनी ही बनी हुई है।
गरीबी का मुख्य कारण : क्षेत्र की आर्थिक नींव मुख्यतः कृषि-आधारित है, जिनके अल्प जलवायु, औसत से काफी काम वर्षा , प्राकृतिक सिंचाई, छोटे भूखंड और कम उत्पादकता से प्रभावित होती है। लगातार सूखे, भूस्खलन और बुरे सिंचाई ढांचे ने कृषि आर्थिक गतिविधियों में गिरावट लाई है। अपर्याप्त औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र निवेश के कारण रोजगार के अवसर सीमित हैं। जिससे दैनिक मजदूरी, मजदूरी आधारित पलायन और अस्थायी आय बढ़ रही है।
बुंदेलखंड में भारी पलायन दर : हर वर्ष 50 से 70% घरों से पलायन होता है। अगर संख्या में बात करें तो पिछले दो दशक में 62 लाख—मुख्य रूप से कृषि संकट, सूखा, रोजगार की कमी, कर्ज और सामाजिक विषमताओं से तंग आकर लोगों ने पलायन किया है। गाँव कनेक्शन और बुंदेलखंड डॉट इन के अनुसार 2002 के सर्वेक्षण (BPL डेटा) के मोताबिक इस क्षेत्र के ग्रामीण घरों में से लगभग 50 से 70% में कम से कम एक सदस्य सालाना या स्थायी रूप से पलायन करता है। साथ ही 30 से 50% घरों में कामकाजी वयस्क पलायन करते हैं। 2016 मे खबर लहरिया द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार सिर्फ चित्रकूट जिले के 24 गावों में यह देखा गया कि एक दशक में पूरा गाँव खाली हो गया। पहले जहाँ 2006 में प्रति घर एक व्यक्ति पलायन करता था, 2016 में गाँव के लगभग सारे निवासी पलायन करने लगे। वहीं वर्ष 2020 में महोबा जिले के दमौरा गाँव के 432 परिवारों में से 100 से अधिक लगभग 40 % परिवार पलायन कर गए। वर्ष 2017 के भारतीय रेलवे के आँकोड़ों के अनुसार 2017 में MP बुंदेलखंड के कई जिलों में रबी फसल में लगभग आधे की कमी से प्रभावित किसानों को रोजगार न मिलने पर दैनिक 1500 से 2000 लोग शहरों की ओर पलायन करते देखे गए। ऐसे में खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की महत्वता बढ़ जाती है।
आइए एक नजर डालते हैं कि यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली क्या है और बुंदेलखंड में कैसे काम कर रही है?
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) क्या है? : सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) , खाद्य सुरक्षा कानून 2005 के तहत भारत सरकार की जिम्मेदारी जिसके माध्यम से गरीब और ज़रूरतमंद परिवारों को अनाज और आवश्यक वस्तुएँ सस्ती दरों पर राशन दुकानों (Fair Price Shops) के माध्यम से प्रदान की जाती हैं। इसका प्रबंधन उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इस के अंतर्गत वितरित की जाने वाली वस्तुओं में गेहूं, चावल, चीनी, मिट्टी का तेल आदि शामिल हैं। इस को दो भागों में बांटा गया है। इस के लाभार्थी में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले (BPL) परिवार और अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के तहत आने वाले अत्यंत गरीब परिवार शामिल हैं। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित किया जाये, गरीबों को सस्ता राशन उपलब्ध किया जाये, भुखमरी और कोपोषण को रोका जाये।

PDS और टेक्नोलॉजी – मुख्य समस्याएँ:
- आधार बायोमेट्रिक और इंटरनेट अक्षम्यताएँ: POS व Aadhaar बायो-फिंगर स्कैनर का उपयोग बढ़ा है, पर बुंदेलखंड जैसे इलाकों में लगातार बिजली और नेटवर्क न होने के कारण बायो-फेल्युअर होते हैं। उदाहरण के तौर पर बांदा में बुजुर्गों को कई बार राशन लेने के लिए POS पर लंबी यात्राएँ करनी पड़ीं क्योंकि बायोमैट्रिक काम नहीं कर रही थी।
- लाभार्थी पहचान समस्या: देश के बाकी प्रांतों की तरह बुंदेलखंड के अनेक परिवारों को आधार लिंकिंग की त्रुटियों के कारण फेहरिस्त से निष्कासित कर दिया गया। उद्धारण के रूप में दिसंबर, 2020 में बांदा जिला के प्रमनी राशन की कतार में महिलाओं ने शिकायत की कि उनके नाम लोगिस्टिक्स से हटा दिए गए। जिसके बाद पुन: आवेदन देने के बाद तीन महीने से अधिक का समय लग गया।
- वितरण और भंडारण: POS आधारित वितरण के बावजूद, पुराने गोदाम, खराब ट्रांसपोर्ट और कीट-पतन की वजह से अभी भी राशन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
- टेक्नोलॉजी बाधा: मोबाइल आधारित ग्रिवांस सिस्टम या GPS ट्रैकिंग POS दुकानों में इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं। सामाजिक ऑडिट का व्यापक स्तर पर प्रयोग नहीं हो पा रहा है।
