बिहार में सूक्ष्म वित्त की उलझी हुई कहानी

कर्ज़ से आज़ादी या कर्ज़ का जाल?

अनीस आर खान, नई दिल्ली

1980 के दशक में जब बांग्लादेश के ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण बैंक ने सूक्ष्म वित्त (माइक्रोफाइनेंस) की अवधारणा दी, तो इसे एक क्रांतिकारी विचार माना गया। मक़सद साफ़ था कि गरीबों को साहूकारों के शोषण से मुक्त कराना और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका देना। छोटे-छोटे कर्ज़, बिना बड़ी गारंटी के, उन महिलाओं और परिवारों तक पहुँचे जिन्हें पहले कभी बैंकिंग व्यवस्था ने छुआ तक नहीं था। विश्व बैंक ने इस मॉडल को 1995 में वैश्विक रणनीति के तौर पर अपनाया। उम्मीद थी कि गरीबों तक पूंजी की पहुँच बढ़ेगी और गरीबी की जंजीरें टूटेंगी। लेकिन बिहार की ज़मीन पर यह कहानी एक अलग ही मोड़ ले चुकी है।

आत्मनिर्भरता से कर्ज़ की गुलामी तक

दरभंगा के एक छोटे से गाँव में रहने वाली 35 वर्षीय सुनीता देवी कहती हैं कि “जीविका से पाँच हजार रुपये का कर्ज़ मिला था। सोचा, घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई का सहारा बनेगा। लेकिन पैसे कम पड़े तो माइक्रोफाइनेंस कंपनी से भी उधार लेना पड़ा। अब हर हफ्ते तीन अलग-अलग जगह किस्त चुकानी पड़ती है। पूरा दिन इसी चिंता में गुजरता है कि अगली किस्त कहाँ से आएगी।”

जीविका जैसे सरकारी स्वयं सहायता समूह (SHG) महिलाओं को छोटे कर्ज़ उपलब्ध कराते हैं। लेकिन यह रकम इतनी सीमित होती है कि रोज़मर्रा की ज़रूरतें ही पूरी नहीं हो पातीं। मजबूर होकर महिलाएं निजी माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की तरफ मुड़ती हैं। ये कंपनियां तेजी से कर्ज़ देती हैं, लेकिन शर्तें सख्त होती हैं। जैसे साप्ताहिक वसूली, ब्याज दरें अधिक, और चूक की स्थिति में सामाजिक दबाव।

मधुबनी की रेणु कुमारी बताती हैं कि “हमने गाय खरीदने के लिए 20 हज़ार रुपये का कर्ज़ लिया था। लेकिन दूध का दाम गिर गया और पशु की बीमारी पर और खर्च हो गया। अब कमाई से ज्यादा कर्ज़ चुकाना पड़ रहा है। कंपनी वाले हर हफ्ते घर आकर किस्त मांगते हैं। कई बार हमें दूसरे रिश्तेदार से कर्ज़ लेकर किस्त चुकानी पड़ती है।”

किस्त का दबाव और टूटता जीवन

गाँवों में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का नेटवर्क इस तरह फैला है कि एक ही परिवार पर तीन-चार कंपनियों का कर्ज़ हो सकता है। हर हफ्ते किस्त भरने का दबाव इतना अधिक होता है कि महिलाएं छोटे-मोटे खर्चों के लिए भी नए कर्ज़ लेने लगती हैं।समाजशास्त्री डॉ. अंजना सिंह बताती हैं। कि “सूक्ष्म वित्त का असली मक़सद स्वरोज़गार और आत्मनिर्भरता था। लेकिन बिहार में यह रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करने का जरिया बन गया है। जब गरीब लोग उपभोग के लिए कर्ज़ लेते हैं तो उसका बोझ उन्हें धीरे-धीरे दलदल में धकेल देता है।”

रिश्ते, शिक्षा और स्वास्थ्य पर मार

कर्ज़ का दबाव सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन पर भी असर डाल रहा है।

रिश्तों में तनाव – पति-पत्नी के बीच झगड़े बढ़ते हैं, क्योंकि आय और कर्ज़ का संतुलन बिगड़ जाता है।

शिक्षा पर असर – कई परिवार बच्चों की फीस नहीं चुका पाते और पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है।

स्वास्थ्य पर मार – किस्त चुकाने के लिए लोग दवाइयों और इलाज का खर्च टाल देते हैं।

सहरसा की एक महिला ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि “मेरे पति बीमार पड़े थे, लेकिन दवा कराने की जगह हमें किस्त चुकानी पड़ी। सोचा कि किस्त नहीं देंगे तो सबके सामने बेइज़्ज़ती होगी।”

समस्या कहाँ है?

विकास अर्थशास्त्रियों का कहना है कि समस्या मॉडल में ही है। गरीबों को केवल स्वरोज़गार पर केंद्रित करना उन्हें ऐसे बाज़ार के हवाले कर देता है जहाँ जोखिम ज्यादा और सुरक्षा कम है।

पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अरविंद चौबे कहते हैं “सूक्ष्म वित्त तब कारगर होता है जब उसके साथ बाज़ार तक पहुँच, प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं जुड़ी हों। सिर्फ कर्ज़ देना, और वह भी कई बार महंगे ब्याज पर, गरीबों को साहूकारों से ज्यादा मुसीबत में डाल देता है।”

क्या रास्ता निकल सकता है?

बिहार में बढ़ते कर्ज़ संकट के बीच यह सवाल और अहम हो गया है कि आगे का रास्ता क्या हो। विशेषज्ञ कुछ उपाय सुझाते हैं:

ऋण की सीमा तय करना – एक परिवार पर कितने ऋण हो सकते हैं, इस पर स्पष्ट नियंत्रण।

व्यापारिक प्रशिक्षण – सिर्फ पैसा देना काफी नहीं, गरीबों को व्यवसाय और बाजार की समझ भी देनी होगी।

सामाजिक सुरक्षा कवच – स्वास्थ्य, शिक्षा और बीमा की योजनाओं को मजबूत करना ताकि लोग हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए कर्ज़ न लें।

नियमन – निजी माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की निगरानी और ब्याज दरों पर नियंत्रण।

सूक्ष्म वित्त की शुरुआत गरीबों को आर्थिक आज़ादी देने के लिए हुई थी। लेकिन बिहार की ज़मीन पर यह कहीं-कहीं एक नए किस्म का कर्ज़ जाल बन चुका है। महिलाओं की मेहनत, उनकी आशाएं और उनके सपने किस्तों की कठोर समय-सीमा में उलझ कर रह गए हैं। अब सवाल सिर्फ इतना है कि क्या सरकार और नीतिनिर्माता इस आवाज़ को सुनेंगे ? या फिर माइक्रोफाइनेंस का यह जाल गरीबों को और गहराई में धकेलता जाएगा?