पाँच महीनों का टापू माजरा गाँव

(बुंदेलखंड की बाढ़ और सूखे के बीच जूझता एक गाँव)
अनीस आर. खान, नई दिल्ली

भारत के नक्शे पर बुंदेलखंड—जहाँ जमीन की दरारों में इतिहास बोलता है और हर मौसम में पीड़ा रिसती है। यह इलाका कभी सूखे से झुलसता है तो कभी बाढ़ से डूब जाता है। यहाँ की त्रासदी दशकों से लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।

झाँसी ज़िले के मऊरानीपुर ब्लॉक का माजरा गाँव इसका जिंदा उदाहरण है। गंगा और शारदा नदियों के बीच बसा यह गाँव हर साल बरसात के महीनों में टापू बन जाता है। जून के आखिर से लेकर अक्टूबर तक पूरा गाँव पानी से घिर जाता है। सड़कें, रास्ते, पुल—सब डूब जाते हैं।

गाँव के बुज़ुर्ग रामपाल कहते हैं, “बरसात आते ही हमारा गाँव कैदखाना बन जाता है। न बाहर जा सकते हैं, न कोई हमारे पास आ सकता है। पाँच महीने हम सिर्फ़ पानी के सहारे घिरे रहते हैं।”

मानसून की पहली तेज़ बारिश के साथ ही नदियाँ अपना स्वरूप बदल लेती हैं। धीरे-धीरे गंगा और शारदा का पानी गाँव को चारों ओर से घेर लेता है। खेत जलमग्न हो जाते हैं, गलियाँ डूब जाती हैं।

35 साल की सुनीता, जो तीन बच्चों की माँ है, बताती हैं, “हमारे घर के बाहर हर साल घुटनों तक पानी भर जाता है। बच्चों को बाहर भेजना भी मुश्किल हो जाता है। कई बार तो खाना पकाने का चूल्हा भी पानी में डूब जाता है।”

पाँच महीनों तक गाँव का संपर्क बाहरी दुनिया से टूट जाता है। यह कैद सिर्फ़ जगह की नहीं, बल्कि ज़िंदगी की भी होती है।

बरसात से पहले गाँव के लोग अपने कोठार अनाज से भरने की कोशिश करते हैं, लेकिन पाँच महीनों का सामना आसान नहीं। धीरे-धीरे राशन घटने लगता है।

गृहिणी राधा बताती हैं, “पहले महीने तो सब चलता है, लेकिन धीरे-धीरे दाल और सब्ज़ी खत्म हो जाती है। बच्चे पूछते हैं – माँ, आज क्या बनेगा? और मैं कहती हूँ – बस रोटी और नमक।”

बच्चों के चेहरे पर अपूर्ण पोषण की झलक साफ़ दिखती है। दूध और फल यहाँ विलासिता माने जाते हैं।

बीमारी: मौत के दरवाज़े पर

गाँव में न अस्पताल है और न दवा की दुकान। बारिश के दिनों में सबसे ज़्यादा डर साँप काटने और पानी से फैलने वाली बीमारियों का रहता है।

65 वर्षीय बुज़ुर्ग रामस्वरूप कहते हैं, “अगर कोई बीमार पड़ जाए तो नाव से नदी पार कराना पड़ता है। कई बार तेज़ बहाव में नाव पलटने का डर रहता है। डॉक्टर तक पहुँचते-पहुँचते मरीज की हालत बिगड़ जाती है।” दूषित पानी से डायरिया, मलेरिया और त्वचा रोग आम हो जाते हैं। महिलाएँ बताती हैं कि पीने का साफ पानी मिलना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

बच्चों के सपने, जो पानी में बह जाते हैं

मानसून का असर बच्चों की पढ़ाई पर सबसे ज़्यादा पड़ता है। स्कूल महीनों तक बंद रहते हैं। गाँव के शिक्षक नरेश कहते हैं, “जुलाई से अक्टूबर तक बच्चे स्कूल नहीं आ पाते। नाव से भेजना बहुत जोखिम भरा है। पाँच महीने की पढ़ाई ऐसे ही बर्बाद हो जाती है।”