- PDS तकनीकी चुनौतियाँ: डिजिटलीकरण और POS, आधार, ONORC जैसी पहल सरकार द्वारा की गई है लेकिन बैक अप बिजली/नेटवर्क की अनुपलब्धता से बायोमैट्रिक फेल्युअर आम हैं। गरीबों, विशेषकर वृद्धों को POS तक पहुंचने के लिए कई बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
- लाभार्थी पहचान और वितरण: KYC और आधार लिंक में त्रुटियों के कारण कई परिवार PDS लिस्ट से बाहर हो जाते हैं। दूसरी ओर खराब भंडारण और लॉजिस्टिक व्यवस्था ठीक न होने के कारण राशन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- PDS और टेक्नोलॉजी पर स्थानीय लोगों की राय: चित्रकूट के पत्रकार श्री राजेंद्र कुमार पटेल इस विषय पर बात करते हुए कहते हैं कि PDS डिजिटलीकरण, POS, आधार, ONORC जैसी पहलें अच्छी दिखती हैं, लेकिन नेटवर्क / बिजली की बुनियादी समस्या इस वितरण मॉडल को कमजोर करती हैं। आधार बायोमेट्रिक विफलता, टोकन और दुकानियों में डेटा विसंगति जैसे कारणों से गरीब की पहुँच बाधित होती है। वृद्ध और गरीब लोगों को POS पर लंबी दूरी तय करना पड़ता है। PDS रिक्तियों की वजह से कई परिवार सरकारी राशन से वंचित रह जाते हैं, जिससे भूख, कुपोषण व गरीबी बुंदेलखंड में और गहराती जा रही है।
- समस्या का समाधान: पन्ना जिला के समाज सेवी और दलित एजुकेशन पर काम करने वाले श्री शेख अंजाम ने समस्या का समाधान बताते हुए इस विषय पर बात की और सुझाव व निवारक उपाय देते हुए कहते हैं कि 1. नेटवर्क और बिजली की सप्लाई में सुधार लाया जाए, POS और बायो-स्कैनर के लिए UPS या सोलर बैकअप बहुत ही आवश्यक है। डेटा और ग्रिवांस प्रबंधन करते हुए मोबाइल और IVRS आधारित शिकायत पोर्टल बनाया जाए। साथ ही GPS ट्रैकिंग से राशन वितरण मॉनिटरिंग को सक्षम बनाया जाए। जल संसाधन टेक्नोलॉजी पर ज़ोर दिया जाए। भू जल पुनर्भरण के लिए चेक डैम, हवेरी सिस्टम, तालाब पुनरुज्जीवन की व्यवस्था के साथ भू मैप आधारित निगरानी की जाए। अनाज भंडारण और लॉजिस्टिक में सुधार लाया जाये। जैसे तापमान नियंत्रित गोदाम, CCTVs से FPS निगरानी की जाए। सामाजिक निगरानी एवं जन सहभागिता को बढ़ावा दिया जाए। ग्राम स्तरीय फैसिलिटेटेड ऑडिट की जाए, जागरूक पाठशाला कार्यक्रम और श्रमिक व लाभार्थी ट्रेनिंग को मजबूत किया जाए।
महोबा शहर में रहने वाली और सामाजिक कामों में दिलचस्पी रखने वाली कनीज़ फातिमा ने बताया कि हमारे वार्ड के राशन दुकान चलाने वाले अच्छे इंसान हैं। जैसे ही राशन आता है वह लोगों को फोन करके बुला लेते हैं। नेटवर्क की समस्या ना हो उसके लिए वह किसी ऐसी जगह को चुनते हैं जहां पर आसानी से नेटवर्क आ जाए और यह सुनिश्चित करते हैं कि सारे लोगों को उनके हिस्से का राशन मिल जाए। तो हम कह सकते हैं कि हमारे वार्ड में राशन लेने के लिए किसी को कोई परेशानी नहीं होती है, पूरी पारदर्शिता के साथ लोगों को राशन दिया जा रहा है। लेकिन मैं महोबा शहर से हटकर ग्रामीण क्षेत्र की बात नहीं बता सकती। हाल के दिनों में महंगाई बहुत बढ़ी है जिससे लोगों को विशेष कर महिलाओं को अपना घर चलाने में बहुत परेशानी हो रही है। उन्होंने यह भी बताया कि केवल चावल और गेहूं ही दिए जाते हैं। चीनी या मिट्टी का तेल या और दूसरी सामग्री नहीं मिलती है जिसके लिए लोग शिकायत भी करते हैं।
वहीं हमीरपुर जिला के ग्रामीण क्षेत्र से अनुसूया देवी ने बताया कि हमारे क्षेत्र में पूरा राशन नहीं दिया जाता है 5 किलो की जगह 4 किलो या साढे 4 किलो ही राशन दिया जाता है कोई आवाज भी नहीं उठाता यदि कोई बोलता है तो उससे कहा जाता है कि लेना हो तो लो, नहीं लेना हो तो जाओ। दूसरी समस्या यह भी है कि अंत्योदय अन्न योजना के तहत यदि एक व्यक्ति भी है तो उसको 30 किलो राशन दिया जाता है जबकि दूसरे राशन कार्ड पर मात्र 5 किलो पर यूनिट ही दिया जाता है। ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि जिसका परिवार बड़ा है वह अपने खाने को कैसे मैनेज करे? दूसरा प्रश्न यह भी है कि राशन के तौर पर मिलने वाला अनाज कभी-कभी कोटे में इतना खराब आता है कि जानवर को भी नहीं खिलाया जा सकता। इस तरह अनाज बर्बाद होता है और जो लोग भूखे हैं उन तक अनाज पहुंच भी नहीं पाता। इसलिए सरकार और संबंधित अधिकारियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।