कक्षा पाँच में पढ़ने वाली पायल कहती है, “मुझे डॉक्टर बनना है, लेकिन जब बरसात आती है तो मेरी किताबें पानी में भीग जाती हैं। हम पढ़ाई नहीं कर पाते।”

महिलाएँ: संघर्ष की असली योद्धा

इस कठिनाई का सबसे बड़ा बोझ महिलाओं पर पड़ता है। घर बचाना, बच्चों की देखभाल, बीमारों की सेवा और पानी का इंतज़ाम—सब उनकी जिम्मेदारी होती है।

गाँव की कमला कहती हैं, “बरसात में हमें कई बार गंदा पानी पीना पड़ता है। बीमार हो जाते हैं, लेकिन इलाज नहीं मिलता। बच्चों को संभालना, राशन बचाना, घर की रखवाली करना—सब हमें ही करना पड़ता है।” उनकी आँखों में थकान झलकती है, लेकिन हिम्मत भी दिखाई देती है।

खेती—हर साल का जुआ

माजरा का किसान साल-दर-साल उम्मीद बोता है, लेकिन बारिश उसका सब कुछ डुबो लेती है। किसान बृजेश बताते हैं,
“हम खेत में मेहनत करते हैं, लेकिन बाढ़ आते ही सब बर्बाद हो जाता है। कभी सूखा पड़ता है, कभी सब डूब जाता है। कर्ज़ बढ़ता जाता है। खेती अब जुआ बन गई है।” किसानों के पास सिंचाई का स्थायी साधन नहीं है। जो फसल बचती है, उसका दाम इतना कम मिलता है कि परिवार पालना मुश्किल हो जाता है।

पलायन: मजबूरी का सफ़र

जब खेती और काम धंधा सब ठप हो जाता है तो युवाओं के पास गाँव छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।

22 साल का रामनिवास कहता है, “बरसात आते ही मैं ग्वालियर चला जाता हूँ मज़दूरी करने। घर में काम नहीं है, खेत पानी में डूबे हैं। अगर बाहर न जाऊँ तो परिवार भूखा रह जाएगा।”

गाँव में हर तीसरे परिवार का कोई न कोई सदस्य दिल्ली, कानपुर या लखनऊ मज़दूरी के लिए जाता है। महिलाएँ और बच्चे पीछे रह जाते हैं। बुंदेलखंड की साझा त्रासदी माजरा में बाढ़ है, तो महोबा, बांदा, छतरपुर और ललितपुर में सूखा। हालात अलग-अलग हैं, लेकिन पीड़ा एक जैसी—

भूख और पलायन

शिक्षा का टूटना

स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव , विशेषज्ञ कहते हैं कि बुंदेलखंड की समस्या प्राकृतिक ही नहीं, बल्कि योजनाओं की विफलता भी है।

उम्मीद की तलाश

कठिनाइयों के बावजूद ग्रामीण हार नहीं मानते। ग्राम प्रधान हरिराम कहते हैं, “हम दान नहीं चाहते, हमें हक़ चाहिए। सरकार अगर चाहे तो यहाँ पुल बन सकता है, नाव की व्यवस्था हो सकती है, स्कूल और अस्पताल खोले जा सकते हैं।” युवा भी यही मांग करते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ यहाँ तक पहुँचें।

माजरा की कहानी केवल एक गाँव की नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड की आवाज़ है। सूखा उन्हें उजाड़ता है, बाढ़ उन्हें कैद कर देती है। सवाल यही है कि क्या सरकार और समाज उन्हें यूँ ही छोड़ देंगे?

गाँव की सुनीता की बात दिल को छू जाती है— “हम ज़िंदा तो हैं, लेकिन जी नहीं पा रहे। हमें जीवन चाहिए, सिर्फ़ अस्तित्व नहीं।”